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राजनीतिः बाढ़, तबाही और सबक

ग्लोबल वार्मिंग के चलते मानसूनी बारिश की तीव्रता बढ़ती जा रही है और इस प्रकार की आपदाएं और बढ़ेंगी, जिन्हें कोई नहीं रोक पाएगा। लेकिन इनके दुष्परिणामों को हम काफी हद तक कम अवश्य कर सकते हैं। उसके लिए प्रकृति द्वारा बार-बार दी जा रही गंभीर चेतावनियों से हमें सबक सीखने होंगे। पर दुख की बात है कि हमारा स्वभाव कुछ ऐसा हो चुका है कि हम सांप गुजरने के बाद लाठी पीटने के आदी हो चुके हैं।

योगेश कुमार गोयल

भारी बारिश के कारण पहाड़ों से लेकर मैदान तक के राज्य जैसे- केरल, हिमाचल, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, तमिलनाडु, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, असम, नगालैंड और अरुणाचल प्रदेश बाढ़ की विभीषिका से जूझ रहे हैं। प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर केरल में तो बाढ़ के चलते हालात भयावह हो चुके हैं। राज्य के तीन करोड़ से अधिक लोगों पर बाढ़ कहर बन कर टूट रही है। प्रदेश के करीब दस हजार किलोमीटर सड़क मार्गों को बाढ़ ने निगल लिया है। हवाई, ट्रेन और मेट्रो नेटवर्क बुरी तरह ध्वस्त हो चुका है। 1924 के बाद केरल में बाढ़ का ऐसा मंजर देखा गया है। राज्य के पैंतीस बांधों के फाटक खोल देने के बाद भी सभी में जलस्तर खतरे के निशान के ऊपर है और मुल्लापेरियार बांध में तो पहली बार जलस्तर अत्यधिक बढ़कर एक सौ बयालीस फुट तक पहुंच गया है। ढाई दशक बाद विश्वप्रसिद्ध इडुक्की जलाशय के चेरूथोनी बांध को खोलने की नौबत आई है।

केरल देश के उन राज्यों में शुमार है, जहां सर्वाधिक मानसूनी वर्षा होती है। लेकिन इसे मानसून की दगाबाजी कहें या पर्यावरण असंतुलन का दुष्परिणाम कि पिछले साल अगस्त में ही जहां केरल में उनतीस फीसद कम वर्षा हुई थी, वहीं इस साल इस प्रदेश में करीब उन्नीस फीसद अधिक वर्षा हो चुकी है। कुछ राज्यों में तो पचास फीसद तक ज्यादा बारिश हुई है। समुद्र की ओर झुकाव के कारण केरल को प्राय: ऐसा राज्य नहीं माना जाता, जहां बाढ़ का खतरा रहता हो, क्योंकि भारी बारिश का पानी यहां की नदियों में नहीं ठहरता, जो सीधे पश्चिमी घाट और अरब सागर में मिल जाता है। लेकिन हालात इतने बदतर होने के पीछे प्रकृति में मानवीय दखलंदाजी, बेतरतीब विकास, बड़े पैमाने पर वनों की कटाई और हमारी कुव्यवस्थाएं जिम्मेदार हैं, जिसके चलते समुद्र का जलस्तर भी निरंतर ऊंचा उठता जा रहा है, जिसके परिणामस्वरूप नदियों का पानी समुद्रों में तीव्र गति से समाना कम हो गया है। इसकी परिणति अब अक्सर भयानक बाढ़ के रूप में सामने आती है।

अधिकांश पर्यावरण वैज्ञानिक देश के कई राज्यों में आई बाढ़ को मानव निर्मित त्रासदी की संज्ञा दे रहे हैं। इस प्रकार की अति वर्षा और बाढ़ की स्थिति के लिए जलवायु परिवर्तन, विकास की विभिन्न परियोजनाओं के लिए वनों की अंधाधुंध कटाई और नदियों में होते अवैध खनन को मुख्यरूप से जिम्मेदार माना जा रहा है। इससे मानसून प्रभावित हो रहा है और साथ ही भू-क्षरण और नदियों द्वारा बढ़ते कटाव से तबाही के मामले बढ़ रहे हैं। यह विडंबना ही है कि विश्वभर में बाढ़ के कारण होने वाली मौतों का पांचवां हिस्सा भारत में होता है और प्रतिवर्ष बाढ़ से देश को करीब एक हजार करोड़ का नुकसान होता है। केरल में आई बाढ़ से तो इस बार चाय, कॉफी, मसाले और रबर की खेती तबाह होने से करीब बीस हजार करोड़ का नुकसान होने का अनुमान है।

वर्ष 2010 में यह चिंता जताई गई थी कि भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर वर्षा के बादलों को तोड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला पश्चिमी घाट मानवीय हस्तक्षेप के चलते सिकुड़ रहा है और इसी के बाद इस पर रिपोर्ट देने के लिए केंद्र द्वारा ‘गाडगिल पैनल’ का गठन किया था। लेकिन विडंबना ही है कि हर साल इस तरह की आपदाएं झेलते रहने के बावजूद पारिस्थितिकीय रूप से नाजुक माने वाले पहाड़ी क्षेत्रों को संरक्षित करने के लिए गाडगिल समिति की रिपोर्ट को अब तक लागू नहीं किया गया। भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान ने 1900 के बाद साल दर साल हुई वर्षा के आंकड़ों के आधार पर 2014 में एक अध्ययन किया था।

इसमें बताया गया है कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते मानसूनी बारिश की तीव्रता बढ़ती जा रही है और इस प्रकार की आपदाएं और बढ़ेंगी, जिन्हें कोई नहीं रोक पाएगा। लेकिन इनके दुष्परिणामों को हम काफी हद तक कम अवश्य कर सकते हैं। उसके लिए प्रकृति द्वारा बार-बार दी जा रही गंभीर चेतावनियों से हमें सबक सीखने होंगे। पर दुख की बात है कि हमारा स्वभाव कुछ ऐसा हो चुका है कि सांप गुजरने के बाद लाठी पीटने के आदी हो चुके हैं। सरकार और प्रशासन द्वारा आपदाओं से निपटने के लिए पहले से कोई तैयारी नहीं की जाती और इस वजह से हम हर साल गंभीर आपदाएं झेलने को अभिशप्त होते हैं। और हालात में सुधार होते ही हम सब कुछ भुला कर पहले की भांति प्रकृति के साथ खिलवाड़ में मशगूल हो जाते हैं। तीन साल पहले चेन्नई में बाढ़ से जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया था, पर्वतीय क्षेत्र श्रीनगर में समुद्र जैसा नजारा देखा गया था, महाराष्ट्र का बदतर हाल प्रतिवर्ष देखा ही जाता है, देश की राजधानी दिल्ली तो थोड़ी सी बरसात के सामने भी अक्सर बेबस नजर आने लगती है। 1950 में देश में करीब ढाई करोड़ हेक्टेयर भूमि बाढ़ के दायरे में आती थी, लेकिन अब बाढ़ के दायरे में आने वाली भूमि बढ़ कर सात करोड़ हेक्टेयर हो गई है।

हमें इस प्रश्न का उत्तर जान लेना होगा कि मानसून की जो बारिश हमारे लिए प्रकृति का वरदान होनी चाहिए, वह क्यों इतनी बड़ी आपदा बन कर अक्सर सामने आती है? दरअसल, बाढ़ और सूखे को प्राकृतिक आपदाएं भर मान लेने से कुछ नहीं होने वाला, बल्कि हमें अब भली-भांति समझ लेना चाहिए कि ये प्रकृति की गंभीर चेतावनियां हैं, जिनकी हम जानबूझकर अनदेखी कर रहे हैं। पर्यावरण और मानूसन असंतुलन का अब भयावह दौर शुरू हो चुका है। मौसम विज्ञानियों के तमाम पूर्वानुमानों और कयासों को धता बताते हुए प्रकृति साल दर साल अपना प्रकोप प्रचंड रूप में दिखा रही है। हम हर बार किसी भी आपदा के लिए प्रकृति पर दोष मढ़ते हैं, किंतु प्रकृति के असली गुनहगार तो हम स्वयं ही हैं। पहाड़ी इलाकों में जिस प्रकार प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है, उसी का नतीजा है कि पर्वतीय इलाके भी अब बाढ़ जैसी विभीषिका झेलने को अभिशप्त हो रहे हैं। पहाड़ों पर बढ़ते अतिक्रमण, अनियोजित विकास के नाम पर वनों के विनाश से पहाड़ों की नींव कमजोर हो रही है। पहाड़ी क्षेत्रों में भू-स्खलन की बढ़ती घटनाएं और बाढ़ इसी का नतीजा हैं।

बहरहाल, केरल सहित देश के कई राज्यों में आई बाढ़ से सबक लेते हुए हमें अब जंगल, पहाड़, नदी, झीलों की महत्ता समझनी होगी और जंगल सिकुड़ने के चलते पैदा होते बाढ़ के हालात के मद्देनजर वृक्षारोपण को बढ़ावा देना होगा। साथ ही सरकारी तंत्र को गहरी निद्रा से जाग कर भारी बारिश के पानी की निर्बाध निकासी के पुख्ता प्रबंध हर साल समय रहते करने चाहिए। बाढ़ जैसी आपदाएं लाखों-करोड़ों लोगों के विस्थापन का कारण तो बनती ही हैं, कुछ समय बाद जब बाढ़ का पानी उतरता है तो अपने पीछे ऐसी ढेर सारी गंदगी छोड़ जाता है, जो गंभीर बीमारियों और महामारी का कारण बनती है। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि पानी में यह गंदगी आती कहां से है? यह कोई बारिश के साथ आसमान से टपकी गंदगी नहीं होती, बल्कि यह वही गंदगी होती है जो हम आए दिन नदी-नालों व झीलों-तालाबों में कई-कई टन की मात्रा में उंड़ेलते रहते हैं और बाढ़ जैसी आपदाओं के समय यही गंदगी महामारी का कारण बनती है। बेहतर होगा कि पर्यावरण के नाम पर बहसों तक ही सीमित न रहकर हम कुपित प्रकृति के प्रकोप को शांत करने के पुख्ता प्रबंध करें, ताकि पर्यावरण संतुलन बना रहे और प्राकृतिक आपदाओं की वजह से जान-माल की इतनी हानि न हो सके।

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