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कोल्लम से कुंभ तक

केरल के कोल्लम के पुत्तिंगल मंदिर में भयानक हादसा हुआ। वहां पर आग लगने से अभी तक करीब लोगों की मौत हो चुकी है।

Author नई दिल्ली | Published on: April 12, 2016 1:50 AM
सौ साल पुराने मंदिर में रविवार (10 अप्रैल) तड़के साढ़े तीन बजे के करीब धमाका हुआ, जब मंदिर परिसर में आतिशबाजी चल रही थी। (रॉयटर्स फोटो)

तो अब यह मान लिया जाए कि भारत में बड़े धार्मिक अनुष्ठानों और कार्यक्रमों में हादसे होते रहेंगे? इनमें मासूम लोग कुचले जाते रहेंगे या जलने से जान गंवाते रहेंगे? पहली नजर में तो यही लगता है। अब केरल के कोल्लम के पुत्तिंगल मंदिर में भयानक हादसा हो गया। वहां पर आग लगने से अभी तक करीब लोगों की मौत हो चुकी है। सैकड़ों के घायल होने की खबर है। मालूम चला है कि तड़के तीन बजे के करीब मंदिर में एक समारोह के दौरान आतिशबाजी की जा रही थी, जिसे देखने के लिए मैदान में हजारों लोग उपस्थित थे। पटाखे फोड़ने के दौरान चिनगारियां पास के गोदाम तक पहुंच गर्इं जहां पटाखों का ढेर रखा हुआ था। पटाखों में आग लगने लगी तो उधर मौजूद लोग जान-बचाने के लिए भी दाएं-बाएं भागने लगे।

सवाल यह है कि क्या भीड़ पर नियंत्रण करना नामुमकिन काम है, जिसकी वजह से भीड़ में भगदड़ मच जाती है। दरअसल, बड़े आयोजनों में एकत्र भीड़ को निकलने के पर्याप्त मार्ग न मिलने के कारण ही हादसे होते हैं। कोल्लम हादसे से पहले पिछले साल हमारे यहां दो धार्मिक आयोजनों में भगदड़ के कारण बहुत-से मासूम मारे गए। पहली घटना आंध्र प्रदेश की है। पिछले साल राज्य के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू पहुंच गए पुष्करम मेले में सपरिवार स्नान करने। उन्हें वहां देखने के लिए भीड़ में भगदड़ मच गई। इसके चलते दो दर्जन निर्दोष व्यक्तियों की जान चली गई।

हादसा चंद्रबाबू नायडू को खास तवज्जो देने के कारण हुआ। जब चंद्रबाबू नायडू वहां से स्नान करके निकले तो उसके कुछ ही देर बाद यह हादसा हो गया। मुख्यमंत्री के प्रति आकर्षण को लेकर भी लोगों का उक्त स्थल पर जमाव हुआ। नायडू परिवार के साथ जैसे ही वहां से स्नान व पूजन कर निकले, गेट को खोल दिया गया और यह दिल दहलाने वाला हादसा हो गया। दूसरी घटना ओड़िशा की है। पिछले ही साल ओड़िशा में भगवान जगन्नाथ की इस शताब्दी की पहली नबकेलवर रथयात्रा को करीब पंद्रह लाख श्रद्धालुओं ने देखा। लेकिन रथयात्रा के दौरान हुई भगदड़ में दो महिलाओं की मौत हो गई। उसी दौरान झारखंड के देवघर में भगदड़ में कई जानें गर्इं।

अब पूरे यकीन के साथ माना जा सकता है कि हमारे प्रशासन को भीड़ को संभालना नहीं आता। सन 1956 में इलाहाबाद में चल रहे कुंभ मेले में आठ सौ तीर्थयात्रियों की भगदड़ में जान चली गई थी। जांच रिपोर्ट में चेतावनी दी गई थी कि ऐसे भीड़-भाड़ वाले मेलों में वीआईपी को नहीं जाना चाहिए। कहा जाता है कि मेले में आए प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को देखने के लिए मची भगदड़ के कारण दुर्घटना हुई थी। पर बाद में जांच से मालूम चला कि नेहरूजी ने अखाड़ों से पहले स्नान करने का फैसला किया। इससे साधु नाराज हो गए। वहां हंगामा हो गया। वहां मौजूद हाथी भी भड़क गए। उन्होंने भी दर्जनों लोगों को कुचला। उसके बाद भी धार्मिक आयोजनों में वीआईपी पहुंचते रहे और भगदड़ से लोगों के मरने का सिलसिला जारी रहा। यानी प्रशासन ने कोई सबक नहीं सीखा। साफ है कि देश पुरानी घटनाओं से सीख लेने के लिए तैयार नहीं है। लगता है कि हमारे देश में बड़े आयोजनों में हादसे होना अब सामान्य बात होती जा रही है।

दूसरी बात यह है कि लोगों को खुद भी भीड़भाड़ वाले आयोजनों में भाग लेने से बचना होगा। क्योंकि ताजा सूरते-हाल से यही लगता है कि हमारे यहां हादसे होते रहेंगे, कुंभ तथा दूसरे आयोजनों में। आपको याद होगा कि 1986 के हरिद्वार कुंभ मेले में तब के हरियाणा के मुख्यमंत्री भजनलाल के आने से लगभग सौ लोग भीड़ में भगदड़ से दब कर मर गए थे। और 2013 में इलाहाबाद कुंभ में भी मौनी अमावस्या के दिन रेलवे स्टेशन पर मची भगदड़ में भी डेढ़ सौ से ऊपर लोग मरे थे। अब ये हादसे भी जनता की स्मृतियों से ओझल होते जा रहे हैं। आप धार्मिक आयोजनों के दौरान भगदड़ और अन्य कारणों के चलते होने वाली मौतों को गूगल पर सर्च करेंगे तो आपको पता चल जाएगा कि भारत में कितने मासूम इन आयोजनों में अपनी जान गंवा देते हैं। पर मजाल है कि भीड़ प्रबंधन को लेकर कोई गंभीरता से सोच रहा हो। यानी लोग मरते रहे, होती रहे जांच और दे दी जाए मृतकों के परिजनों को अंतरिम राहत!

एक बात और। भारत में क्रिकेट मैच केटिकटों की बिक्री से लेकर मुफ्त खाने और बर्तन वितरण के दौरान छीना-झपटी में भी लोग मरते रहे हैं। भारत में लगभग हर साल, कभी-कभी एक बार से ज्यादा त्योहारों, धार्मिक यात्राओं और चुनावी रैलियों के दौरान लोगों के रौंद कर मारे जाने की खबरें आती हैं। भीड़ से कुचले जाने के मामले में सारे राज्यों के रिकार्ड खराब हैं। यानी कोई राज्य यह नहीं कह सकता कि हमने इस लिहाज से कुछ बेहतर काम करके दिखा दिया। अगर बात देश से बाहर की करें तो मिस्र में कुछ दिन पहले ही सुरक्षा बलों और फुटबाल प्रशंसकों के बीच हिंसक झड़प के बाद आंसू गैस के गोले छोड़े जाने के कारण दम घुटने और मची भगदड़ से कम से कम तीस लोगों की मौत हो गई जबकि पैंतीस से अधिक लोग जख्मी हो गए। फुटबाल मैच में भगदड़ के कारण भी मारे जाने का लंबा इतिहास है।

भारत सहित दुनिया के सभी देशों में भीड़ प्रबंधन विषय की तरह स्थापित किया जाए। भीड़ के प्रबंधन का पेशा दुनिया भर में अपेक्षाकृत नया सिद्धांत है जो समारोहों के दौरान होने वाली भयानक त्रासदियों की प्रतिक्रियास्वरूप विकसित हुआ है।

अब प्रश्न उठता है कि बड़े धार्मिक आयोजन बिना किसी हादसे के कैसे आयोजित हों? अगर इच्छाशक्ति हो तो यह मुमकिन है। बेशक, भीड़ प्रबंधन के लिए योजना बनाना अहम है। आपको जिस क्षेत्र में आयोजन हो रहा है वहां पर एकत्र होनी वाली भीड़ और भगदड़ में निकलने के लिए जरूरी निकासी वाले स्थानों पर नजर रखनी होगी, भीड़ के बर्ताव में संभावित बदलाव पर भी। दुनिया भर में भीड़भाड़ वाले कोई भी समारोह इस तरह की त्रासदियों के प्रति प्रभावशून्य नहीं हैं। अगर आपके पास इस तरह के आयोजनों के लिए वास्तव में योजना पर फोकस करने वाले लोग नहीं हैं, तो कहीं भी ये हादसे हो सकते हैं।

कहने की जरूरत नहीं है कि अगर आप इसी तरह की भीड़ का हिस्सा हैं और हालात खराब हो जाते हैं, तो ऐसे में आप ज्यादा कुछ नहीं कर सकते। इसलिए बेहतर तो यह होगा कि आप हमेशा भीड़भाड़ वाले इलाकों से बचें। पर संबंधित सरकारी महकमों की जिम्मेदारी है कि वे इस बात को देखें ताकि भीड़ काबू से बाहर न होने पाए। फिलहाल तो इस मोर्चे पर काम करने की जरूरत है। केंद्र से लेकर राज्य सरकारों के संबंधित विभागों को काहिली छोड़नी होगी। उन्हें जागना होगा। नहीं तो बड़े आयोजनों में भगदड़ में लोग मारे जाते रहेंगे, जांच होती रहेगी और मिलती रहेगी अंतरिम राहत।

पर यह बात भी नहीं है कि केरल में ताजा हादसा या फिर कुंभ में पूर्व में हुए हादसे सिर्फ हमारे यहां होते हैं। पिछले साल सितंबर में मक्का में दो बड़े हादसों में कई जायरीन मारे गए। पहला हादसा तब हुआ जब क्रेन जायरीनों पर गिर गई। उसके चंदेक रोज बाद हुई भगदड़ में साढ़े आठ सौ से ज्यादा हाजी अपनी जान गंवा बैठे। ये पूरी दुनिया के विभिन्न देशों से वहां पर हज के लिए पहुंचे थे। इन हादसों के बाद पूरी दुनिया सऊदी अरब से सवाल पूछ रही थी कि उसने इतनी लचर व्यवस्था क्यों की, जिसके चलते दो बार हादसे हो गए? क्या वहां पर कोई देखने वाला नहीं है?

क्रेन हादसे में मारे गए लोगों के परिजनों को मोटा मुआवजा देकर सऊदी सरकार ने अपने ऊपर लगने वाले कलंक को धोने की चेष्टा की थी। पर, दूसरे हादसे ने उसकी कलई खोल कर रख दी थी। सऊदी अरब की मक्का मस्जिद के पास मीना में शैतान को पत्थर मारने की रस्म अदाएगी के बीच भगगड़ मची थी। इसी तरह से 2004 और फिर 2006 में शैतान को मारने की होड़ में सैकड़ों लोग रौंदे गए थे। यों तो मक्का में हादसे हाल के सालों में होते रहे हैं। पर, 1990 में वहां भगदड़ में चौदह सौ से ज्यादा लोगों की जानें चली गई थीं। जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है कि दुनिया के अनेक देशों में म्यूजिक कंसर्ट से लेकर फुटबॉल के मैदान में भी भीड़ के बेकाबू होने के कारण बड़े हादसे होते रहे हैं।

दरअसल, मैं मानता हूं कि बड़े आयोजनों से पहले आयोजकों को भीड़ प्रबंधन को लेकर लिए ठोस योजना बनानी चाहिए। भीड़भाड़ वाले इलाके आतंकियों या गड़बड़ फैलाने वालों के लिए बेहद मुफीद स्थान होते हैं। वे अफवाह फैला कर भगदड़ वाले हालात पैदा कर देते हैं। इसलिए इन तत्त्वों पर भी पैनी नजर रखने की जरूरत है। बेशक, भीड़ प्रबंधकों को भीड़ के बर्ताव में संभावित बदलाव पर भी नजर रखनी होगी। याद रखिए कि अगर आपके पास इस तरह के आयोजनों को संभालने वाले जानकार नहीं हैं, तो धार्मिक आयोजनों से लेकर फुटबॉल मैचों तक में हादसे होते रहेंगे। (लेखक राज्यसभा सांसद हैं)

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