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राजनीति: नक्सली हमलों से उठते सवाल

नक्सली अपने प्रभाव वाले इलाकों में विकास होने ही नहीं देना चाहते। गढ़चिरौली की भौगोलिक स्थिति नक्सलियों को महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश में एक से दूसरे क्षेत्र में आसानी से जाने की सहूलियत देती है। छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले की सीमा से अन्य राज्यों में आसानी से घुसा जा सकता है। इन इलाकों के लिए व्यापक रणनीति को बहुआयामी बनाने की जरूरत है।

Author Published on: April 2, 2020 2:37 AM
नक्सली हमले के बाद जंगल में लापता जवानों की खोज। (फाइल फोटो- Indian Express)

ब्रह्मदीप अलूने
छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के चिंतागुफा जंगल में पिछले दिनों नक्सलियों ने एक बार फिर सुरक्षा बलों पर हमला कर सत्रह जवानों को मार डाला। यह वही इलाका है जिस पर सुरक्षा बलों ने 2009 में कब्जा कर लिया था। लेकिन सुरक्षा की बहुआयामी और समन्वित रणनीति के अभाव का फायदा उठा कर नक्सली ऐसे क्षेत्रों में मौका मिलते ही फिर से हावी हो जाते हैं। छत्तीसगढ़ के दक्षिणी जिलों- बीजापुर, नारायणपुर और दंतेवाड़ा के करीब चार हजार किलोमीटर क्षेत्र में घने जंगल हैं और इसे माओवाद का स्वर्ग माना जाता है। सुकमा की सरहद आंध्रप्रदेश और ओड़ीशा से मिलती है। यह माओवादियों के एक राज्य से दूसरे राज्य में आवागमन का सुगम रास्ता है। इन इलाकों में माओवादी समांतर सरकार बनाने में भी कामयाब रहे हैं, जिसे जनताना सरकार कहा जाता है। सरकार इन इलाकों में सड़कों का जाल बिछाना चाहती है, लेकिन माओवादी सड़के खोद देते हैं, ठेकेदारों पर दबाव बनाते हैं, सुरक्षा बलों पर हमले करते हैं। इसलिए कई सालों से यह काम पूरा ही नहीं किया जा सका है।

दरअसल नक्सलवाद की यह कड़वी हकीकत है कि तमाम सरकारी कोशिशों के बाद भी वे अपना प्रभाव बनाए रखने में सफल रहे हैं और जंगलों में सुरक्षा बलों को घेरने की रणनीति में महारत हासिल कर ली है। वे अपने प्रभाव वाले इलाकों के ऊबड़-खाबड़ रास्तों और जंगलों की जानकारियों का जम कर फायदा उठाते हैं और सुरक्षा बलों पर घातक हमले कर उन्हें बड़ा नुकसान पहुंचाने में कामयाब हो जाते हैं। दूसरी ओर पिछले कई दशकों से माओवादी हमलों से जूझने और हजारों जवानों को खोने के बाद भी देश में नक्सलवाद से निपटने की ऐसी कोई निर्णायक और दीर्घकालीन कार्ययोजना नहीं बन सकी है जिसके बेहद सकारात्मक परिणाम सामने आए हों। वहीं नक्सली परंपरागत गुरिल्ला युद्ध के बूते देश के दो सौ से ज्यादा जिलों और लगभग बीस राज्यों में अपना प्रभाव जमाए रखने मे लगातार सफल रहे हैं। नक्सलियों के सामने भारत का आधुनिक बल होता है, इसके बाद भी वे छापामार युद्ध पद्धति से सुरक्षा बलों को ज्यादा नुकसान पहुंचाने में सफल रहे हैं। भारत की भौगोलिक परिस्थितियां माओवाद की छापामार पद्धति के अनुकूल हैं और विभिन्न मोर्चों पर भिन्न-भिन्न कारणों से माओवादियों को मजबूती भी मिलती है।

नक्सलियों से निपटने के लिए भारत में कोशिशें तो की गईं, लेकिन वे कई कारणों से बहुआयामी और दीर्घकालीन नहीं बन सकीं। विकास और सुरक्षा के दबाव की रणनीति को माओवाद के खात्मे के लिए सबसे मुफीद माना गया। करीब दस साल पहले यूपीए सरकार के दौरान तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने राज्य पुलिस बलों को अत्याधुनिक हथियारों से सुसज्जित करने और सशक्त बनाने की दो स्तरीय योजना शुरू की थी। इसके अनुसार वामपंथ प्रभावित जिलों में ज्यादा अर्धसैनिक बल तैनात करने और दूरदराज के इलाकों में किलेबंद पुलिस थाने बनाने की योजना थी। योजना का दूसरा चरण यह था कि माओवादियों से आज़ाद कराए गए इलाकों में स्कूल, सड़कों, शौचालयों और पीने के पानी की सुविधाओं का निर्माण करके इसे ताकतवर बनाया जाए।

एक बार यहां से नक्सलियों को खदेड़ने के बाद वे पुन: यहां स्थापित न हो सकें, इसके लिए छत्तीसगढ़, झारखंड और पश्चिम बंगाल में एक एकीकृत कमांड बनाई गई, जिससे पुलिस, अर्धसैनिक बल और खुफिया एजंसियों की गतिविधियों के बीच नजदीकी तालमेल स्थापित किया जा सके। इस नीति के उत्साहवर्धक परिणाम तो आए, लेकिन इस योजना पर अन्य कारणों से लंबे समय तक काम नहीं हो सका। सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण बात है केंद्र को राज्यों का सहयोग। किसी एक राज्य की ढीली-ढाली नीति माओवादियों को सुरक्षित रखने में अप्रत्याशित मददगार बन जाती है और अंतत: माओवाद पर नकेल ढीली पड़ जाती है। व्यापक स्तर पर सुरक्षा अभियान के साथ समन्वित विकास के लिए केंद्र को राज्यों का सहयोग चाहिए होता है, जिससे विकास पैकेज और प्रशासन की बहाली सुनिश्चित हो सके।

सितंबर, 2009 में कोबरा बटालियन, छत्तीसगढ़ पुलिस और स्थानीय आदिवासी पुलिसकर्मियों को मिला कर तैयार की गई टीम ने दो सौ माओवादियों के साथ जबरदस्त मुठभेड़ में दक्षिण छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा इलाके में किष्टरम और चिंतागुफा क्षेत्र में अवैध हथियार बनाने के ठिकानों को नष्ट किया था। पहली बार सुरक्षा बल चिंता गुफा तक पहुंचे थे। माओवादियों की पनाहगाह बना यह क्षेत्र बारूदी सुरंगों के कारण पहुंच से दूर नजर आता था। यह अभियान इसलिए भी सफल हो पाया था, क्योंकि इस दौरान पड़ोसी राज्यों आंध्र प्रदेश और ओड़ीशा में भी पुलिस बल तैनात थे, जिससे माओवादियों के लिए एक राज्य से दूसरे राज्य में भागने में बड़ी बाधा उत्पन्न हो गई थी।

माओवादी गरीबी और पिछड़ेपन का लाभ उठा कर अपने सिद्धांतों का प्रचार करते हैं और इस प्रकार स्थानीय जनसमुदाय पर अपना प्रभाव और नियंत्रण स्थापित करने में कामयाब हो जाते हैं। उनके लिए विस्थापन जैसे मुद्दे अपना प्रभाव कायम करने में खास योगदान देते हैं। अर्धसैनिक बलों को स्थानीय जंगलों की जानकारी ज्यादा नहीं होती और स्थानीय लोग उन पर भरोसा भी नहीं करते। ऐसे में स्थानीय पुलिस को मजबूत कर माओवादियों से बेहतर ढंग से निपटा जा सकता है। माओवादियों को सामान्य आदिवासियों से अलग करना होता है और यह काम स्थानीय पुलिस बेहतर ढंग से कर सकती है। अत: स्थानीय पुलिस को अग्रिम पंक्ति में रख कर अर्धसैनिक बलों को सहयोगी के रूप में रखने की जरूरत है और इस पर नीति बनने का इंतजार है। दुर्भाग्य यह है कि देश में अभी तक पुलिस सुधार ही लागू नहीं किए गए हैं, इससे पुलिस के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया बाधित हुई है।

माओवादियों के नियंत्रण वाले सबसे बड़े क्षेत्र बस्तर में चालीस हजार वर्ग किलोमीटर में फैला इलाका लौह अयस्क से समृद्ध क्षेत्र है। नक्सली हमलों के लिए कुख्यात दंतेवाड़ा से बीजापुर का मार्ग एक दशक बीत जाने के बाद भी पूरा नहीं बन सका है। नक्सली अपने प्रभाव वाले इलाकों में विकास होने देना ही नहीं चाहते। गढ़चिरौली की भौगोलिक स्थिति नक्सलियों को महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और आंध्रप्रदेश में एक से दूसरे क्षेत्र में आसानी से जाने की सहूलियत देती है। छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले की सीमा से अन्य राज्यों में आसानी से घुसा जा सकता है। इन इलाकों के लिए व्यापक रणनीति को बहुआयामी बनाने की जरूरत है। यहां बैक शाखाएं, डाक घर, एटीएम, सड़कें, मोबाइल टावर और अन्य विकास संसाधन उपलब्ध होने से नागरिकों का भरोसा सरकार पर बढ़ सकता है। लेकिन प्रशासनिक उदासीनता और नाकामी एक बड़ा संकट है। मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले का लांजी अनुभाग नक्सलवाद से बुरी तरह प्रभावित है। इसके अंतर्गत डेढ़ सौ से ज्यादा गांव आते हैं, लेकिन बैंक या एटीएम जैसी सुविधाएं लांजी में ही उपलब्ध हैं। जाहिर है, ऐसी स्थितियों का लाभ अप्रत्याशित रूप से माओवादियों को मिलता है और वे भोले-भाले आदिवासियों को भ्रमित करने में सफल हो जाते हैं।

आदिवासियों के जमीन संबंधी विवादों की सुनवाई के लिए त्वरित अदालतें होनी चाहिए। ऐसे विवादों में न्याय मिलने में देरी का फायदा माओवादियों को मिलता है। आदिवासियों के लिए जल, जंगल और जमीन बड़े मुद्दे होते हैं, माओवादी ग्रामीणों के सामने सरकार की छवि को खराब करके उसे शोषणकर्ता के रूप में प्रचारित करते हैं। माओवादियों के खिलाफ जीतने के लिए स्थानीय लोगों का सहयोग और समर्थन मिलना जरूरी है। इसलिए सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक पहलुओं पर ध्यान देने की भी जरूरत है। इन सबके साथ माओवादी हमलों की उच्च तीव्रता के समय पर सावधानी रखने की भी जरूरत है। माओवादी मार्च से लेकर जून तक ज्यादा घातक हमले करते हैं। उग्रवादी इसे सालाना टैक्टिकल काउंटर आॅफेंसिव कैंपेन (टीसीओसी) कहते हैं। नक्सलवाद से निपटने के लिए व्यापक कार्ययोजना की दरकार है जिसमें विकास, सुरक्षा और नक्सलियों के खिलाफ आक्रामक कार्रवाई की समन्वित और दीर्घकालीन नीति बने और केंद्र व राज्य मिल कर अमल करें।

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