खतरा बनतीं किम की मिसाइलें

उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग की सामरिक नीति भय और सौदेबाजी से प्रेरित रही है।

सांकेतिक फोटाेे।

ब्रह्मदीप अलूने

उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग की सामरिक नीति भय और सौदेबाजी से प्रेरित रही है। नब्बे के दशक में परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने की संधि (एनपीटी) पर सहमति जताने वाला उत्तर कोरिया करीब डेढ़ दशक बाद ही इस संधि से हट गया था। किम जोंग हथियारों के निर्माण को राष्ट्रीय सुरक्षा आत्मनिर्भरता से जोड़ते हैं, लेकिन उनके इरादे आशंकित करते रहे हैं।

क्रूज मिसाइलें कम ऊंचाई और धीमी रफ्तार से अपने लक्ष्य की ओर जाती हैं। ये मिसाइलें लक्ष्य की ओर जाते समय कई बार मुड़ सकती हैं और दिशा बदलते हुए कहीं से भी हमला कर सकती हैं। उत्तर कोरिया की राष्ट्रीय और वैदेशिक नीति कई दशकों से इन मिसाइलों की तरह ही अप्रत्याशित और असहज करने वाली रही है। इसीलिए समूचा विश्व इस देश से आशंकित रहता है। उत्तर कोरिया इन दिनों एक के बाद एक मिसाइल परीक्षण कर फिरसे आक्रामक इरादों का इजहार कर रहा है। इसका एक प्रमुख कारण चीन की कुटिल भूमिका भी है। वह बड़ी चालाकी से एशिया प्रशांत क्षेत्र के अपने विरोधियों को धमकाने के लिए उत्तर कोरिया का इस्तेमाल करता रहा है।

बीते कई वर्षों से उत्तर कोरिया के परमाणु और बैलेस्टिक मिसाइलों के निरंतर परीक्षण के बाद भी चीन ने उसे संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक प्रतिबंधों से अप्रभावित और अमेरिका के संभावित सैन्य हमलों से बचाए रखा है। उत्तर कोरिया पर विध्वंसक हथियारों की तस्करी के कई मामले सामने आ चुके हैं और यह जाल सीरिया से लेकर म्यांमा तक फैला हुआ है। अब तालिबान जैसे संगठन भी इस अवसर की ताक में है कि वे परमाणु हथियार और मिसाइल हासिल कर लें। इसलिए दुनिया को आतंकवाद और अशांति से बचाने के लिए उत्तर कोरिया को नियंत्रित करना बेहद जरूरी माना जाने लगा है।

कोरियाई प्रायद्वीप में उत्तर कोरिया की बेलगाम आक्रामकता और अपेक्षाकृत शांत रहने वाले दक्षिण कोरिया का उसके जवाब में पनडुब्बी-प्रक्षेपित बैलेस्टिक मिसाइल के परीक्षण से आणविक युद्ध का खतरा बढ़ गया है। इसका एक कारण यह भी है कि कोरियाई प्रायद्वीप में वैश्विक शक्तियां आमने-सामने हैं और अमेरिकी पूंजीवाद का सामना चीन और रूस की साम्यवादी आक्रामकता से है। कोरिया को लेकर महाशक्तियां दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से ही आमने सामने रही हैं। उत्तर कोरिया की साम्यवादी सरकार ने 1950 में जब दक्षिण कोरिया पर हमला किया था, तब उसे बचाने के लिए संयुक्त राष्ट्र सेना की कमान एक अमेरिकी जनरल मैक आॅर्थर के हाथों में थी। लेकिन तब भी उस युद्ध का निर्णायक समाधान इसलिए नहीं हो सका था क्योंकि चीन के उत्तर कोरिया के साथ आने का अंदेशा था और आज भी हालात जस के तस है।

इस घटना के बाद लगभग सात दशकों से दक्षिण कोरिया के अमेरिका से गहरे आर्थिक और सामरिक संबंध हैं और अमेरिका उत्तर कोरिया को लेकर बेहद आक्रामक नीति अपनाएं हुए है। वहीं उत्तर कोरिया में साम्यवादी सत्ता को मजबूत करके रूस और चीन अपने वैश्विक हितों का संवर्धन कर रहे हैं। इसलिए इस प्रायद्वीप की समस्या के शांतिपूर्ण निपटारे के लिए पूंजीवाद और साम्यवाद को मित्रता करनी होगी। लेकिन इसकी संभावना कहीं नजर नहीं आती।

उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग की सामरिक नीति भय और सौदेबाजी से प्रेरित रही है। नब्बे के दशक में परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने की संधि (एनपीटी) पर सहमति जताने वाला उत्तर कोरिया करीब डेढ़ दशक बाद ही इस संधि से हट गया था। किम जोंग हथियारों के निर्माण को राष्ट्रीय सुरक्षा आत्मनिर्भरता से जोड़ते हैं, लेकिन उनके इरादे आशंकित करते रहे हैं। समस्या यह भी है कि तमाम वैश्विक प्रतिबंधों के बाद भी उत्तर कोरिया को काबू में नहीं किया जा सका है। नवंबर 2017 में प्योंगयांग ने अंतरमहाद्वीपीय बैलेस्टिक मिसाइल का परीक्षण कर दुनिया को ठेंगा दिखाने की कोशिश की थी। इसके जवाब में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने उत्तर कोरिया की पेट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे। इन प्रतिबंधों में खासतौर पर पेट्रोलियम पदार्थों को शामिल किया गया है। उत्तर कोरिया अधिकांश पेट्रोलियम पदार्थों का इस्तेमाल अपने परमाणु और बैलेस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को पूरा करने के लिए करता है।

कोरियाई प्रायद्वीप में समुद्र के रास्ते तस्करी करने की भौगोलिक संभावनाएं उत्तर कोरिया के लिए मुफीद हैं। इसके पश्चिम में पीला सागर, दक्षिण में पूर्वी चीन सागर और पूर्व में जापान सागर है। कहा जाता है कि उत्तर कोरिया पीले सागर में कृत्रिम द्वीप बना रहा है जिनका इस्तेमाल वह सैन्य योजनाओं के लिए करेगा। उत्तर कोरिया द्वारा हथियारों का अवैध व्यापार दुनिया के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। यदि इसे सख्ती से रोका नहीं गया तो वह समय दूर नहीं जब आतंकियों के पास भी क्रूज मिसाइलों का भंडार होगा। फिलहाल उसकी अर्थव्यवस्था चीन और रूस की सहायता से समुद्र में होने वाली तस्करी से चल रही है। उत्तर कोरिया पर संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक प्रतिबंधों के बाद भी चीन और रूस उसक साथ व्यापारिक संबंध बनाए हुए हैं। ये साम्यवादी देश अमेरिकी को चुनौती देने के उत्तर कोरिया को रोजमर्रा की जरूरतों का सामान मुहैया कराते हैं, साथ ही उसे परमाणु र्इंधन और हथियार बनाने के लिए धन, साधन और तकनीक भी देते रहे हैं।

दक्षिण कोरिया की 1953 से अमेरिका के साथ रक्षा संधि है और वहां हजारों अमेरिकी सैनिक और युद्धपोत हमेशा तैनात रहते हैं। दूसरी ओर, चीन और उत्तर कोरिया के बीच 1961 से पारस्परिक सहायता और सहयोग के रक्षा संधि हैं। अमेरिका और चीन दोनों एक दूसरे के कड़े प्रतिद्वंद्वी हैं। चीन पर निगाहें रखने के लिए अमेरिका के लिए दक्षिण कोरिया सामरिक रूप से मुफीद ठिकाना है। वहीं अमेरिका और जापान को धमकाने के साथ समुद्र में अपना प्रभुत्व कायम रखने के लिए चीन को भी उत्तर कोरिया की जरूरत है।

वर्ष 2018 में इस क्षेत्र में शांति की उम्मीदें दिखाई पड़ी थीं। उस समय उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जे इन से मुलाकात करने के लिए दक्षिण कोरिया पहुंच गए थे। 1953 में कोरियाई युद्ध के बाद वह पहला मौका था जब किसी उत्तर कोरियाई नेता ने दक्षिण कोरियाई जमीन पर कदम रखा था। इस मौके पर उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया ने संयुक्त घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करके पूरे कोरियाई प्रायद्वीप को परमाणु हथियारों से मुक्त करने के साझा मकसद पर सहमति जताई थी। हालांकि यह उत्तर कोरिया का आर्थिक प्रतिबंधों को कम करके देश की अर्थव्यवस्था को बेहतर करने का प्रयास था।

यह देखा गया है कि उत्तर कोरिया आवश्यकता अनुसार शांति के करार करने और उसे तोड़ने का माहिर खिलाड़ी है। इस साल मई में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा था कि वे उत्तर कोरियाई शासक किम जोंग उन से मुलाकात को तैयार हैं लेकिन दोनों के बीच उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चर्चा होनी चाहिए। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि परमाणु कार्यक्रम छोड़ने के लिए उत्तर कोरिया को मनाना मुश्किल काम होगा। जाहिर है, बाइडन यह जानते हैं कि उत्तर कोरिया चीन की दबावकारी और आक्रामक वैश्विक नीतियों में भागीदार है। बाइडन से पहले अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने किम जोंग-उन के साथ तीन बार मुलाकात की थी जिसका कोई नतीजा नहीं निकला था।

अमेरिका और दक्षिण कोरिया के सामरिक संबंध बहुत गहरे हैं, दक्षिण कोरिया अमेरिकी हथियारों का बड़ा खरीददार भी है। जबकि उत्तर कोरिया की अर्थव्यवस्था और सामरिक क्षमता पर चीन का कब्जा है। उत्तर कोरिया अपनी जीडीपी का एक चौथाई सैन्य शक्ति बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करता है। रूस और चीन के लिए उत्तर कोरिया हथियारों का बड़ा बाजार है। कोरियाई प्रायद्वीप में उत्तर कोरिया के विध्वंसक हथियारों के परीक्षण का जवाब दक्षिण कोरिया से भी आक्रामक तरीके से मिलने से युद्ध की आशंकाओं को बल मिला है, ऐसे में एशिया प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर नया संकट गहरा गया है। हालांकि दोनों देश अब हॉट लाइन संपर्क स्तारित कने को राजी गए गए हैं। लेकिन उत्तर कोरिया के धड़ाधड़ मिसाइल परीक्षण विश्व शांति के लिए चुनौती तो पेश कर ही रहे हैं।

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