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किसान आयोग की जरूर क्यों

खेती और किसानी पर जितनी बातें हमारे देश में होतीं हैं, अगर उनका कुछ अंश भी साकार हो तो हमारे यहां खेती को वाकई पुनर्जीवन मिल जाएगा।

Author Published on: December 18, 2015 10:41 PM

खेती और किसानी पर जितनी बातें हमारे देश में होतीं हैं, अगर उनका कुछ अंश भी साकार हो तो हमारे यहां खेती को वाकई पुनर्जीवन मिल जाएगा। जो खेती इस समय मजबूरी का कार्य बन चुकी है, जिसे करने वाले अन्य पेशों से अपने को हीनतर मानने की स्वाभाविक मानसिकता में जीते हैं, और अन्य पेशों के लोग भी किसानी को हेय दृष्टि से देखते हैं वह स्थिति आसानी से बदली जा सकती है। बस, जरूरत है उसे प्राथमिकता में लेकर कुछ समय तक राष्ट्रीय अभियान की तरह खेती को सर्वोपरि बनाने संबंधी सरकारी भूमिका और उसके अनुरूप कुछ कदमों की। लिहाजा, राष्ट्रीय किसान आयोग के गठन की मांग हर दृष्टि से उपयुक्त है। वैसे यह खबर आ चुकी है कि मोदी सरकार ने इस तरह के आयोग का गठन करने का सैद्धांतिक तौर पर फैसला कर लिया है।
हम इसके बारे में विस्तार से चर्चा करें उसके पहले जरा अर्थव्यवस्था के दो अन्य क्षेत्रों उद्योग और सेवा के लिए बनी ढांचागत संस्थाओं को देख लीजिए। यदि आप उनका विवरण देने बैठेंंगे तो पन्ने के पन्ने भर जाएंगे। ठीक उसके समांतर खेती और किसानी के लिए कौन-सी ऐसी संस्था है जहां किसान अपनी मांग रखें और वह सरकारों तक निर्धारित प्रक्रिया के तहत पहुंच जाए? कौन ऐसी संस्था है जहां सरकार स्वयं कई स्तरों की भूमिका का निष्पादन कर सके, जैसा वह उद्योग व कारोबार के लिए करती है?
इन सबका उत्तर आएगा कि ऐसी कोई संस्था है ही नहीं। राष्ट्रीय कृषि लागत मूल्य निर्धारण आयोग है, जो कि किसानों की पैदावार का मूल्य तय करता है। खेती को राज्यों का विषय बना दिए जाने के कारण वैसे भी ज्यादा जिम्मेवारी राज्यों की आ जाती है। वास्तव में खेती और किसानों की समस्याओं और आवश्यकताओं पर समग्रता मेंं विचार करने के लिए किसी ढांचागत संस्था के न होने से बड़ी शोचनीय स्थिति पैदा हुई है। किसान आयोग उसमें उम्मीद की किरण बनकर आ सकता है। देखना होगा सरकार उसे कितना अधिकार देती है, उसकी संरचना केंद्र से राज्यों तक कैसी होती है ताकि वह एक दंतहीन संस्था बन कर न रह जाए।
खेती का योगदान हमारी समूची अर्थव्यवस्था मेंं भले चौदह-पंद्रह प्रतिशत रह गया हो, लेकिन आज भी हमारी आबादी के साठ प्रतिशत से ज्यादा लोगों का जीवन उसी पर निर्भर हो। चाहे वे सीधे खेती करते हों या खेती से जुड़ी अन्य गतिविधियों में लगे हों। भारतीय अर्थव्यवस्था को इसीलिए तो असंतुलित अर्थव्यवस्था कहते हैं जिसमें उद्योग तथा सेवा क्षेत्र का योगदान पचासी प्रतिशत के आसपास है लेकिन इस पर निर्भर रहने वालों की संख्या चालीस प्रतिशत से कम होगी। उसमें भी सेवा क्षेत्र में ऐसे अनेक कार्य हैं जिनका जुड़ाव आपको खेती या उससे संबंधित गतिविधियों से मिल जाएगा। सेवा के अनेक क्षेत्र दोनों से भी जुड़े हैं। अगर भारत की अर्थव्यवस्था को संतुलित करना है तो फिर खेती को प्राथमिकता में लाना होगा और जो काम पहले न हो सका या आरंभ करके फिर रोक दिया गया उन सबको वर्तमान परिप्रेक्ष्य में करने या फिर से आरंभ करने की आवश्यकता है। राष्ट्रीय किसान आयोग उनमें सर्वप्रमुख माना जा सकता है।
आरंभ में किसान संगठनों ने जो प्रस्ताव देश के सामने रखा था उसमें कहा गया था कि खेती-बाड़ी को फायदेमंद बनाने तथा युवाओं को इस क्षेत्र में आकर्षित करने के लिए राष्ट्रीय किसान विकास आयोग बनाया जाना चाहिए। आयोग अकेली संस्था हो जिसमें सारी अन्य संबंधित संस्थाओं को समाहित कर दिया जाए। मसलन, कृषि लागत और मूल्य आयोग तथा लघु कृषक कृषि व्यापार संघ का इसमें या तो विलय कर दिया जाए या फिर उनके मातहत बना दिया जाए। कारण, ये दोनों संस्थाएं किसानों की पैदावार के लागत मूल्य के मूल्यांकन तथा उचित मूल्य दिलवाने में सफल नहीं रही हैं। क्यों न किसान आयोग ही फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करे और फसलों से जुड़े तमाम कार्यों को देखे।
आयोग का मतलब ही है कि वह उचित मूल्य दिलवाने के साथ कृषि पैदावार कैसे बढ़े, किसान उनका रख-रखाव कैसे करें या उनको सुरक्षित कैसे रखा जाए इस सब में मार्गदर्शक व प्रबंधक की भूमिका निभाए। इसके साथ यह भी कहना उचित होगा कि देश के सभी किसान संगठनों को मिलाकर प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में भारतीय कृषक परिसंघ का भी गठन किया जाए जिसमें सभी राज्यों के मुख्यमंत्री और कृषिमंत्री रहें। कोई भी स्वीकार करेगा कि इससे कृषि क्षेत्र के समन्वित विकास को गति मिल सकेगी। ध्यान रखिए, भाजपा ने अपने घोषणापत्र में वायदा किया हुआ है कि वह एमएस स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुरूप किसान को कृषि उपज की लागत पर पचास प्रतिशत लाभ दिलाना सुनिश्चित करेगी। इसी पहलू को लीजिए।
हम जानते हैं कि अभी तक किसानों को उनकी उपज के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य ही मिलता है। लाभ या मुनाफा शब्द का कहीं प्रयोग नहीं है। लेकिन यह कैसे होगा? यहीं किसान आयोग की भूमिका शुरू होती है। वह अपने अनुसार पैदावार की लागत तय करेगा फिर उसके आधार पर मुनाफा का निर्धारण हो सकेगा। इस समय किसानों की लागत आंकने के जो तरीके हैं उनमें जमीन का किराया, बीज से लेकर उपज तक के खर्च तथा परिवार के श्रम का भी एक मोटामोटी आकलन किया जाता है, जिसमें मुनाफा होता ही नहीं। कारण जमीन का किराया ही कम कर दिया जाता है। हालांकि किसानों की पैदावार के मूल्य जितने बढ़ते हैं, खाद्यान्न महंगाई भी उसी तुलना में बढ़ती है जो कि सरकारों के लिए सिरदर्द भी साबित होती है। मगर इस महंगाई की कीमत किसानों की जेब में नहीं जाती, यह भी सच है। कम से कम आयोग इस बात का तो खयाल रखेगा कि जो मूल्य बाजार में हैं उनका उचित आनुपातिक हिस्सा किसानों को मिले।
लेकिन जैसा कि ऊपर कहा गया है, किसान आयोग का कार्य केवल मूल्य तय करना नहीं होगा। यह उसके कार्य का एक प्रमुख हिस्सा अवश्य होगा। आखिर कृषि उत्पादनों के बाजार का नियमन राज्य सरकारों के पास है और इसके लिए हर राज्य का एक कृषि उत्पाद विपणन समिति कानून (एपीएमसी एक्ट) है। कोई भी राज्य सरकार इसमें बदलाव लाकर संगठित व्यापारियों की नाराजगी मोल लेना नहीं चाहती। कम से कम आयोग तो ऐसे दबावों से मुक्त होकर काम कर सकेगा।
भारतीय खेती इस समय एक साथ कई संकटों और चुनौतियों का सामना कर रही है। परंपरागत खेती के तरीके ध्वस्त कर दिए जाने से जो कृषि अपने-आप में स्वावलंबी थी वह आज पूरी तरह परावलंबी हो गई है। बीज तक के लिए किसान बड़ी कंपनियों पर निर्भर हैं। उर्वरक तो खैर उनके हाथ में था ही नहीं। इनके मूल्य कंपनियां तय करती हैं। सिंचाई का संकट है। सरकारी योजनाओं के चलते सस्ते खाद्यान्न उपलब्ध होने से तथा मनरेगा के कारण खेती के लिए मजदूर मिलना कठिन है।
पहले की तरह कुछ किलो अनाज देकर आप मजदूरी नहीं करा सकते, क्योंकि उसे सस्ती दर पर गेहूं-चावल मिल जाता है। इससे सीमांत और मध्यम किसानों के लिए खेती करना दूभर होता जा रहा है। मनरेगा ने मजदूरी की दर तय कर दी है। वर्ष में सौ दिनों का रोजगार है। उससे अनाज उसे अच्छी मात्रा में मिल जाता है, फिर क्यों खेत पर काम करने जाएगा। इसके बीच कैसे संतुलन बनाया जाए यह इस समय का सबसे जटिल प्रश्न है। अगर किसान आयोग होगा तो इस पर अध्ययन करके उसके अनुसार जो कदम उसके दायरे में होगा वह उठाएगा और जो केंद्र और राज्य सरकारों के बस में होगा उसके लिए सिफारिशें करेगा।
यहां पूर्व में किसान आयोगों के अनुभवों का भी ध्यान रखना होगा। कई राज्यों में पहले किसान आयोग बने, पर वे बंद कर दिए गए। उदाहरण के लिए मध्यप्रदेश को लीजिए। 19 सितंबर 2006 को आयोग का गठन किया गया था, लेकिन 31 दिसंबर 2010 को ही बंद कर दिया गया। क्यों? क्योंकि यह केवल सिफारिशी संस्था बन कर रह गई थी। भारतीय किसान संघ ने मांग की कि इसे संवैधानिक दर्जा दिया जाए या इसे बंद कर दिया जाए। सरकार ने संवैधानिक दर्जा देने यानी अधिकार संपन्न बनाने की जगह इसे बंद कर दिया। प्रदेश में आयोग ने अपने चार वर्ष तीन माह के कार्यकाल में सात प्रतिवेदन राज्य सरकार को सौंपे। इनमें 811 अनुशंसाएं की गर्इं, जिनमें कुछ पर ही काम हुए।
वस्तुत: किसान आयोग केवल सिफारिशी संस्था होगा तो उससे ज्यादा-कुछ हासिल नहीं हो सकता। उसे शक्तियां भी देनी होंगी, अन्यथा इसकी भूमिका कार्यशाला आयोजित करने, भाषण करने-करवाने, किसानों से संवाद करने तथा सुझाव देने तक सीमित रह जाएगी। बहरहाल, वही मध्यप्रदेश सरकार अब किसान आयोग और कृषि विकास परिषद, दोनों का गठन करने जा रही है।
राष्ट्रीय किसान आयोग के लक्ष्य बिल्कुल साफ होने चाहिए। सबसे पहले खेती को कैसे लाभ का पेशा बनाया जाए तथा पढ़े-लिखे लोग भी इसमें आएं इस पर उसे ध्यान केंद्रित करना होगा। दूसरे, किसानों का जीवन-स्तर ऊंचा उठे, उनके परिवार को खेती से कैसे व्यवस्थित जीवन जीने का आधार मिले इस पर काम होगा। कुल मिलाकर खेती को विकसित करने की नीतियों, कार्यक्रमों, उपायों की दिशा मेंं वह किसानों के साथ मिलकर और सरकारों के साथ सामंजस्य स्थापित करके काम करे। ऐसा होता है तो निश्चय मानिए राष्ट्रीय किसान आयोग कृषि क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन का वाहक बन जाएगा।

 

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