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जमीन पर छिड़ी जंग

भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के अगुआ रहे अण्णा हजारे ने मोदी सरकार पर आरोप लगाया है कि उसे केवल कॉरपोरेट जगत की चिंता है। वर्ष 2013 में लंबी जद्दोजहद के बाद संसद में पारित ‘उचित मुआवजा, भूमि अधिग्रहण में पारदर्शिता, पुनर्वास और पुनर्स्थापन के अधिकार अधिनियम’ के माध्यम से किसानों-आदिवासियों के जो थोड़े-बहुत हित संरक्षित हो […]

Author February 26, 2015 18:06 pm
भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के अगुआ रहे अण्णा हजारे ने मोदी सरकार पर आरोप लगाया है कि उसे केवल कॉरपोरेट जगत की चिंता है।(फ़ोटो-पीटीआई)

भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के अगुआ रहे अण्णा हजारे ने मोदी सरकार पर आरोप लगाया है कि उसे केवल कॉरपोरेट जगत की चिंता है। वर्ष 2013 में लंबी जद्दोजहद के बाद संसद में पारित ‘उचित मुआवजा, भूमि अधिग्रहण में पारदर्शिता, पुनर्वास और पुनर्स्थापन के अधिकार अधिनियम’ के माध्यम से किसानों-आदिवासियों के जो थोड़े-बहुत हित संरक्षित हो पाए थे, उनकी भी इस सरकार ने बाजार-देवता के सामने बलि चढ़ा दी है। बीते वर्ष के अंतिम दिन एक अध्यादेश लाकर सरकार ने जिस प्रकार विधायिका को अंगूठा दिखाते हुए संसद में सर्वदलीय राय से पारित भूमि अधिग्रहण अधिनियम (2013) को रौंद डाला है, उससे किसान और आदिवासी स्वयं को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

आजादी के छियासठ साल बाद किसानों-आदिवासियों के राजनीतिक-सामाजिक संगठनों और जागरूक नागरिक समाज के सतत प्रयासों से अंगरेजों के जमाने का भूमि अधिग्रहण अधिनियम (1894) पिछली सरकार के समय संशोधित किया गया। ब्रिटिश कंपनियों के हितों को सिर-आंखों पर रखने वाला 1894 का वह कानून जमीन के असली मालिक अर्थात किसान-आदिवासी का पूर्णत: विरोधी था। लेकिन आजादी के इतने सालों बाद भी वह बदस्तूर जारी था। लेकिन जिस प्रकार मोदी सरकार ने हड़बड़ी में रातोंरात एक अध्यादेश लाकर 2013 के संशोधित भूमि अधिग्रहण अधिनियम को निष्प्रभावी कर दिया है, उससे उसके अलोकतांत्रिक रवैए का ही पता चलता है।

हालांकि सितंबर 2013 में संसद ने जो संशोधित भूमि अधिग्रहण अधिनियम पारित किया वह नितांत दोषमुक्त नहीं था। किसान नेताओं और नागरिक-सामाजिक संगठनों ने तर्क दिए थे कि इसमें भूमि के स्वामी किसानों, आदिवासियों के लिए समुचित मुआवजे का प्रावधान नहीं हो पाया है। इसमें ऐसे चोर-रास्ते अब भी थे जिनसे होकर सरकार अपनी चहेती निजी कंपनियों को फायदा पहुंचा सकती थी। सिंचाई परियोजनाओं को जहां इस अधिनियम के दायरे से बाहर रखा गया था, वहीं पूर्ववर्ती अधिनियम के सदृश यह भी औद्योगिक गतिविधियों और व्यापार-वाणिज्य की तरक्की के नाम पर निजी कंपनियों के लिए किए जाने वाले भूमि अधिग्रहण को हरी झंडी दिखाता था। लेकिन दूसरी ओर नवउदारवादी अर्थव्यवस्था के पैरोकार अर्थशास्त्री, उद्योगपति और सरकार इस अधिनियम को खुले दिल से गले लगाने को तैयार न थे। उन्हें यह अधिनियम विकास परियोजनाओं की लागत में बेइंतहा इजाफा करने वाला, भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया को लंबा खींचने वाला और आर्थिक विकास में अड़ंगा लगाने वाला लगता था।

लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि इस अधिनियम ने एक सीमा तक भूमि पर निर्भर रहने वाले समुदायों के हितों का संरक्षण किया था। और इसी कारण विकास के नाम पर भूमि की जो अंधी लूट चल रही थी, उसमें कुछ व्यवधान-सा भी आ खड़ा हुआ, जो नवउदारवादी अर्थव्यवस्था को पच नहीं पा रहा था। और इसी कारण औद्योगिक घरानों का पिछली यूपीए सरकार से मोहभंग भी हो गया था, उन्हें पिछले चुनावों में नरेंद्र मोदी के अच्छे दिनों में अपने भी अच्छे दिन नजर आने लगे थे।

अपनी पुश्तैनी जमीन से बेदखली के खिलाफ ग्रामीण आबादी को 2013 का अधिनियम जो संरक्षण और मुआवजे की क्षतिपूर्ति देता था, उसके प्रमुख प्रावधानों से इस अध्यादेश के जरिए मोदी सरकार ने पल्ला झाड़ लिया है। मूल अधिनियम में विकास परियोजना से प्रभावित होने वाली अधिकांश आबादी की स्वीकृति के अभाव में भूमि अधिग्रहण पर पाबंदी थी। इसमें यह प्रावधान रखा गया था कि निजी क्षेत्र की परियोजना के लिए अस्सी फीसद प्रभावित आबादी की मंजूरी और सार्वजनिक-निजी भागीदारी वाली परियोजना के लिए सत्तर प्रतिशत प्रभावित आबादी की रजामंदी अनिवार्य होगी। मगर अध्यादेश सरकार को पूरा अधिकार देता है कि वह अपनी इच्छानुसार किसी भी निजी परियोजना के लिए बिना जनता की राय जाने, बिना प्रभावित आबादी की स्वीकृति के, भूमि का अधिग्रहण औने-पौने दामों पर कर सकती है।

अधिनियम में भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया आरंभ करने से पूर्व विकास परियोजना के कारण होने वाली संभावित क्षतियों का सामाजिक आकलन करना अनिवार्य था। लेकिन यह अध्यादेश सामाजिक क्षति आकलन की अनिवार्यता को भी खारिज कर देता है। विकास परियोजनाओं की नकारात्मक परिणतियों को आर्थिक विकास के तराजू पर बट््टेखाते में डाल दिया गया है।

सामाजिक क्षति आकलन के अभाव में अब ऐसा कोई प्रावधान नहीं रह गया है जिसके तहत विकास परियोजना से प्रभावित होने वाले समुदायों को चिह्नित किया जा सके। यह निर्धारण किया जा सके कि कौन-कौन लोग किस-किस सीमा तक घाटे में रहने वाले हैं। इस प्रकार यह अध्यादेश मूल अधिनियम के उस प्रावधान की खुली अवहेलना करता है, जो उन लोगों को भी मुआवजे का हकदार बताता है, जो भूमि के वास्तविक मालिक तो नहीं होते, लेकिन जिनके अस्तित्व और आजीविका भूमि से नाभिनाल संबद्ध होते हैं। इन समुदायों में आते हैं- खेत मजदूर, बटाईदार किसान, आदिवासी, लोक कलाकार, ग्रामीण दस्तकारी पेशों से जुड़ी जातियां, मछुआरे और चरवाहे आदि।

खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अधिनियम में यह भी निर्धारित था कि दो या दो से ज्यादा फसलें देने वाली उर्वर भूमि को किसी भी सूरत में अधिग्रहीत न किया जाए। लेकिन अध्यादेश में इस प्रावधान का भी सम्मान नहीं किया गया है। इस सबके अतिरिक्त इस अध्यादेश में अधिग्रहीत भूमि को उपयोग में लेने की छूट-अवधि की मियाद भी बढ़ा दी गई है। प्राय: यह देखा गया है कि सरकारें और निजी कंपनियां भूमि अधिग्रहण में तो बड़ी हड़बड़ी दिखाती हैं, लेकिन अधिग्रहीत भूमि को लंबे समय के लिए यों ही खाली छोड़ देती हैं ताकि उसके बाजार-मूल्य में कई गुना बढ़ोतरी हो सके और फिर भू-उपयोग में कानूनी फेरबदल करके उस भूमि को ऊंची कीमत पर बेचा जा सके।

भूमि की इस बरबादी को रोकने के लिए अधिनियम में यह प्रावधान रखा गया था कि जिस उद्देश्य से भूमि का अधिग्रहण किया गया है, उसी उद््देश्य से निर्धारित समयावधि में भूमि का उपयोग अनिवार्य होगा, अन्यथा भूमि को मूल मालिक को लौटाना पड़ेगा। भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धाराओं का उल्लंघन करने वाले अधिकारियों के खिलाफ जुर्माने के प्रावधान भी इस अध्यादेश के द्वारा निरस्त कर दिए गए हैं। इस प्रकार सरकार ने अध्यादेश के जरिए भूमि अधिग्रहण अधिनियम (2013) के किसान-आदिवासी हितैषी प्रावधानों पर पानी फेर दिया है।

अध्यादेश के पक्ष में यह कहा जा रहा है कि इससे भूमि अधिग्रहण की जटिल, लंबी और थकाऊ प्रक्रिया आसान होगी, जिससे विकास परियोजनाओं को अमली जामा पहनाने में गति मिलेगी। इस अध्यादेश से भूमि अधिग्रहण की ऊंची लागत पर लगाम लगेगी, जो व्यावहारिक नहीं रह गई थी। 2013 के अधिनियम पर यह आरोप भी लगाया जा रहा है कि वह किसानों के लिए अंधे के हाथ बटेर लगने जैसा था, क्योंकि इस अधिनियम से किसान के लिए अपनी जमीन की सौदेबाजी बहुत ज्यादा मुनाफे का सौदा हो गई थी, जबकि उस ऊंची लागत पर भूमि का अधिग्रहण विकास परियोजनाओं को वास्तविकता के धरातल पर न पुसाने लायक बना रहा था।

सरकार का कहना है कि अध्यादेश भूमि के वास्तविक मालिक को तो पूर्ववत भरपूर हर्जाना देता है, लेकिन सामाजिक क्षति आकलन की अनिवार्यता समाप्त कर देने से अब अधिग्रहण की अप्रत्यक्ष लागत कम हो जाएगी। प्रभावित पक्षों की स्वीकृति वाला झंझट भी अब नहीं रहेगा, जिसके चलते भी भूमि अधिग्रहण की गति तेज हो पाएगी।

जो तमाम बातें अधिनियम के विरोध और अध्यादेश के पक्ष में कही जा रही हैं, वे सब झूठ की बुनियाद पर टिकी हैं। भूमि अधिग्रहण अधिनियम पर यह आरोप तो आप लगा रहे हैं कि इसने भूमि अधिग्रहण की लागत को गुणात्मक ढंग से अव्यावहारिक स्तर पर पहुंचा दिया। लेकिन आपका यह आरोप तब सिर के बल औंधा गिर जाता है, जब हम भूमि अधिग्रहण की लागत-गणना के सूत्र को तनिक समझने का प्रयास करें।

यह सही है कि पिछले एक दशक में बाजार में जमीन की कीमतें आसमान छू रही हैं, लेकिन इन कीमतों को अधिनियम (2013) अधिग्रहीत की जाने वाली जमीन के मुआवजे के आकलन का आधार नहीं बनाता। अधिनियम-2013 अधिग्रहीत की जाने वाली जमीन के मुआवजे के मूल्यांकन के लिए उस जमीन के कृषि-बाजार मूल्य को अपनी गणना का आधार बनाता है, जिसे अधिनियम की भाषा में ‘सर्किल रेट’ कहा गया है।

वास्तव में यह सर्किल रेट जमीन के विगत कृषि-मूल्य पर आधारित होता है, न कि उस जमीन में निहित औद्योगिक, वाणिज्यिक और आवासीय संभावनाओं पर आधारित बाजार मूल्य पर। और अर्थशास्त्र का एक सामान्य विद्यार्थी भी जानता है कि जमीन का कृषि-मूल्य तो अपेक्षया बहुत कम होता है, और इस बहुत कम कृषि-मूल्य को भी रजिस्ट्री शुल्क को न्यूनतम रखने के लिए वास्तविक मूल्य से बहुत कम पर दर्ज कराया जाता है। स्पष्ट है कि सर्किल मूल्य और बाजार मूल्य, दोनों के बीच का अंतराल बहुत है।

शहरी विकास प्राधिकरण और औद्योगिक विकास प्राधिकरण जैसी सरकारी संस्थाएं तक इस भारी मूल्य-अंतराल को अपने मुनाफे का जरिया बना रही हैं। ‘दि हिंदू’ में छपे एक लेख के मुताबिक ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण किसानों की जमीन 820 रुपए प्रति वर्ग मीटर की दर से अधिग्रहीत करके आवासीय विकास परियोजना वाली कंपनी को पैंतीस हजार रुपए प्रति वर्ग मीटर की दर से बेचता रहा है। और इसी लूट-तंत्र का परिणाम है- शहरी आवासीय परियोजनाओं में फ्लैटों की आकाश छूती कीमतें।

साफ है कि भारत में भूमि अधिग्रहण को लेकर सरकार, उद्योगपति, व्यापारिक घराने, खनन माफिया आदि क्यों इतने ज्यादा उतावले हो रहे हैं कि रातोंरात अध्यादेश लाया जाता है। भूमि के इस पूरे लूटतंत्र के पीछे है अधिग्रहीत भूमि के बाजार-मूल्य और मुआवजा-लागत के बीच की चौड़ी खाई। बाजार की जिन शक्तियों ने मोदी के चुनावी अभियान में निवेश किया था, वे दबाव डाल कर नीतियों और अधिनियमों को अपने अनुकूल तब्दील करवाने का मौका नहीं चूकना चाहतीं। यों यूपीए सरकार भी इस मामले में कोई दूध की धुली नहीं थी।

जमीन के बाजार मूल्य और मुआवजा-लागत के अंतराल को पाटने का प्रयास वास्तव में ईमानदारी से किसी भी सरकार ने नहीं किया। उलटे सरकार की नीति तो नब्बे के बाद पूरी तरह पूंजीवादी क्रीतदास की हो गई है।

एक ओर वह किसानों को औने-पौने दामों पर निजी कंपनियों के लिए जमीन बेचने को बाध्य करती है और दूसरी ओर जमीन के खरीदार उद्योगपतियों को विविध करों में छूट के साथ मोटा अनुदान भी सरकारी खजाने से देती है। और यह खेल चलता है सार्वजनिक हित के महान उद््देश्य के नाम पर!

इस प्रकार आप देख सकते हैं कि सरकार का यह दावा कितना खोखला है कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम (2013) में किसानों को अतार्किक ढंग से मुआवजे का अनाप-शनाप अधिकार दे दिया गया था! और इसीलिए आर्थिक विकास को पटरी पर लाने के लिए यह नितांत जरूरी है कि भूमि अधिग्रहण की मुआवजा-लागत घटाई जाए। सरकारी दावा सच्चाई से मुंह चुराने जैसा है।

प्रमोद मीणा

 

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