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राजनीतिः भूमि सुधार से मिटेगी गरीबी

भूमि सुधारों की यह उपेक्षा बहुत महंगी पड़ी है। समय-समय पर ग्रामीण निर्धनता कम करने की अनेक परियोजनाओं के क्रियान्वयन के बावजूद सबसे निर्धन परिवारों की स्थिति में अपेक्षाओं के अनुकूल सुधार न हो पाने का एक महत्त्वपूर्ण कारण भूमि सुधारों की उपेक्षा ही है। इसलिए अब समय आ गया है कि अनेक वर्षों की उपेक्षा को दूर कर भूमि सुधार के क्षेत्र में नए सिरे से महत्त्वपूर्ण कदम उठाए जाएं।

Author September 6, 2018 12:52 AM
सबसे निर्धन गांववासी या तो भूमिहीन हैं या लगभग भूमिहीन हैं। यदि इन परिवारों में गरीबी और भूख दूर करने और उन्हें खाद्य सुरक्षा प्रदान करने के टिकाऊ उपाय खोजने हैं तो इनमें भूमि सुधारों को महत्त्वपूर्ण स्थान मिलना चाहिए।

भारत डोगरा

सबसे निर्धन गांववासी या तो भूमिहीन हैं या लगभग भूमिहीन हैं। यदि इन परिवारों में गरीबी और भूख दूर करने और उन्हें खाद्य सुरक्षा प्रदान करने के टिकाऊ उपाय खोजने हैं तो इनमें भूमि सुधारों को महत्त्वपूर्ण स्थान मिलना चाहिए। अन्य उपायों से अल्पकालीन राहत मिल सकती है, पर भूमि आधार मिलने से इन परिवारों को स्थायी तौर पर आजीविका मिलेगी और पूरे वर्ष का नहीं तो आधे वर्ष का भोजन उनकी अपनी खेती से सुनिश्चित हो सकेगा। विश्व स्तर पर अनेक अध्ययनों में ग्रामीण निर्धनता दूर करने में भूमि सुधारों व विशेषकर भूमि पुनर्वितरण के महत्त्व को स्वीकार किया गया है। इतना ही नहीं, भूमि सुधारों को कृषि उत्पादकता की दृष्टि से भी उपयोगी माना गया है। विशेषकर यदि भूमि प्राप्त करने वाले गांववासियों को लघु सिंचाई उपलब्ध करवा दी जाए व आत्मनिर्भर, न्यूनतम खर्च की खेती का अच्छा प्रशिक्षण दिया जाए तो वे अपनी मेहनत के बल पर, कम खर्च पर बेहतर उत्पादकता देने का अच्छा उदाहरण प्रस्तुत कर सकते हैं।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के एक अध्ययन के अनुसार यदि भूमि का पूरी तरह समतावादी वितरण भूमिहीनों सहित सभी ग्रामीण परिवारों में हो तो विभिन्न देशों में खाद्य उत्पादन दस से अस्सी फीसद तक बढ़ सकता है। कृषि व खाद्य संगठन के एक अध्ययन के अनुसार यदि भारत में निर्धन भूमिहीन परिवारों में पांच फीसद कृषि भूमि का भी पुनर्वितरण हो जाए और साथ में सिंचाई में सुधार हो तो ग्रामीण निर्धनता में तीस फीसद कमी हो सकती है। सबसे निर्धन भूमिहीन परिवारों को कुछ भूमि प्राप्त होने से गांव में उनका आधार मजबूत होगा। भूमि सुधारों की इस महत्त्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए आजादी के पहले तीस से पैंतीस वर्षों में इन्हें ग्रामीण विकास में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया। भूमि सुधार में प्रगति तो अधिक नहीं हुई, पर इसके महत्त्व को स्वीकार किया गया। लेकिन 1990 के दशक में नव-उदारीकरण की आर्थिक नीतियों के आगमन के बाद भूमि सुधार को बुरी तरह उपेक्षित कर दिया गया। इसकी स्वीकृति अनेक सरकारी दस्तावेजों तक में मिलती है।

दसवीं पंचवर्षीय योजना के दस्तावेज में योजना आयोग ने कहा कि भूमि पुनर्वितरण के संदर्भ में नौवीं योजना के अंत में स्थिति वही थी, जो योजना के आरंभ में थी। दूसरे शब्दों में नौवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान इस क्षेत्र में कोई प्रगति नहीं हुई। यह दस्तावेज स्पष्ट कहता है-‘छिपाई गई भूमि का पता लगाने व उसका ग्रामीण भूमिहीन निर्धन परिवारों में वितरण करने में कोई प्रगति नहीं हुई।’ इतना ही नहीं, आगे यह दस्तावेज स्वीकार करता है, ‘1990 के दशक के मध्य में लगता है कि भूमि सुधारों को पृष्ठभूमि में धकेल दिया गया। हाल के समय में राज्य सरकारों की पहल इससे संबंधित रही है कि भूमि कानूनों का उदारीकरण हो ताकि बड़े पैमाने पर कारपोरेट कृषि को बढ़ावा मिल सके।’

ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में भूमि सुधार संबंधी मुद्दों का आधार तैयार करने के लिए योजना आयोग ने एक कार्य समूह नियुक्त किया था। इस समूह ने स्पष्ट कहा है-‘लगता है आर्थिक उदारीकरण शुरू होने के बाद सरकार की भूमि सुधार में रुचि लुप्त हो गई।’ इतना ही नहीं, स्पष्ट शब्दों में समूह ने अपनी रिपोर्ट में कहा है-‘भूमि हदबंदी (लैंड सीलिंग) की सीमा को बढ़ाने या इस कानून को समाप्त ही करने के लिए एक मजबूत लॉबी सक्रिय है।’ रिपोर्ट कहती है-‘1980 के दशक के मध्य में जब भारतीय अर्थव्यवस्था में उदारीकरण का प्रवेश पहले गुपचुप होने लगा और वर्ष 1991 से तो एक तूफान की तरह, भारतीय नीति निर्धारण के रडार स्क्रीन से भूमि सुधार गायब हो गए। भूमि सुधार भुला दिया गया एजेंडा बन गया। सरकार में बाजारवाद की वकालत करने वाले इन भूमि सुधारों के बारे में बात भी नहीं करना चाहते हैं ताकि कहीं भूमि के सौदागर इस क्षेत्र में सरकार की भूमिका से घबरा न जाएं। सत्तर के दशक में केंद्रीय निर्देशों पर आधारित जो भूमि सुधार लाए गए थे, वे इन बाजारवादियों को न केवल अनचाहे अवरोध लग रहे हैं, बल्कि भूमि के बाजार में पूंजी के खुले खेल के लिए एक मुसीबत लग रहे हैं।’

भूमि सुधारों की यह उपेक्षा बहुत महंगी पड़ी है। समय-समय पर ग्रामीण निर्धनता कम करने की अनेक परियोजनाओं के क्रियान्वयन के बावजूद सबसे निर्धन परिवारों की स्थिति में अपेक्षाओं के अनुकूल सुधार न हो पाने का एक महत्त्वपूर्ण कारण भूमि सुधारों की उपेक्षा ही है। इसलिए अब समय आ गया है कि अनेक वर्षों की उपेक्षा को दूर कर भूमि सुधार के क्षेत्र में नए सिरे से महत्त्वपूर्ण कदम उठाए जाएं। इस सार्थक पहल का एक रूप यह हो सकता है कि जो विभिन्न कार्य आधी-अधूरी स्थिति में पड़े हैं, कम से कम उन्हें पूरा कर दिया जाए। एक महत्त्वपूर्ण अधूरा कार्य सभी ग्रामीण परिवारों को कानूनी तौर पर मान्य आवास भूमि सुनिश्चित करने से संबंधित है।

हमारे गांवों में आज भी लाखों की संख्या में ऐसे लोग हैं जिनके पास समुचित कानूनी अधिकार व कागजात सहित अपनी आवास भूमि तक नहीं है। वे किसी तरह सरकारी या गांव समाज की ऐसी जमीन पर रह कर गुजर-बसर कर रहे हैं जिसे अतिक्रमण बता कर हटाया जा सकता है, या वे ऐसी भूमि पर रह रहे हैं जिसे बड़े भूस्वामी अपनी भूमि बताते हैं। इस तरह की भूमि पर रहने की मजबूरी के कारण इन भूमिहीन परिवारों को धनी परिवारों की कभी बेगारी करनी पड़ती है, तो कभी कोई अन्य जोर-जबरदस्ती सहनी पड़ती है।
अब समय आ गया है कि इन सभी परिवारों को शीघ्र ही आवासीय भूमि पर्याप्त कानूनी अधिकार सहित सुनिश्चित करवा दी जाए। इस संदर्भ में कुछ वर्ष पहले भारत सरकार द्वारा गठित राष्ट्रीय भूमि सुधार समिति की संस्तुतियां भी विचारणीय हैं। इस समिति ने सभी आवासहीन परिवारों को भूमि देने को कहा। समिति ने कहा कि सभी भूमिहीनों के आवास अधिकार को मान्यता मिलनी चाहिए। ग्राम सभा की देखरेख व सहमति से प्राथमिकता के आधार पर बेघर व भूमिहीन परिवारों की सूची बनानी चाहिए। भूमि स्वामित्व में महिलाओं का नाम जरूर रहना चाहिए। आवास भूमि के साथ अन्य जरूरी सुविधाएं भी मिलनी चाहिए।

एक अन्य महत्त्वपूर्ण कार्य आदिवासी भूमि व वन अधिकारों के संदर्भ में है। इस कानून से उम्मीदें तो बहुत थीं, पर यह बहुत आधे-अधूरे रूप में कार्यान्वित हुआ। कुछ स्थानों पर तो आदिवासी व ‘अन्य वनवासी’ समुदायों को बहुत निराशा हुई है। अत: इस कानून की एक समीक्षा समिति बनाई जानी चाहिए जो इन समुदायों की उम्मीदों को पूरा करने के अनुरूप संस्तुतियां दे सके व फिर इन्हें कार्यान्वित भी करना चाहिए। जहां वन उजड़ रहे हैं, वहां वनों को फिर से हरा-भरा करने का कार्य इन समुदायों को सौंपा जा सकता है, इसके बदले में (अल्प-कालीन मजदूरी के अतिरिक्त) उन्हें दीर्घकालीन स्तर पर इन वनों से लघु वन-उपज प्राप्त करने के अधिकार किए जा सकते हैं।

केंद्र सरकार में निरंतरता से राष्ट्रीय स्तर पर भूमि सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए कार्य होता रहे, इसके लिए भूमि सुधारों पर राष्ट्रीय कार्यबल के पहले के प्रस्ताव को सक्रिय करना भी आवश्यक है। यदि इस संदर्भ में स्पष्ट और मजबूत राष्ट्रीय स्तर की नीति बनेगी, तो इससे भूमि सुधारों को आगे बढ़ाने में राज्य सरकारों व उत्साही अधिकारियों को भी मदद मिलेगी। हाल के वर्षों में कभी ‘जनादेश’ तो कभी जन-सत्याग्रह तो कभी ‘जनांदोलन’ के नाम पर जनसंगठनों ने भूमि सुधारों के मुद्दे को नवजीवन देने का प्रयास किया है। ऐसे और अधिक प्रयास करने और इस मुद्दे पर व्यापक एकता बनाने की जरूरत है। तभी भूमि सुधारों के अनेक महत्त्वपूर्ण आधे-अधूरे कार्यों को संतोषजनक पूर्णता की ओर ले जाया जा सकेगा। हमें ऐसा भूमि सुधार कार्यक्रम तय करना चाहिए जो भारतीय ग्राम समाज की स्थितियों के अनुकूल हो और जिसे व्यापक मान्यता हासिल हो सके तथा जो अहिंसा की राह पर क्रियान्वित हो सके।

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