जिनपिंग की सत्ता और चुनौतियां

जिनपिंग जिस रास्ते पर बढ़ गए हैं, उससे वे पीछे हटने वाले नहीं हैं। अमेरिकी रणनीतियों के जवाब में चीन ने रूस और पाकिस्तान के साथ खेमा बना लिया है।

जिनपिंग। फाइल फोटो।

सतीश कुमार

जिनपिंग जिस रास्ते पर बढ़ गए हैं, उससे वे पीछे हटने वाले नहीं हैं। अमेरिकी रणनीतियों के जवाब में चीन ने रूस और पाकिस्तान के साथ खेमा बना लिया है। इसमें ईरान भी चीन के साथ है। इससे साफ है कि अब दुनिया फिर से दो अलग अलग ध्रुवों में बंट गई है।

चीन की साम्यवादी व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव पांच साल पहले यानी 2016 से ही शुरू हो गया था। तानाशाही व्यवस्था को अपनी पकड़ और मजबूत करने के लिए राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने काम अपने दूसरे कार्यकाल के पहले ही शुरू कर दिया था। जिनपिंग 2012 में राष्ट्रपति बने थे और उसके बाद से ही चीन का दुनिया के साथ टकराव बढ़ने लगा। जिनपिंग के पहले कार्यकाल तक यह टकराव थोड़ा धीमा था। लेकिन दूसरा कार्यकाल शुरू होते ही यह तेज होता गया। आज भारत सहित चीन का हर पड़ोसी देश उससे परेशान है।

राष्ट्रपति जिनपिंग धीरे-धीरे चीन की राजनीति में अपने वर्चस्व की कहानी लिख रहे हैं। हाल में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया है जिसमें चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने शी जिनपिंग को ‘कोर लीडर’ का दर्जा दिया है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के इस प्रस्ताव में उन्हें चीन और पार्टी दनों के लिए रीढ़ की हड्डी की तरह महत्त्वपूर्ण बताया है।

खास बात यह है कि चीन में ‘कोर लीडर’ का दर्जा इससे पहले सिर्फ दो लोगों, 1945 में माओ त्से तुंग और 1978 में तेंग श्याओफिंग को दिया गया था। ताइवान, हांगकांग और भारत के साथ जारी सीमा विवाद को लेकर भी जिनपिंग ने चीन में अपनी छवि मजबूत की है। उन्होंने तीसरे कार्यकल को लेकर ‘सभी के लिए सामान्य समृद्धि’ सहित कई पहल की हैं। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि जिनपिंग अपने तीसरे कार्यकाल से पहले सब कुछ अपने पक्ष में कर लेना चाहते हैं ताकि उनका कहीं कोई विरोध न हो।

जिनपिंग के तीसरे कार्यकाल को लेकर दुनिया के सामने कई गंभीर सवाल हैं। जैसे कि जिनपिंग के अगले कार्यकाल में दुनिया कैसी शक्ल लेगी? न सिर्फ पड़ोसी देशों बल्कि अमेरिका को लेकर चीन किस नीति पर चलेगा? भारत-चीन रिश्तों में किस तरह के बदलाव आएंगे? महासागरों में विस्तारवादी नीतियों को लेकर चीन कैसी रणनीति अपनाएगा? क्या संघर्ष और युद्ध के हालात पैदा होंगे? ये ऐसे सवाल हैं जिन्होंने कई देशों को चिंता में डाल दिया है।

सत्ता में आते ही जिनपिंग ने दुनिया को यह अहसास कराना शुरू कर दिया था कि दुनिया की बागडोर अब चीन के पास आने वाली है, इसलिए इसकी तैयारी और सोच बन जानी चाहिए। कुछ कदम उठा कर चीन ने इसके सबूत भी दिए। वह जापान के सिंकाकु द्वीप पर कब्जे करने की तैयारियों में लग गया। दक्षिण चीन सागर में पड़ोसी देशों के साथ चीन के जल सीमा विवाद बढ़ने लगे। चीन ने हांगकांग के पचास वर्षों के विलय संधि को मानने से इंकार कर दिया और एक देश दो व्यवस्था की प्रणाली को तोड़ने की मुहिम शुरू कर दी। सबसे अहम तो ताइवान को चीन में मिलाने के लिए चीन का बढ़ता आक्रामक रुख है जिसे न केवल क्षेत्रीय शांति बल्कि वैश्विक शांति के लिए बड़े खतरे के रूप में देखा जा रहा है।

अगर सामरिक दृष्टि से इसे समझा जाए तो चीन के तीन दुश्मन हैं। एक जापान, दूसरा भारत और तीसरा अमेरिका। भारत के साथ चीन का अड़ियल रुख 2017 से ही बना हुआ है। डोकलाम विवाद से लेकर पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में पिछले साल हुआ टकराव इसका प्रमाण है। तीसरा देश अमेरिका है जिसके साथ चीन का व्यापार युद्ध दुनिया के कारोबार पर वर्चस्व को लेकर है। एशिया, मध्य एशिया से लेकर यूरोप और अफ्रीका तक जिस तेजी से चीन के कदम बढ़े हैं, उससे अमेरिका तक की नींद उड़ी हुई है।

ताइवान को लेकर अमेरिका भी प्रतिबद्ध है कि हर कीमत पर उसकी राजनीतिक व्यवस्था और स्वयत्तता को अक्षुण्ण रखा जाएगा। चीन ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को भी अपने तरीके से हांकने की कोशिशें शुरू कर दी हैं। चाहे अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून का मुद्दा हो या विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसे वैश्विक निकायों से जुड़े मुद्दे, चीन मनमाने ढंग से बर्ताव कर रही है। इसलिए चीन दुनिया के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है और यह सब शी जिनपिंग के कार्यकाल में देखने को मिल रहा है।

इसीलिए चीन को घेरने की रणनीतियां भी तेजी से बन रही हैं। हालांकि चीन इसे समझ रहा है। पर वह अपनी विस्तारवादी नीतियों को अब छोड़ने वाला नहीं। जिनपिंग ने चीन को दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य ताकत बना देने का संकल्प जो कर लिया है। अंतरिक्ष युद्ध की तैयारियों में भी चीन अमेरिका को खुल कर चुनौती दे रहा है। यही कारण है कि अमेरिका ने कुछ देशों को साथ लेकर चीन को घेरने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाए हैं। भारत, जापान और आस्ट्रेलिया के साथ मिल कर क्वाड नाम का चौगुटा चीन के मसले पर सक्रिय है। कुछ महीने पहले अमेरिका ने ब्रिटेन और आस्ट्रेलिया के साथ सैन्य समझौता कर आस्ट्रेलिया को परमाणु पनडुब्बी तकनीक मुहैया करवाने का रास्ता साफ कर दिया। जाहिर है, अमेरिका भारत, आस्ट्रेलिया और जापान जैसे देशों की मदद से चीन के खिलाफ तगड़ी मोर्चाबंदी में लगा है।

पर जिनपिंग जिस रास्ते पर बढ़ गए हैं, उससे वे पीछे हटने वाले नहीं हैं। अमेरिकी रणनीतियों के जवाब में चीन ने रूस और पाकिस्तान के साथ खेमा बना लिया है। इसमें ईरान भी चीन के साथ है। इससे साफ है कि अब दुनिया फिर से दो अलग अलग ध्रुवों में बंट गई है। यह संघर्ष महज दो देशों के बीच नहीं है, बल्कि दो अलग-अलग राजनीतिक धड़ों के बीच भी है। चीन और रूस की राजनीतिक इकाई अधिनायकवाद की है। रूस पुतिन के नेतृत्व में पुन: लोकतंत्र से अधिनायकवादी बन गया है। शी जिनपिंग की तरह पुतिन भी अनिश्चितकाल तक रूस के राष्ट्रपति बने रहेंगे।

हालांकि यहां एक सवाल यह भी उठता है कि क्या यह परस्पर विरोधी खेमा हर मुद्दे पर एक बना रहेगा? यह नहीं भूलना चाहिए कि हर देश के अपने राष्ट्रीय हित अलग-अलग हैं। जहां चीन को उदारवादी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था से खूब लाभ हुआ है, वहीं रूस को बेहद नुकसान झेलना पड़ा है। चीन आज जिस महाशक्ति के रूप में उभरा है, उसके पीछे उदारवादी अर्थव्यवस्था ही है। चीन के रूस, ईरान या पाकिस्तान के साथ नहीं बल्कि यूरोप और अमेरिका के साथ भी बेहद मजबूत आर्थिक रिश्ते हैं। वही रूस पूरी तरह से अमेरिका जनित विश्व व्यवस्था से पूरी तरह क्षुब्ध है।

चीन के भीतर हो रहे बदलाव भारत के लिए एक चुनौती हैं। चीन नई विश्व व्यवस्था में भारत के कद को बौना कर देना चाहता है। इसलिए भारत ने अमेरिकी दामन थाम लिया है। यह समझते हुए भी कि कई अहम मुद्दों पर भारत और अमेरिका के बीच सोच में अंतर है। लेकिन इस हकीकत से इनकार नहीं किया जा सकता कि भारत और दक्षिण एशिया के लिए चीन की नीतियां घातक हैं।

इसलिए अमेरिका का साथ भारत के लिए अपरिहार्य है। अमेरिकी कांग्रेस के एक आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीन ने भारत के प्रति ‘आक्रामक’ विदेश नीति अपनाई है। साथ ही वास्तविक नियंत्रण रेखा स्पष्ट करने के प्रयासों को रोका है। इससे शांति कायम करने में रुकावटें आई हैं। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 2012 में शी के सत्ता में आने के बाद से झड़पें बढ़ गई हैं। 2020 की गलवान झड़प बेजिंग की आक्रामक विदेश नीति का परिणाम है। यह झड़प ऐसे समय हुई है जब बेजिंग हिंद-प्रशांत क्षेत्र जैसे कि ताइवान और दक्षिण तथा पूर्वी चीन सागर पर संप्रभुता के अपने दावों पर आक्रामक रूप से जोर दे रहा है।

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