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राजनीति: शहरीकरण और चुनौतियां

बिजली-पानी की भारी कमी, खराब सड़कें और भारी प्रदूषण भारतीय शहरों की बड़ी कमियां हैं। दरअसल जिस तरह दुनिया के विकसित देशों में किसी शहर की शक्ल बनाने में जैसा बड़ा योगदान वहां के नगर निकायों का होता है, वैसे योगदान के लिए हमारे देश में नगर निकायों की अपनी कोई आर्थिक हैसियत ही नहीं बन पाई है। सड़कें जरा-सी बारिश में बदहाल हो जाती हैं। आने-जाने के साधनों और यातायात जाम संबंधी मुश्किलें रोज दिखाई देती हैं।

Author December 31, 2018 2:48 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

जयंतीलाल भंडारी

दुनिया के सात सौ अस्सी बड़े और मझोले शहरों की बदलती आर्थिक तस्वीर और आबादी की बदलती प्रवृत्ति को लेकर हाल में आई रिपोर्ट चर्चा में है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि 2019 से 2035 तक दुनिया के शहरीकरण में काफी बदलाव देखने में आएगा। दुनिया के अधिकांश विकसित शहर जैसे न्यूयॉर्क, टोक्यो, लंदन, लॉस एंजिलिस, बेजिंग, पेरिस, दिल्ली, मुंबई और कोलकाता दुनिया में दबदबा बनाए रखेंगे। लेकिन तेजी से विकसित होते नए वैश्विक शहरों की रफ्तार के मामले में शीर्षबीस शहरों में से पहले सत्रह शहर भारत के होंगे और उनमें भी सबसे पहले दस शहर भारत के ही होंगे। इन दस शहरों में सूरत, आगरा, बंगलुरु, हैदराबाद, नागपुर, त्रिपुरा, राजकोट, तिरुचिरापल्ली, चेन्नई और विजयवाड़ा जैसे शहर वैश्विक शहर बनते दिखाई देंगे। यह रिपोर्ट ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स ने तैयार की है।

निसंदेह भारतीय शहरों के बारे में जो अध्ययन रिपोर्टें आ रही हैं, उनसे शहरीकरण से संबंधित कुछ महत्त्वपूर्ण तथ्य उभर कर सामने आए हैं। भारत में तेजी से बढ़ती जनसंख्या और तेज गति से हो रहे विकास के कारण तीव्र शहरीकरण को नहीं रोका जा सकता है। जहां एक ओर गांवों से रोजगार की चाह में लोगों का प्रवाह तेजी से शहरों की ओर बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर मध्यम वर्ग के लोग शहरों में ही रहना पसंद करते हैं। निश्चित रूप से कल का उपेक्षित और गुमनाम भारतीय मध्यम वर्ग आज देश और दुनिया की आंखों का तारा बन गया है। भारत का मध्यम वर्ग जहां देश को आर्थिक महाशक्ति बनाने का सपना लेकर आगे बढ़ रहा है, वहीं वह अपनी खरीदारी क्षमता के कारण पूरी दुनिया को भारत की ओर आकर्षित भी कर रहा है। देश की ऊंची विकास दर के साथ-साथ शहरीकरण की ऊंची वृद्धि दर के बलबूते भारत में मध्यम वर्ग के लोगों की आर्थिक ताकत तेजी से बढ़ी है। नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर अप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च की नवीनतम रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्तमान में देश में उच्च मध्यम वर्ग के सत्रह करोड़ लोग पूरे देश में छियालीस फीसद क्रेडिट कार्ड, उनचास फीसद कार, बावन फीसद एसी और तिरपन फीसद कंप्यूटर के मालिक हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारतीय उच्च मध्यम वर्ग के लोगों की संख्या बढ़ कर सत्ताईस करोड़ से अधिक हो गई है। इस विशालकाय मध्यम वर्ग की आंखों में उपभोग और खुशहाली के जो सपने हैं उनको पूरा करने के लिए देश-विदेश की बड़ी-बड़ी कंपनियां अपनी नई रणनीतियां बना रही हैं। इससे भी भारत में शहरीकरण के नए आयाम दिखाई देने लगे हैं।

निश्चित रूप से देश में बढ़ते हुए औद्योगिकरण और कारोबार विकास के कारण भी शहरीकरण की रफ्तार बढ़ रही है। इस समय एशिया प्रशांत देशों में भारत सबसे तेजी से तरक्की करने वाला देश बन गया है। अंतरराष्ट्रीय थिंक टैंक लेगाटम इंस्टीट्यूट के बारहवें सालाना वैश्विक समृद्धि सूचकांक में भारत उन्नीस पायदान की लंबी छलांग लगाते हुए चौरानवे वें स्थान पर पहुंच गया है। 2013 में भारत इस सूची में एक सौ तेरहवें नंबर पर था। कारोबार सरलता से भी देश के शहरों का विकास बढ़ रहा है। विश्व बैंक की ताजा ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस रिपोर्ट 2018’ में भारत ने तेईस पायदान की छलांग लगाई है। भारत अब सौवें नंबर से चढ़ कर सतहत्तरवें पायदान पर आ गया है। निर्माण संबंधी परमिट, सीमाओं में व्यापार, व्यवसाय की शुरुआत, क्रेडिट लेने, बिजली लेने जैसे छह मापदंडों में देश में बड़ा सुधार हुआ है। भारत एशिया में चौथे नंबर पर है, जबकि चार साल पहले यह छठे स्थान पर था। इसी तरह भारत के वैश्विक प्रतिस्पर्धा सूचकांक में भी सुधार हुआ है। विश्व आर्थिक मंच के वैश्विक प्रतिस्पर्धा सूचकांक 2018 में भारत पांच स्थान चढ़ कर अट्ठावनवें स्थान पर पहुंच गया है। भारत की रैंकिंग में पांच स्थान की वृद्धि जी-20 देशों के बीच सर्वाधिक बढ़ोतरी है। मंच ने यह भी कहा कि भारत दक्षिण एशिया में महत्त्वपूर्ण अर्थव्यवस्था बना हुआ है।

यद्यपि एक ओर भारत के लिए शहरीकरण की चुनौतियां हैं, लेकिन दूसरी ओर आर्थिक विकास और वैश्विक व्यापार बढ़ाने की भी भारी संभावनाएं हैं। इतिहास गवाह है कि जिन देशों में शहरों की जितनी अधिक प्रगति होती है, वहां आर्थिक अवसरों की उपलब्धता उतनी ही अधिक होती है। यह माना जाता है कि शहर किसी भी राष्ट्र के विकास के आधार स्तम्भ होते हैं। जैसे-जैसे शहरों का विकास होता है, वैसे-वैसे उसके साथ नया बाजार तैयार होता है। वैश्वीकरण के नए परिदृश्य में भारतीय शहर प्रतिभाओं के लिए खुशहाली के नए केंद्र बन गए हैं। प्रतिभाएं शहरों में इसलिए रहना चाहती हैं क्योंकि शहरों में विश्वस्तरीय रोजगार अवसर सृजित हो रहे हैं। भारत दुनिया का सबसे बड़ा प्लेसमेंट सेंटर बनता जा रहा है। स्थिति यह है कि भारत के शहरों की ओर से विकसित देशों के लिए आउटसोर्सिंग का प्रवाह तेज होता जा रहा है। भारत में अंग्रेजी बोलने वाले पेशेवर सरलता से मिल जाते हैं और भारत में व्यावसायिक कार्यस्थल पश्चिमी देशों के मुकाबले काफी कम दरों पर उपलब्ध हैं। निश्चित रूप से जहां बढ़ती जनसंख्या के कारण शहरों पर आबादी का दबाव बढ़ रहा है, वहीं शिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं के अभाव में गांवों से लोगों का पलायन शहरों की ओर बढ़ता ही जा रहा है। वस्तुत: इस समय देश के अधिकांश शहर विकास और सामान्य जीवन स्तर के लिए मूलभूत सुविधाओं से दूर हैं। बिजली-पानी की भारी कमी, खराब सड़कें और भारी प्रदूषण भारतीय शहरों की बड़ी कमियां हैं। दरअसल जिस तरह दुनिया के विकसित देशों में किसी शहर की शक्ल बनाने में जैसा बड़ा योगदान वहां के नगर निकायों का होता है, वैसे योगदान के लिए हमारे देश में नगर निकायों की अपनी कोई आर्थिक हैसियत ही नहीं बन पाई है। सड़कें जरा-सी बारिश में बदहाल हो जाती हैं। आने-जाने के साधनों और यातायात जाम संबंधी मुश्किलें रोज दिखाई देती हैं। शहरों में जिस तेजी से कंक्रीट के जंगल खड़े हुए हैं, उस रफ्तार से पेड़ नहीं लग पाए। इस लिहाज से देश के ज्यादातर शहरों में नवीनीकरण और वतर्मान व्यवस्थाओं में आमूल-चूल बदलाव लाने की जरूरत है।

ऐसे समय में जब दुनिया के देश शहरीकरण से उत्पन्न होने वाली चुनौतियों का सामना करने और अपने देश के शहरों को वैश्विक लाभ हेतु सजाने-संवारने की योजनाएं बना रहे हैं तब हमें भी देश में मौजूदा शहरों को उपयुक्त बनाने और अच्छे नए शहरों के निर्माण के लिए तेजी से कदम बढ़ाने होंगे। जरूरी है कि शहर सुनियोजित रूप से विकसित हों। शहर आधुनिक बुनियादी सुविधाओं, यातायात और संचार साधनों से सुसज्जित हों। शहरों में विकास की मूलभूत संरचना, मानव संसाधन के बेहतर उपयोग, जीवन की मूलभूत सुविधाओं और सुरक्षा कसौटियों के लिए सुनियोजित प्रयास करना आवश्यक हैं। हमें नए शहरों की मौजूदा नई जरूरतों के लिए खाका बनाना होगा। नए शहरों में सड़क का उपयुक्त मॉडल अपनाया जाना होगा। नए शहरों को तत्परता से निर्मित करने के लिए सरकार के द्वारा आसान कर्ज के साथ-साथ निजी क्षेत्र से निवेश का सार्थक प्रयास करना होगा। अभी देश में ज्यादातर शहरी ढांचे का निर्माण बाकी है और शहरीकरण की चुनौतियों के मद्देनजर देश के पास शहरी मॉडल को परिवर्तित करने और बेहतर सोच के साथ शहरों के विकास का पर्याप्त समय मौजूद है। हम आशा करें कि सरकार देश के शहरों को एक बेहतर सोच, दृढ़ इच्छाशक्ति और सुनियोजित रणनीति से सजाएगी-संवारेगी, ताकि हमारे ये शहर राष्ट्रीय और वैश्विक जरूरतों की पूर्ति के अनुरूप लाभप्रद दिखाई दें और देश के आर्थिक विकास की बुनियादी ताकत बन जाएं।

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