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राजनीति: लोकतंत्र और चुनौतियां

गरीब, आदिवासी, निम्न जाति या हाशिए के लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाली आबादी निरंतर शोषण का शिकार होती है और न्याय से वंचित रहती है। उसकी अज्ञानता और ईमानदारी ही कमजोरियां बन जाती हैं और प्रभावी समूह उसका लाभ उठा कर शोषण एवं दमन की प्रक्रिया को इतना तीव्र कर देते हैं कि न्याय के अर्थ को यह समूह समझ ही नहीं पाता। पिछले कुछ वर्षों में समाज में ऐसी अनेक विसंगतियां उत्पन्न हुई हैं जिसने लोकतंत्र के सम्मुख ऐसी ही चुनौतियां उत्पन्न की हैं।

Updated: January 26, 2021 7:17 AM
कोरोना काल में खाना के लिए परेशान लोग। फाइल फोटो।

ज्योति सिडाना

महात्मा गांधी का मानना था कि विकास संतुलित होना चाहिए और जिस विकास से असंतुलन पैदा हो, उसे विकास नहीं विनाश कहना चाहिए। आज भारतीय समाज में उभरते लोकतंत्र को विकास एवं सामाजिक न्याय के संदर्भ में मूल्यांकित करने की आवश्यकता है। विकास की गति कुछ राज्यों में तीव्र है, जबकि कुछ राज्य आज भी निर्धनता और कुपोषण जैसी समस्याओं के शिकार हैं। नागरिकों को यह समझने की जरूरत है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की दर में वृद्धि होना ही विकास का सही संकेतक नहीं है।

अगर जीडीपी बढ़ रही हो, लेकिन रोजगार न मिले, स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध न हों, उपयुक्त शिक्षा की प्राप्ति न हो, अपराध दर में तीव्र वृद्धि हो रही हो, युवा व किशोर पीढ़ी निराशा व असुरक्षा महसूस कर रही हो, तो ऐसे में जीडीपी की बढ़ती दर विकास का संकेतक कैसे हो सकती! वर्तमान समय में ये स्थितियां साफ दिखाई दे रही हैं।

भारत को विविधताओं वाला देश कहा जाता है जहां भाषा, संस्कृति, धर्म, जाति, क्षेत्र इत्यादि के आधार पर विविधता देखी जा सकती है। यहां विविध अस्मिताओं से निर्मित समूहों की एक साथ उपस्थिति है, परंतु क्या ये समूह आपस में सहिष्णुता के मूल्य के आधार पर अपना जीवन संचालित कर रहे हैं? एक सशक्त लोकतंत्र का अर्थ होता है कि उस राष्ट्र में हर अल्पसंख्यक समुदाय न केवल सुरक्षित हो, अपितु भय रहित माहौल में अपने विकास के प्रयासों को प्रभावी ढंग से संचालित कर सके। यदि बहुसंख्यक और प्रभुत्वशाली समूह हाशिए पर स्थित समूहों के लिए खतरा बन कर उभरते हैं तो लोकतंत्र के समक्ष उत्पन्न खतरों को अनुभव किया जा सकता है।

जहां तक संविधान की प्रस्तावना में शामिल सामाजिक न्याय की अवधारणा की बात है, तो यह देखा जाता है कि न्याय की प्रणाली का वर्गीय चरित्र उभर कर आया है। परिणामस्वरूप गरीब, आदिवासी, निम्न जाति या हाशिए के लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाली आबादी निरंतर शोषण का शिकार होती है और न्याय से वंचित रहती है।

उसकी अज्ञानता और ईमानदारी ही कमजोरियां बन जाती हैं और प्रभावी समूह उसका लाभ उठा कर शोषण एवं दमन की प्रक्रिया को इतना तीव्र कर देते हैं कि न्याय के अर्थ को यह समूह समझ ही नहीं पाता। पिछले कुछ वर्षों में समाज में ऐसी अनेक विसंगतियां उत्पन्न हुई हैं जिसने लोकतंत्र के सम्मुख ऐसी ही चुनौतियां उत्पन्न की हैं।

दूसरी ओर पर्यावरण एवं विकास के मध्य के संबंध भी संकट का सामना कर रहे हैं। इस संदर्भ में प्रकाशित रिपोर्टें बताती हैं कि भारत के महानगर गंभीर पर्यावरणीय खतरों का सामना कर रहे हैं। घने जंगलों के क्षेत्रफल में तेजी से कमी आ रही है और ऐसे उद्योग विकसित हो रहे हैं जो पानी और हवा को प्रदूषित कर उस क्षेत्र की जनसंख्या को बीमा कर रहे हैं।

हाल में जीवन रक्षक दवाइयों की कीमतों में इतनी वृद्धि हुई है कि ये दवाइयां मध्य वर्ग की पहुंच से भी बाहर हो गई हैं। ऐसे ही बुनियादी सवाल शिक्षा के क्षेत्र में भी उत्पन्न हुए हैं जहां महंगी शिक्षा के नाम पर समानता के मूल्य का निषेध एक यथार्थ बन कर उभरा है। मध्य वर्ग एवं निम्न वर्ग के लिए शिक्षा खासतौर से गुणवत्तामूलक शिक्षा पहुंच के बाहर हो गई है और यह स्थिति शिक्षा के मूलभूत अधिकार का निषेध करती है। लैंगिक हिंसा की घटनाओं में भी प्रत्येक राज्य में तीव्र वृद्धि देखने को मिली है।

हम इस तथ्य से इंकार नहीं कर सकते कि अंध-आस्था का प्रतिनिधित्व करने वाले बाबाओं ने समूचे देश में ऐसे दृष्टिकोण को और ऐसे व्यवहारों को बाजार का हिस्सा बनाया है जो एक तरफ आम जनता का शोषण करते हैं, वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक संरक्षण प्राप्त कर व कॉरपोरेट के साथ जुड़ कर स्वयं को एकाधिकारवादी बना लेते हैं।

इन विसंगतियों के फलस्वरूप लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं कमजोर हो रही हैं और अराजकतावाद की जीवन शैली धीरे-धीरे सभी आयामों में अपने को स्थापित कर पाने में सफल हो रही है। यदि इन स्थितियों पर औपचारिक नियंत्रण स्थापित नहीं हुए तो भारतीय समाज में लोकतंत्र न केवल निर्बल होगा, अपितु इसकी निरंतरता पर भी संदेह के बादल मंडराने लगेंगे।

26 जनवरी 1950 उत्तर-औपनिवेशिक भारत के इतिहास में मील का पत्थर है। उस दिन हम भारत के नागरिकों ने स्वयं को कुछ सार्वभौमिक मूल्यों के प्रति समर्पित किया था और चुनी हुई सरकारों को यह दायित्व सौंपा था कि वे विकास कार्यक्रमों का संचालन इस प्रकार करें कि संविधान हमारी जीवन पद्धति को निर्धारित करे और हम भारत के नागरिक एक शोषण मुक्त वातावरण में सांस ले सकें।

हम भारत के नागरिक इस शोषण मुक्त वातावरण और संबंधित विकास कार्यक्रमों का सपना पिछले सात दशकों से अपनी चेतना में बनाए बैठे हैं, लेकिन सरकारें इस सपने को साकार करने में कामयाब नहीं रही हैं। भारत का कोई भी राज्य एवं केंद्र शासित प्रदेश ऐसा नहीं है जहां न्यायपालिका, कार्यपालिका एवं विधायिका विवादों के घेरे में न हो।

केंद्रीय सरकार की कार्यप्रणाली तथा अन्य केंद्रीय निकायों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठते रहे हैं। आए दिन सामने आन वाले भ्रष्टाचार के मामले हों, पुलिस थाने में अपराधियों के साथ किया जाने वाला व्यवहार हो, अस्पतालों में उपयुक्त समय पर इलाज न मिलने से मौतों की घटनाएं हों, नवजात शिशुओं की मृत्युदर की बात हो।

फिर पर्यावरणीय असंतुलन, जातीय एवं सांप्रदायिक उन्माद, खाप पंचायतों का आतंक, अभिजात वर्गों के व्यावसायिक हितों के कारण जनसुविधाओं पर नकारात्मक प्रभाव और केंद्र एवं राज्यों के मध्य के विवाद हों, या फिर किसान-मजदूर वर्गों के हितों की उपेक्षा, ये इन तर्कों की पुष्टि करते हैं कि हम भारत के नागरिक दो भागों में विभाजित कर दिए गए हैं।

एक वह वर्ग जो शक्तिशाली है और जनतंत्र की शर्तों को सुनिश्चित करता है और दूसरा वर्ग इसके अधीन रहने वाला। भारत के लोगों का यह दूसरा वर्ग पूरी तरह शक्तिहीन है, जिसे केवल चुनाव के समय आश्वासन की मरहम देकर जगाया जाता है। उसे हर पांच साल में जनतंत्र का सपना देखने को कहा जाता है और सपना दिखाने के बाद सपना दिखाने वाले लोग उस वर्ग का न केवल उत्पीड़ित करते हैं, अपितु धर्म, जाति, क्षेत्र, लिंग इत्यादि आधार पर लड़वा कर ‘हम’ और ‘वे’ में ऐसा बांटते हैं कि जनतंत्र शून्य की स्थिति में पहुंच जाता है।

प्राचीन काल से ही किसी भी समाज में मनुष्य की आर्थिक परिस्थिति का निर्धारण मुख्यत: पुरुष की गतिविधियों से नियमित व संचालित होता आया है। लेकिन यदि अधिकांश परिवारों की दिन-प्रतिदिन की गतिविधियों को देखा जाए तो माहिलाएं अनवरत रूप से कार्य करते हुए नजर आती हैं। इसके बावजूद परिवार और समाज में महिलाओं को आर्थिक स्तंभ के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता।

देश में अब महिलाएं भले उच्च पदों पर पहुंचने लगी हैं, लेकिन यह संख्या बहुत छोटी है। यही कारण है कि आजादी के इतने बरसों के बाद भी देश में आधी आबादी की स्थिति संतोषजनक नहीं कही जा सकती। बलात्कार, घरेलू हिंसा, दुर्व्यवहार, कन्या भ्रूण हत्या, सम्मान की खातिर हत्या (आॅनर किलिंग), महिलाओं पर तेजाबी हमले आदि ऐसी घटनाएं हैं जो एक सच्चे लोकतंत्र पर सवाल खड़े करती हैं।

नव्य-उदारवाद का शायद यही उद्देश्य है कि ‘जनतंत्र का समाजशास्त्र’ समाप्त हो और एक ऐसा अधिनायकवाद आए जो केवल और केवल लोकतंत्र और विकास की छद्म चर्चा करें। अरस्तु ने कहा था कि ‘लोकतंत्र में गरीबों के पास अमीरों की तुलना में अधिक शक्ति होगी, क्योंकि वे संख्या में अधिक होंगे और बहुमत की इच्छा सर्वोपरि होगी’। लेकिन क्या ऐसा लोकतंत्र मूर्त रूप ले पाया है, आजादी के तिहत्तर वर्ष बाद यह चिंतन और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

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