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शिक्षित भारत का सपना

महात्मा गांधी ने कहा था कि शिक्षा एक ऐसा साधन है जो राष्ट्र की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार लाने में एक जीवंत भूमिका निभा सकता है।

महात्मा गांधी ने कहा था कि शिक्षा एक ऐसा साधन है जो राष्ट्र की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार लाने में एक जीवंत भूमिका निभा सकता है। यह नागरिकों की विश्लेषण क्षमता के साथ-साथ उनका सशक्तीकरण करता है, उनके आत्म-विश्वास का स्तर बेहतर बनाता है और उन्हें शक्ति से परिपूर्ण करता है, दक्षता बढ़ाने के लक्ष्य तय करता है।

शिक्षा में केवल पाठ्यपुस्तकें सीखना शामिल नहीं है बल्कि इसमें मूल्यों, कौशलों तथा क्षमताओं में भी वृद्धि की विधि और अपेक्षा शामिल है। इससे व्यक्ति को अपने करियर और साथ ही प्रगतिशील मूल्यों के साथ नए समाज के निर्माण में एक उपयोगी भूमिका निभाने में सहायता मिलती है। अत: शिक्षा व्यक्तिगत स्तर की बेहतरी के साथ-साथ पूरे समाज में बदलाव ला सकती है। इतना ही नहीं, साक्षर होने का मतलब लोगों को शिक्षित करना मात्र नहीं है। बल्कि इसके कई फायदे हैं। बेहतर साक्षरता दर से जनसंख्या बढ़ोतरी, गरीबी और लिंगभेद जैसी समस्याओं से निपटा जा सकता है।

बहरहाल, संयुक्त राष्ट्र के अध्ययन के मुताबिक दुनिया भर में करीब चार अरब लोग साक्षर हैं तो वहीं दूसरी तरफ अब भी करीब 77.5 करोड़ लोग साक्षर नहीं हैं। इनमें से दो-तिहाई महिलाएं हैं। लगभग तीन चौथाई निरक्षर आबादी दुनिया के सिर्फ दस देशों में रहती है। हर पांच में से एक व्यक्ति निरक्षर है। वहीं दुनिया के लगभग पैंतीस देशों में आज भी साक्षरता दर पचास फीसद से कम है। अगर भारत में साक्षरता की दर की बात करें तो यह वर्ष 2011 में बढ़ कर 74.4 फीसद तक पहुंच गई। इसमें पुरुषों की साक्षरता दर जहां 82.16 फीसद रही, वहीं महिलाओं की साक्षरता दर 65.46 फीसद ही दर्ज की गई। लेकिन यह अब भी विश्व की औसत साक्षरता दर चौरासी फीसद से काफी कम है।

यह ठीक है कि वर्तमान में स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति दर सत्तर प्रतिशत जरूर है, लेकिन स्कूल छोड़ने की दर भी चालीस प्रतिशत बनी हुई है। भारत में कुल 28.7 करोड़ वयस्क पढ़ना-लिखना नहीं जानते हैं, जो कि दुनिया भर की निरक्षर आबादी का सैंतीस फीसद है। देश में कम साक्षरता दर का एक कारण शिक्षा-प्राप्त लोगों का भी बेरोजगार होना है। हालांकि यह कोई नई बात नहीं है। क्योंकि अपने संक्रमण काल से ही भारतीय शिक्षा को कई चुनौतियों और समस्याओं का सामना करना पड़ा। आज भी ये चुनौतियां और समस्याएं हमारे सामने हैं जिनसे दो-दो हाथ करना है।

स्वतंत्रता आंदोलन के साथ ही भारत में शिक्षा को लेकर अनेक जद्दोजहद चलती रहीं। स्वतंत्रता के पश्चात भारत सरकार ने सार्वजनिक शिक्षा के विस्तार के लिए अनेक प्रयास किए। यह और बात है कि इन प्रयासों की अनेक खामियां भी सामने आई हैं जिन्हें दूर करने का प्रयास किया जा रहा है। बहरहाल, संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में इस बात का स्पष्ट रूप से जिक्र किया गया है कि निरक्षरता के कारण दुनिया भर की सरकारों को सालाना 129 अरब डॉलर का नुकसान उठाना पड़ रहा है। साथ ही दुनिया भर में प्राथमिक शिक्षा पर खर्च किया जाने वाला दस फीसद धन बर्बाद हो जाता है, क्योंकि शिक्षा की गुणवत्ता का ध्यान नहीं रखा जाता। इस कारण गरीब देशों में अक्सर चार में से एक बच्चा अपनी कक्षा से नीचे की कक्षा की पाठ्य सामग्री भी नहीं पढ़ सकता।

हालांकि आजादी पाने के बाद पिछले सड़सठ वर्षों में भारत ने बहुआयामी सामाजिक और आर्थिक प्रगति की है। लेकिन अगर साक्षरता की बात करें तो इस मामले में आज भी हम कई देशों से पीछे हैं। यह ठीक है कि आजादी के समय से ही देश की साक्षरता बढ़ाने के लिए कई कार्य किए गए और कार्यक्रम बनाए गए, पर जितनी प्रगति कागजों पर दिखी में उतनी असल में हो नहीं पाई।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में छह से चौदह वर्ष के बच्चों के लिए संविधान में पूर्ण और अनिवार्य शिक्षा का प्रस्ताव रखा गया। लेकिन आजादी के साढ़े छह दशकों से भी अधिक समय बीत जाने के बावजूद हम यह लक्ष्य हासिल नहीं कर सके हैं। भारतीय संसद में वर्ष 2002 में 86वां संशोधन अधिनियम पारित हुआ जिसके तहत छह से चौदह वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा को मौलिक अधिकार का दर्जा दिया गया, बावजूद इसके नतीजों में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ। इतना ही नहीं, 2001 में सर्वोच्च न्यायालय ने सभी राज्य सरकारों को सरकारी सहायता प्राप्त सभी स्कूलों में निशुल्क भोजन देने की व्यवस्था करने का आदेश दिया था।

इसके अलावा, देश में 1998 में पंद्रह वर्ष से पैंतीस वर्ष के आयु वर्ग के लोगों के लिए ‘राष्ट्रीय साक्षरता मिशन’ और 2001 में ‘सर्वशिक्षा अभियान’ शुरू किया गया। इसमें वर्ष 2010 तक छह से चौदह साल के आयु वर्ग के सभी बच्चों की आठ साल की शिक्षा पूरी कराने का लक्ष्य था। बाद में संसद ने चार अगस्त 2009 को बच्चों के लिए मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा कानून को स्वीकृति दे दी। एक अप्रैल 2010 से लागू हुए इस कानून के तहत छह से चौदह वर्ष के आयु वर्ग के बच्चों को निशुल्क शिक्षा देना हर राज्य की जिम्मेदारी होगी और हर बच्चे का मूल अधिकार होगा। इस कानून को साक्षरता की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि माना गया। लेकिन इस कानून के बावजूद देश में प्राथमिक शिक्षा की तस्वीर में कोई गुणात्मक बदलाव नहीं हुआ है।

दरअसल, शिक्षा अधिकार अधिनियम के चलते ज्यादा जोर दाखिले या नामांकन बढ़ाने पर रहा है। ड्राप आउट रेट यानी बीच में पढ़ाई छोड़ने की दर पर काबू पाने के लिए एक तरफ मिड-डे मील का सहारा लिया गया, तो दूसरी तरह प्राथमिक कक्षाओं में फेल न करने की नीति अपनाई गई। लेकिन न पढ़ाई की गुणवत्ता की फिक्र की गई न विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात की। पढ़ाई-लिखाई का स्तर क्या है यह स्वयंसेवी संगठन ‘प्रथम’ की हर साल आने वाली रिपोर्ट बताती रहती है।

विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात की हकीकत क्या है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अमूमन हर राज्य में शिक्षकों के हजारों पद खाली हैं। शिक्षा अधिकार अधिनियम में भवन, कक्ष, मैदान, शौचालय आदि से संबंधित बुनियादी ढांचे की शर्तें भी रखी गई थीं और इनकी समय-सीमा तय की गई थी। पर समय-सीमा बीतने के बाद भी ये शर्तें पूरी नहीं की जा सकी हैं। अधिनियम में ये शर्तें रखे जाने का मकसद यही रहा होगा कि सरकारों पर इन्हें पूरा करने की संवैधानिक बाध्यता रहेगी। पर अमल में कोताही बताती है कि सरकारें इस बाध्यता को लेकर गंभीर नहीं रही हैं।

भारत में साक्षरता को बढ़ाने के लिए सर्वशिक्षा अभियान, मिड डे मील योजना, प्रौढ़ शिक्षा योजना, राजीव गांधी साक्षरता मिशन आदि न जाने कितने अभियान चलाए गए, मगर सफलता आशा के अनुरूप नहीं मिली। आज भी केरल को छोड़ दिया जाए तो देश के तमाम राज्य पूर्ण साक्षर नहीं हो पाए हैं। संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों ने कई देशों के साथ मिल कर साक्षरता को बढ़ाने के लिए पर्याप्त कदम उठाए हैं और इसके लिए कई लक्ष्य भी निर्धारित किए हैं। संयुक्त राष्ट्र ने चार लक्ष्य- सभी के लिए शिक्षा, सहस्राब्दी विकास लक्ष्य, संयुक्त राष्ट्र साक्षरता दशक, संयुक्त राष्ट्र निरंतर विकास के लिए शिक्षा का दशक रखे हैं। भारत में इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए सर्वशिक्षा अभियान, राष्ट्रीय साक्षरता मिशन, मिड-डे-मिल योजना जैसे कार्यक्रम चलाए गए हैं लेकिन इन्हें पूरी तरह से लागू करने में सफलता नहीं मिल पाई है। इनमें से मिड-डे मील ही एक ऐसी योजना है जिसने देश में साक्षरता बढ़ाने में थोड़ी अहम भूमिका निभाई। इसकी शुरुआत तमिलनाडु से हुई, जहां 1982 में तत्कालीन मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्रन ने पंद्रह साल से कम उम्र के स्कूली बच्चों को प्रतिदिन निशुल्क भोजन देने की योजना शुरू की थी।

मिड-मेल की उपयोगिता जाहिर होने के बावजूद अब इस योजना के पर कतरे जा रहे हैं। मोदी सरकार ने इसके आबंटन में कटौती कर दी है, जिसका प्राथमिक शिक्षा को सार्वभौम बनाने के लक्ष्य पर बुरा असर होगा। एक तरफ ज्ञान आधारित समाज बनाने की बात होती है और दूसरी तरफ एक ऐसी योजना का आबंटन घटा दिया जाता है जिसने ड्रापआउट रेट को कम करने में भूमिका सिद्ध कर दी है, यह विरोधाभास क्यों है? ज्ञान आधारित समाज के उद्देश्य को इतना व्यापक क्यों नहीं बनाया जाता कि उसमें हाशिये के लोग भी शामिल दिखाई दें? सरकार ने कौशल विकास कार्यक्रम शुरू किया है। पर इसे समूची शिक्षा का अंग क्यों नहीं बनाया जाता? अगर ज्ञान आधारित समाज और कौशल विकास के तकाजे को समूची आबादी के मद्देनजर देखा जाए तो शिक्षा नीति को भी अधिक से अधिक समावेशी बनाने की जरूरत महसूस होगी और यह हमारे देश के लिए अच्छा ही होगा।

शिक्षा-व्यवस्था की एक बुनियादी समस्या इसमें निहित विषमता भी है। दो तरह की शिक्षा प्रणाली चल रही है- एक उनके लिए जो इसे खरीद सकते हैं, और दूसरी उनके लिए, जो सरकारी स्कूल न हों तो निरक्षर रह जाने के लिए अभिशप्त होंगे। यह स्थिति सबसे ज्यादा प्राथमिक शिक्षा में है। कोठारी आयोग समेत शिक्षा पर बनी सभी प्रमुख समितियों ने समान शिक्षा प्रणाली की वकालत की थी। आज देश में समान शिक्षा प्रणाली के लिए कहीं से कोई सशक्त आवाज नहीं उठ रही है। उलटे शिक्षा में बाजार का दखल और बढ़ता जा रहा है। ऐसे में शिक्षा की भावी तस्वीर कैसी होगी इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

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