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चुनाव सुधार पर शिथिल प्रयास

समाज अगर व्यक्ति का निर्माता है, तो व्यक्ति भी समाज का निर्माण करता है।

चुनाव सुधार पर शिथिल प्रयास

बिभा त्रिपाठी

चुनाव सुधार की नीतियों में पारदर्शिता हो, सोच में समग्रता, कर्म में निष्ठा और अनुपालन में ईमानदारी हो। ऐसा व्यापक और समावेशी प्रयास हम सबको एक स्वस्थ लोकतंत्र की यात्रा में एक कदम आगे ले जाएगा, इसमें कोई संदेह नहीं।

विसंगतियों और विडंबनाओं से भरे इस समाज के जाने कितने ऐसे स्याह पक्ष हैं, जिनको आजादी के बाद से ही इंगित किया जाता रहा है। पर लगता है कि ये मुद्दे निदान की एक ऐसी पटरी पर सवार हैं, जहां महज यह भ्रम पैदा होता है कि कहीं दूर जाकर ये मिलेंगे और समस्याएं दूर हो पाएंगी, मगर यह हो न सका। चुनाव सुधार भी ऐसा ही एक मुद्दा है। समितियों और सरकार के प्रयासों को देख कर लगता है, मानो ये हाथी के दांत, हैं जो खाने के और, दिखाने के और होते हैं। ऐसे में सर्वप्रथम आवश्यकता इस बात की है कि हम सब यह समझें कि किसी लोकतांत्रिक देश की निरंतरता, प्रगति और विकास की धुरी है, उस देश की स्वस्थ, स्वतंत्र, निष्पक्ष और प्रभावी चुनाव-व्यवस्था, जो धनबल, बाहुबल और सत्ताबल से मुक्त हो।

समाज अगर व्यक्ति का निर्माता है, तो व्यक्ति भी समाज का निर्माण करता है। इस कथन का निहितार्थ है कि हर व्यक्ति का निर्णय महत्त्वपूर्ण है और सरकार को इसका महत्त्व समझना चाहिए। अब प्रश्न है कि ऐसे कौन-से मुद्दे हैं, जिन पर चुनाव आयोग की नजर पड़ी और बातें हुई, ऐसे कौन से मुद्दे हैं, जिन्हें राजनीतिक दलों द्वारा उठाया गया और ऐसे कौन-से मुद्दे हैं, जिन पर अब तक कोई चर्चा नहीं हुई?

प्रश्न यह भी है कि क्या एक नागरिक को अपने एक वोट का सही अर्थ, आवश्यकता और महत्त्व का भान है? क्या दलबदल कानून अपनी प्रासंगिकता खो चुका है? क्या चुनाव नतीजे आने के तत्काल बाद, पूर्ण बहुमत का अभाव और सरकार बनाने की जोड़-तोड़ के तनाव ने लोकतंत्र की रीढ़ पर हमला कर दिया है और क्या नोटा की गंभीरता को समझने की कोशिश की गई है? क्या भारत के संविधान की प्रस्तावना में अभिव्यक्त मूल्य और निरीह, लाचार, दिग्भ्रमित, बेरोजगारों के स्वप्नों के बीच की खाई इतनी गहरी हो चुकी है कि इसने देश को धर्म और जाति के नाम पर नितांत कठोर, असंवेदनशील और असहिष्णु बना दिया है?

आज इन प्रश्नों पर न सिर्फ बहस करने, बल्कि एक उचित समाधान ढूंढने की भी आवश्यकता है, क्योंकि यह देश हमारी आन, बान और शान है और इसके ध्वज में कहीं भी लघुता ग्रंथि का कीड़ा नहीं लगना चाहिए। ध्यान देने योग्य बात है कि हमेशा एक रेखा को छोटी करने के लिए उससे बड़ी रेखा खींच देना ही विकल्प नहीं होता, कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हमें अपनी रेखा को बड़ी करने के प्रयास की आवश्यकता इसलिए नहीं होती, क्योंकि उसके बगल में कोई रेखा ही नहीं होती (ऐसा भारत के पड़ोसी देशों की समस्याओं के संदर्भ में कहा जा सकता है)।

अब राजनीति का अपराधीकरण नहीं, बल्कि अपराधों का राजनीतिकरण हो गया है। अब दलबदल नहीं, व्यक्ति बदल, व्यक्तित्व बदल, विचार बदल, वैचारिकी बदल, चुनाव और लाभ के लिए सब कुछ जायज है की नीति एकरूपता और समभाव के साथ अपनाई जा रही है। वहीं शैक्षणिक संस्थानों में इस विषय पर शोध की आवश्यकता महसूस हो रही है कि कि चुनावी घोषणापत्र को जनता के साथ किया गया करार माना जाए और अगर उसे पूरा न किया जा सके तो उस दल को कानूनी दलदल में घसीटा जाए।

आजकल मुफ्त योजनाओं पर जुमलेबाजी और कटाक्ष एक पुरानी कहावत की याद दिलाते हैं कि तुम करो तो पुण्य और हम करें तो पाप। दरअसल, अब लोगबाग प्रतिस्पर्धा बेहतरी के लिए नहीं करते, बल्कि गिरावट के लिए करते हैं। जबकि होना यह चाहिए कि शिक्षा और स्वास्थ्य की मुफ्त व्यवस्था हो और अन्यान्य किसी भी स्थिति में कुछ भी मुफ्त में न दिया जाए, क्योंकि श्रम का अपना महत्त्व है। हम व्यक्ति की उम्र, क्षमता और योग्यता के अनुसार उससे काम लें और फिर उसके योगदान के अनुरूप उदार पारिश्रमिक प्रदान करें।

कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि अब ऐसा महसूस किया जा रहा है कि समस्त करदाताओं को देश के नीति निर्धारण में भागीदार बनाया जाए और मुफ्त की सरकारी योजनाओं पर उनसे उचित विमर्श किया जाए। अगर चुनाव सुधारों की बात की जाए तो सर्वप्रथम यह सुनिश्चित होना चाहिए कि सुधार स्थायी और जड़ों तक पहुंचने वाले हों। इन सुधारों की पृष्ठभूमि में स्वस्थ, जीवंत और जुझारू लोकतंत्र की छवि हो, जो समग्रता, समावेश और समायोजन के स्तंभों पर टिकी हो और ठोस सैद्धांतिक सुधारों के साथ व्यवहार के हर पहलू को परखती हो।

चुनाव सुधार में निर्वाचन आयोग की भूमिका पर बात करते समय ऐसा लगता है कि जब टीएन शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त बने तब पहली बार देश को चुनाव आयोग जैसी किसी संस्था का भान हुआ। वास्तव में शक्ति का विकेंद्रीकरण लोकतंत्र की एक प्रमुख विशेषता है और निर्वाचन आयोग की शक्ति पूर्णरूपेण स्वंतत्र होनी ही चाहिए और इसके पदाधिकारियों की जवाबदेही सिर्फ जनता के प्रति होनी चाहिए।

भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने चुनाव सुधार के मद्देनजर कहा था कि लगभग चालीस से भी ज्यादा संस्तुतियों पर विमर्श कर उस पर निर्णय लेने की आवश्यकता है। मसलन, चुनाव में होने वाले खर्च की सीमा क्या होगी? निर्दलीय उम्मीदवार के लिए क्या नीति होगी? चुनाव प्रचार के तौर-तरीके, माध्यम और खर्च, राजनीतिक दलों के हवाई यात्रा, सम्मेलनों की सीमा, सोशल मीडिया का उपयोग और दुरुपयोग, स्थानीय प्रतिनिधित्व को वरीयता, एक देश एक मतदान व्यवस्था, मतदाता पहचान-पत्र और आधार कार्ड को जोड़ने की व्यवस्था, एक समय पर चुनाव, चुनाव आयुक्त का चयन दायित्व और समयावधि, राष्ट्रीय चुनाव कोष की स्थापना और संचालन जैसे मुद्दों का सर्वसम्मति से निस्तारण होना चाहिए।

चुनाव सुधार के लिए गठित समितियों और सेवा निवृत्त मुख्य निर्वाचन आयुक्तों द्वारा सुझाए गए विकल्पों पर काम करने की आवश्यकता है। और आवश्यक हो तो संविधान में उचित संशोधन किया जाए। इसके साथ ही या तो तकनीकी प्रगति का हर संभव लाभ लेते हुए मतदाता को अपने मोबाइल फोन से अपना मत देने तक की व्यवस्था की जाए, ताकि अपनी सेवा शर्तों के अनुसार वह अपने निर्वाचन क्षेत्र से दूर भी हो, तो मतदान से वंचित न रह सके अन्यथा मतपत्र की पुरानी प्रणाली और डाक मतपत्र आदि के विकल्प पर बात की जाए।

आज आवश्यकता इस बात की भी है कि हमारे देश की शिक्षा-व्यवस्था में सुधार किया जाय। पाठ्यक्रम में उचित बदलाव करते हुए चुनाव की प्रक्रिया, वोट के मायने, प्रतिनिधित्व लोकतंत्र की आवश्यकता और अन्य प्राथमिकताओं पर सघन चर्चा की व्यवस्था होनी चाहिए। राजनीतिक दलों को यह समझना बहुत जरूरी है कि उन्हें राष्ट्र की समग्र उन्नति के लिए कार्य करना है, वैश्विक स्तर की उत्तम अर्थव्यवस्था, शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य का प्रबंध करना है और ऐसी नीतियां बनानी हैं, जो संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करते हुए लोकतंत्र को लगातार मजबूती प्रदान करें, ताकि आने वाली सरकार अपनी पूर्ववर्ती सरकार के नीतियों का अनुसरण करें और हर हार के लिए पूर्ववर्ती सरकार का नाम लेने की आवश्यकता न पड़े।

प्रख्यात विधिशास्त्री जेरेमी बेंथम के उपयोगितावाद के सिद्धांत का अनुसरण करते हुए इस प्रकार से चुनाव सुधार किया जाए, जिसमें ज्यादा से ज्यादा लोगों के हितों की रक्षा हो सके और कम से कम लोगों को कम से कम परेशानी हो सके। चुनाव सुधार की नीतियों में पारदर्शिता हो, सोच में समग्रता, कर्म में निष्ठा और अनुपालन में ईमानदारी हो। ऐसा व्यापक और समावेशी प्रयास हम सबको एक स्वस्थ लोकतंत्र की यात्रा में एक कदम आगे ले जाएगा, इसमें कोई संदेह नहीं।

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