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राजनीतिः ईशनिंदा कानून और खतरे

भारतीय पंजाब में ईशनिंदा के आरोप में उम्रकैद के प्रावधान को लेकर तमाम विवाद इसलिए उठ रहे हैं कि पंजाब भी सख्त कानूनों के दुरुपयोग को लेकर खासा बदनाम रहा है। यहां पर राजनीतिक दलों पर सत्ता हासिल करने के बाद कानूनों के दुरुपयोग के आरोप लगते रहे हैं। पंजाब में एनडीपीएस कानून के दुरुपयोग के अब तक ढेरों मामले सामने आ चुके हैं।

पाकिस्तान की तरह फांसी तो नहीं, पर धार्मिक ग्रंथों के अपमान पर उम्रकैद अब भारत में भी हो सकती है। भारत के राज्य पंजाब ने इस दिशा में कदम उठाया है। पंजाब विधानसभा ने हाल में पाकिस्तान की तर्ज पर ईशनिंदा कानून की धाराओं में संशोधन की मंजूरी दे दी। पंजाब में अब चार धार्मिक ग्रंथों के अपमान पर अब उम्रकैद की सजा हो सकती है। हालांकि अभी इस संशोधन को मंजूरी केंद्र से मिलेगी, तभी नया कानून अमल में आएगा। पंजाब सरकार ने संशोधन के तहत भारतीय दंड संहिता की धारा 295 एए को शामिल किया है। इसके तहत भागवत गीता, कुरान, बाइबिल और गुरुग्रंथ साहिब के अपमान, नुकसान या नष्ट करने के आरोपी को उम्रकैद की सजा का प्रावधान किया गया है। हालांकि पहले भी धार्मिक भावनाओं पर चोट पहुंचाने के आरोप में सजा का प्रावधान था, लेकिन यह सजा काफी कम थी।

नए ईशनिंदा कानून की पृष्ठभूमि पूर्ववर्ती अकाली दल के समय की थी। अकाली दल ने गुरुग्रंथ साहिब के अपमान और नुकसान के आरोपियों के लिए उम्रकैद का प्रावधान रखा था। लेकिन उस समय केंद्र ने पंजाब विधानसभा द्वारा पारित बिल लौटा दिया था। केंद्र का तर्क था कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। इसलिए किसी एक धर्म के ग्रंथ के अपमान को लेकर विशेष सजा का प्रावधान देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को नुकसान पहुंचाता है। इसके बाद कांग्रेस की सरकार ने संशोधन में बाइबिल, कुरान और भागवत गीता को शामिल किया गया। हालांकि भागवत गीता को शामिल किए जाने को लेकर भी बहस है, क्योंकि अन्य धर्मों की तरह हिंदुओं में एक ही पवित्र ग्रंथ नहीं है। हिंदू धर्म में कई धर्म ग्रंथ हैं। वैसे में सिर्फ भागवत गीता को ही ईशनिंदा में शामिल किए जाने पर भी सवाल है। बहस इस पर भी हो रही है कि क्या कड़े कानून लाने से ही धर्मग्रंथों का अपमान रुक जाएगा। क्या इस कानून का दुरुपयोग नहीं होगा, जैसे अन्य कानूनों का दुरुपयोग करने के लिए पंजाब पुलिस बदनाम रही है। सवाल यह भी उठ रहे हैं कि ईशनिंदा कानून से संबंधित नए बिल को मंजूरी देने से पहले पंजाब सरकार ने पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में लागू ईशनिंदा कानून के परिणामों का अध्ययन किया।

अकाली सरकार के समय में ईशनिंदा से संबंधित बिल लाए जाने पर बहस छिड़ गई थी। ईशनिंदा को लेकर संशोधन बिल लाने के पीछे पृष्ठभूमि यह थी कि पंजाब में पिछले पांच साल में गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी के कई मामले सामने आए। पंजाब में डेरा प्रेमियों और सिख संगतों के बीच चल रहे विवाद के कारण बेअदबी के मामले ने काफी तनाव पैदा कर दिया। बेअदबी के मामले को लेकर डेरा प्रेमियों पर आरोप लगे। कई जगहों पर धार्मिक तनाव पैदा हो गया। पुलिस फायरिंग भी हुई, कुछ लोग मारे गए। इसके बाद सरकार ने ईशनिंदा को लेकर उम्रकैद संबंधी प्रावधान सामने रखा। लेकिन इस पर बहस शुरू हो गई। तर्क दिया जा रहा है कि मौजूदा कानून के तहत ही मामले निपटाए जाने चाहिए थे।

मौजूदा कानून का ही प्रभावी इस्तेमाल होना चाहिए था। तर्क यह भी दिया जा रहा है कि पाकिस्तान से सबक लेते हुए भारतीय पंजाब में कानून में संशोधन की जरूरत नहीं थी, क्योंकि पाकिस्तानी पंजाब में इस कानून का दुरुपयोग सबसे ज्यादा हुआ। ठीक उसी तर्ज पर भारतीय पंजाब में इसका दुरुपयोग होगा। उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान में ईशनिंदा के सख्त कानून लागू होने के बाद ईशनिंदा के मामलों में तेजी से वृदि हो गई। लोगों ने कानून हाथ में लिया, कई जगहों पर दंगे हो गए। पाकिस्तानी पंजाब में ईशनिंदा के सख्त कानून के बहाने लोगों ने निजी दुश्मनियां निकालीं। बहुसंख्यक समुदाय अल्पसंख्यक ईसाइयों और अहमदियों को इस कानून के सहारे निशाने पर लिया। पाकिस्तानी पंजाब में बहुसंख्यक समुदाय के लोग भी निजी दुश्मनी के चक्कर में इसके शिकार हुए।

पाकिस्तान में जनरल जिया उल हक के शासन में मौत की सजा से युक्त ईशनिंदा कानून लागू किया गया था। जिया के कानून में पवित्र पैगंबर और पवित्र कुरान के अपमान पर मौत की सजा प्रावधान रखा गया। दिलचस्प बात यह थी कि पाकिस्तान में 1947 से 1986 के बीच ईशनिंदा के कुल चौदह मामले सामने आए थे। लेकिन 1986 में ईशनिंदा कानून में संशोधन के बाद ईशनिंदा के मामलों में बाढ़ आ गई। इसके तहत कुल चार हजार से ज्यादा मामले अब तक सामने आए हैं। ईशनिंदा के तहत मौत की सजा के प्रावधान के बाद पाकिस्तान में भीड़तंत्र ने सड़कों पर ईशनिंदा के मामलों में फैसला करना शुरू कर दिया। कई मामलों में मुकदमों के दौरान ही आरोपियों की हत्या कट्टरपंथियों ने कर दी। यही नहीं, कट्टरपंथियों ने ईशनिंदा के आरोपियों के पैरवी करने वाले नेताओं और वकीलों की भी हत्या की। पंजाब के गर्वनर सलमान तासीर की हत्या उनके ही सुरक्षा गार्ड मुमताज कादिरी ने इसलिए कर दी थी कि वे ईशनिंदा की दोषी महिला की पैरवी कर रहे थे। पाकिस्तानी तालिबान ने 2011 में पाकिस्तान में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री शाहबाज भट्टी की हत्या कर दी थी। भट्टी पर ईशनिंदा का आरोप लगाया गया था।

हालांकि पाकिस्तान में ईशनिंदा कानून के शिकार सिर्फ अल्पसंख्यक ही नहीं हुए। आंकड़ों के मुताबिक ईशनिंदा कानून के कुल शिकार हुए लोगों में उनचास फीसद ही गैर मुसलिम हैं। बहुसंख्यक समुदाय के खिलाफ भी ईशनिंदा कानून का इस्तेमाल निजी दुश्मनी निकालने के लिए किया गया। ईशनिंदा के आरोप में दर्ज कुल मामलों में छब्बीस फीसद मामले अहमदियों और इक्कीस फीसद मामलें इसाइयों के खिलाफ थे। ईशनिंदा कानून की प्रताड़ना से हिंदू इसलिए बच गए कि उनकी आबादी पाकिस्तानी पंजाब में न के बराबर है। जबकि ईशनिंदा के सत्तर फीसद मामले पाकिस्तानी पंजाब में सामने आए, जहां हिंदुओं की आबादी काफी कम है। सेंटर फॉर सोशल जस्टिस नामक एक स्वंयसेवी संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक ईशनिंदा के दर्ज कुल मामलों में चौहत्तर फीसद मामले पंजाब प्रांत से संबंधित हैं। वहीं लाहौर ईशनिंदा के तहत दर्ज मामलों में पूरे देश में ऊपर है।

भारतीय पंजाब में ईशनिंदा के आरोप में उम्रकैद के प्रावधान को लेकर तमाम विवाद इसलिए उठ रहे हैं कि पंजाब भी सख्त कानूनों के दुरुपयोग को लेकर खासा बदनाम रहा है। यहां पर राजनीतिक दलों पर सत्ता हासिल करने के बाद कानूनों के दुरुपयोग के आरोप लगते रहे हैं। पंजाब में एनडीपीएस कानून के दुरुपयोग के अब तक ढेरों मामले सामने आ चुके हैं। कई मामलों में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायलय से पुलिस को खासी फटकार मिली है। आशंका जताई जा रही है कि अन्य कानूनों की तरह ही इस कानून का उपयोग के बजाए दुरुपयोग होगा और इस कानून के बहाने पुलिस जबरन वसूली लोगों से करेगी। पंजाब पुलिस निजी दुश्मनी निकालने के लिए भी लोगों को सख्त कानून की आड़ में फंसाती रही है।

पंजाब में दूसरे कानूनों का भी दुरुपयोग करने का आरोप पुलिस पर लागातार लगता रहा है। दस सालों के अकाली दल के राज में कांग्रेस ने कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के पुलिस उत्पीड़न का आरोप लगाया। कांग्रेस का आरोप था कि कई जगह पर उसके कार्यकर्ताओं पर एनडीपीएस के तहत फर्जी मुकदमे डाले गए। पिछले साल सत्ता में लौटने के बाद थानों में दर्ज फर्जी मामलों की जांच को लेकर पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायलय के सेवानिवृत न्यायधीश जस्टिस एमएस गिल के नेतृत्व में आयोग का गठन किया। आयोग ने अकाली दल सरकार के कार्यकाल में दर्ज सैकड़ों मामलों की शिकायतों को सुना। अपने पहले अंतरिम रिपोर्ट में गिल ने कुल एक सौ अठहत्तर मामलों को झूठा पाया था। आयोग ने पाया कि पुलिस ने दुराचार से संबंधित कानून का भी दुरुपयोग किया। ऐसे में ईशनिंदा कानून का दुरुपयोग नहीं होने की गारंटी कौन देगा?

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