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न्याय का नखलिस्तान

भारतीय समाज पहले वर्ण-व्यवस्था आधारित था जो धीरे-धीरे जाति-व्यवस्था में परिवर्तित हो गया। असमानता, अलगाववाद, क्षेत्रवाद, रूढ़िवादिता समाज में पूरी तरह व्याप्त थी..

Author नई दिल्ली | November 8, 2015 9:26 PM
(चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है)

भारतीय समाज पहले वर्ण-व्यवस्था आधारित था जो धीरे-धीरे जाति-व्यवस्था में परिवर्तित हो गया। असमानता, अलगाववाद, क्षेत्रवाद, रूढ़िवादिता समाज में पूरी तरह व्याप्त थी। यह सामंती दौर था जब गरीबों, दलितों, महिलाओं और विकलांगों को न्याय नहीं मिलता था। आजादी के बाद कुछ परिवर्तन अवश्य हुआ है, लेकिन अब भी समाज का बड़ा हिस्सा न्याय की तलाश में भटकता नजर आता है।

अदालतों में विचाराधीन मुकदमों को देखा जाए तो देश में न्याय प्रक्रिया की स्थिति बड़ी शोचनीय नजर आती है। देश भर की अदालतों में कोई तीन करोड़ मामले लंबित हैं। इनका निपटारा कब तक हो पाएगा, कहना मुश्किल है। मुकदमों का यह पिरामिड देशवासियों के लिए चिंता का विषय है। अदालती फैसलों में पांच-छह साल लगना तो सामान्य-सी बात है, पर अगर बीस-तीस साल में भी निपटारा न हो तो आम लोगों के लिए यह किसी नारकीय त्रासदी से कम नहीं है। वैसे तो न्याय का मौलिक सिद्धांत यह है कि ‘न्याय में विलंब होने का मतलब न्याय को नकारना है’। विडंबना यह है कि अदालतों में जब करोड़ों मामलों में नित्य न्याय की प्रक्रिया मुल्तवी की जा रही हो तो आम आदमी को न्याय सुलभ हो पाना मृग मरीचिका जैसा ही है।

दरअसल, अदालतों में त्वरित निर्णय न हो पाने के लिए प्रशासनिक कार्यप्रणाली ही ज्यादा दोषी है जो अंगरेजी शासन की देन है। उसमें व्यावहारिक परिवर्तन आज तक नहीं किया गया है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश हों, देश के विधिमंत्री हों या अन्य, लंबित मुकदमों के अंबार को देख कर चिंता में डूब जाते हैं, लेकिन किसी को हल नजर नहीं आता। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि अदालतों में जजों की कमी है। उच्च न्यायालयों के लिए डेढ़ हजार और निचली अदालतों के लिए तेईस हजार जजों की आवश्यकता है। फिलहाल उच्च न्यायालयों में ही दो सौ अस्सी पद रिक्त पड़े हैं। जजों की कार्य-कुशलता के संबंध में ओड़िशा हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश बिलाई नाज ने कहा कि मजिस्ट्रेट कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कई जज फौजदारी मामले निपटाने में अक्षम हैं। 1998 की फौजदारी अपीलें मुंबई उच्च न्यायालय में इसलिए विचाराधीन पड़ी हैं, क्योंकि कोई जज प्रकरण का अध्ययन करने में दिलचस्पी नहीं लेता।

पदों की कमी और रिक्त पदों को भरे जाने में विलंब ऐसी समस्याएं हैं, जिनका निराकरण जल्दी होना चाहिए, पर यहां भी यथावत शिथिलता देखी जा सकती है। अखबारों और टीवी के सर्वव्यापी अस्तित्व के बावजूद नोटिस तामील के लिए उनका सहारा नहीं लिया जाता। नोटिस तामील होने में काफी वक्त जाया होता है। आवश्यकता इस बात की है कि कानूनों में अपेक्षित सुधार कर जमानत और अपीलों की शृंखला में कटौती की जाए और रोज पेशियां बढ़ाने पर बंदिश लगाई जाए।

यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि दलित अत्याचार संबंधी कानून को कभी ठीक से लागू नहीं किया गया। पुलिस अधिकारियों को दलितों-आदिवासियों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाने के लिए कानून के अहम प्रावधानों के बारे में ठीक से अवगत कराने का प्रयास नहीं हुआ। हमारे संविधान में सामाजिक और आर्थिक न्याय की गारंटी समस्त नागरिकों को दी गई है। संविधान के अनुच्छेद इक्कीस के जरिए जीने के अधिकार की गारंटी मिली हुई है। सामाजिक न्याय का मुख्य उद््देश्य व्यक्तिगत हित और सामाजिक हित के बीच सामंजस्य स्थापित करना है। इसलिए कल्याणकारी राज्य की कल्पना संविधान निर्माताओं ने की थी। बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय को ध्यान में रखते हुए समाजवादी व्यवस्था का प्रावधान भी रखा गया। पर राजनीतिक स्वार्थों और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी ने समाजवादी स्वप्न साकार नहीं होने दिया।

राजनीतिक और नौकरशाह भ्रष्टाचार में लिप्त होते गए। देश में भ्रष्टाचार इतना सर्वव्यापी हो चुका है कि संप्रति व्यवस्था का कोई भी कोना उसकी सड़ांध से बचा नहीं है। लेकिन उच्च न्यायपालिका कुछ अपवाद छोड़ कर सामान्यतया साफ-सुथरी ही कही जाएगी। पश्चिम बंगाल के न्यायमूर्ति सेन और कर्नाटक के दिनकरन जैसे मामले प्रकाश में आने से न्यायपालिका की धवल छवि पर कालिख के छींटे पड़े हैं। उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के जजों को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया इतनी जटिल है कि कार्रवाई किया जाना बहुत कठिन होता है। न्यायिक आयोग के गठन का मसला बरसों से अधरझूल में था। पर जब इस पर कानून बना भी, तो सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले से उस पर पानी फिर गया।

एक पहलू यह भी है कि अगर विगत छह दशकों में राज्य के तीन अंगों यानी विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका के प्रदर्शन पर नजर डाली जाए तो इनमें न्यायपालिका को बेहतर माना जाएगा। अनेक अवसरों पर उसने विधायिका और कार्यपालिका द्वारा संविधान के उल्लंघन को रोका है। उसकी सक्रियता ने जनजीवन में एक नई उम्मीद भी पैदा की। लेकिन न्यायालय से पूर्व की न्याय प्रक्रिया किस तरह प्रारंभ होती है इसे भी देखना आवश्यक है। संविधान के अनुच्छेद-21 में उल्लिखित गरिमामय ढंग से जीने के अधिकार की उच्चतम न्यायालय की विभिन्न व्याख्याओं से स्पष्ट है कि मानव जीवन पशुवत नहीं है और सम्मान और गरिमा के साथ जीवन यापन करना हमारा अधिकार है और यह मानवाधिकार भी है। अलबत्ता यह एक ऐसी सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक प्रणाली में ही संभव है जो स्वस्थ और पारदर्शी हो।

लेकिन जिस व्यवस्था के बल पर देश में सुशासन लाने की बात होती रही है वही व्यवस्था कुशासन की नींव बन चुकी है। आखिर क्या वजह रही कि पुलिस व्यवस्था जनतांत्रिक मूल्यों के हिसाब से ढल नहीं पाई है; वह अब भी बहुत हद तक औपनिवेशिक जमाने की खामियों की शिकार है और उसे लेकर भ्रष्टाचार की शिकायतें भी आम हैं। ‘इंडिया करप्शन एंड ब्राइबरी रिपोर्ट’ के अनुसार भारत में रिश्वत मांगने वाले सरकारी कर्मचारियों में तीस प्रतिशत की भागीदारी अकेले पुलिस तंत्र की है। भारत में पुलिस के हस्तक्षेप का दायरा बहुत विस्तृत है, इसीलिए उसके पास असीमित अधिकार हैं। वह राज्यसत्ता की सबल संस्था है, सत्ता का सशक्त औजार भी है। जाहिर है, उसका चरित्र राजसत्ता के चरित्र से अलग नहीं हो सकता।

पुलिस द्वारा रिश्वत प्राथमिकी दर्ज करवाने, आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज करने में कोताही बरतने या मामला न दर्ज करने तथा जांच करते समय सबूतों को नजरअंदाज करने संबंधी मामलों में ली जाती है। रसूखदारों के दबाव में काम करना तथा अवांछित राजनीतिक हस्तक्षेप को झेलना पुलिस की नियति हो गई है। पुलिस सुधार और पुनर्संगठन की आवश्यकता कई दशकों से महसूस की जा रही है, लेकिन इस दिशा में पहल नहीं की जाती। केंद्र के गृहमंत्री और कानूनमंत्री कोई पहल नहीं करते। वे हमेशा इस दलील की आड़ लिए रहते हैं कि कानून-व्यवस्था राज्यों की जिम्मेदारी है इसलिए वे कुछ नहीं कर सकते। उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यकों पर हिंसा और हरियाणा में दलितों पर अत्याचार की हाल की घटनाएं इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि किस तरह बहुसंख्यकों और खाप पंचायतों ने ऐसे हमलों की योजना बनाई और उन पर खुलेआम अमल करवाया। आगजनी तथा हत्याओं में लिप्त अपनी जाति के लोगों को बचाने में खाप पंचायतें आगे आर्इं। कहीं सांप्रदायिक तनाव का माहौल बनाया गया। कहीं दंगे करवाए गए। कहीं दलितों को जिंदा जलाया गया। चुनाव और वोट की राजनीति की गई।

प्राय: यह देखा जाता है कि पुलिस और प्रशासनिक अमला ऊंची-दबंग जातियों के हितों की हिफाजत करने में लगा रहता है। स्वाभाविक तौर पर प्रश्न उठता है कि जब तक समाज के मानस में बदलाव नहीं होगा- जिसे नए किस्म के समाज सुधार तथा सांस्कृतिक आंदोलनों से क्रियान्वित किया जा सकता है- क्या हमारे लिए यह संभव होगा कि हम जमीनी स्थिति में कोई गुणात्मक फर्क ला सकें।

पुलिस तंत्र की स्थापना कानून-व्यवस्था को कायम रखने के लिए की गई थी। आज भी पुलिस तंत्र का यही कर्तव्य माना जाता है कि वह सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करे तथा जनजीवन को भयमुक्त रखे। इसके लिए पुलिस को पर्याप्त अधिकार भी प्राप्त हैं। भारत का राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक विकास, बढ़ती जनसंख्या, प्रौद्योगिकी का विकास, सफेदपोश अपराधों में बढ़ोतरी, इन तमाम परिस्थितियों के कारण पुलिस तंत्र की जिम्मेदारी भी बढ़ी है। लेकिन भारतीय समाज में पुलिस की तानाशाहीपूर्ण छवि, जनता के साथ मित्रवत न होना तथा अपने अधिकारों के दुरुपयोग के कारण वह आरोपों से घिरती गई है। आज स्थिति यह है कि पुलिस बल समाज के तथाकथित ठेकेदारों, नेताओं तथा सत्ता के हितों की कठपुतली बन गया है। समाज का दबा-कुचला वर्ग तो पुलिस के पास जाने से भी डरता है।

चूंकि पुलिस के पास सिविल समाज से दूरी बनाए रखने और उसके ऊपर बेजा प्रभाव डालने की तमाम व्यावहारिक शक्तियां हैं इसलिए साधारण वर्ग अपनी आवाज उठाने की हिम्मत नहीं कर पाता और वह करता भी है तो उसके भयावह परिणाम उसे भोगने पड़ते हैं। कार्यपालिका और न्यायपालिका उसकी कोई मदद नहीं कर पाती हैं, क्योंकि उनका आधार पुलिस पर ही टिका होता है। ऐसे में सामान्य व्यक्ति को न्याय मिलना दूर की संभावना ही कही जाएगी। चौथा खंभा कहलाने वाला मीडिया भी राजनीतिक दबावों से बच नहीं पाया है। इसकेअलावा, वह मुनाफा कमाने के औजार के रूप में भी तब्दील हो चुका है। अब वह भी सामान्य व्यक्ति के दुख-दर्द का साझीदार नहीं है। ऐसी स्थिति में समाज के पास एक सशक्त आंदोलन निर्मित करने करने अलावा कोई और विकल्प शेष नहीं बचता है। (शैलेंद्र चौहान)

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