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राजनीति: विकास बनाम पर्यावरण

सरकारों ने गांधी के ‘स्वदेशी’ मॉडल को जिस तरह दरकिनार कर दिया, उसका नतीजा सामने है। देश के ज्यादातर बड़े शहर कई बड़ी पर्यावरणीय समस्याओं और जनसंख्या वृद्धि की चपेट में आ गए हैं। इसलिए जिस विकास के मॉडल के रास्ते पर हम बढ़ रहे हैं, उससे निकट भविष्य में ग्रीन हाउस गैसों की विकट समस्या से निजात पाना संभव नहीं लगता है।

तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Image Source: pixabay)

पर्यावरण प्रदूषण को लेकर 1972 में स्टाकहोम में संयुक्त राष्ट्र की एक उच्च स्तरीय बैठक हुई थी। दुनिया के मुल्कों से शिरकत करने आए तमाम नेताओं ने इस बाबत खुल कर अपने विचार रखे थे और सुझाव भी दिए थे। इसी बैठक में ‘पर्यावरण क्षरण’ की विकट समस्या और उससे पैदा होने वाले संकट पर गौर करने पर सहमति बनी थी। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि बैठक में जिन बिंदुओं पर सहमति हुई थी, उन पर पूरी तरह अमल आज तक नहीं किया जा सका है और आज भी वे बिंदु समाधान की बाट देख रहे हैं। पर्यावरण प्रदूषण की समस्या को लेकर होने वाले सभी सम्मेलनों में सभी देशों का बराबर महत्त्व है और सभी देशों को अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है, लेकिन सच्चाई यह है कि इसमें बड़े और विकसित देश पूरी तरह से हावी रहते हैं। विकसित देशों की कूटनीति ही पूरे सम्मेलन में हावी रहती है। यह सभी जानते हैं कि दुनिया के सभी विकसित देशों की, खासकर अमेरिका की ही कूटनीति हर बार सिर चढ़ कर बोलती है। इसलिए सर्वसम्मति से कार्बन उत्सर्जन की कटौती का प्रस्ताव पारित होने के बावजूद बात बनती नहीं।

गौरतलब है कि अमेरिका और चीन सबसे अधिक कार्बन उत्सर्जन करने वाले देश हैं। चीन भले ही विकसित देशों की श्रेणी में न अभी शामिल किया गया हो, लेकिन इसके विकास की रफ्तार विकसित देशों से भी तेज होती जा रही है। कई मामलों में तो चीन बहुत आगे निकल चुका है। इसलिए चीन की भी नकेल कसने की जरूरत है। भारत विकासशील देशों में अभी चीन ही नहीं, अन्य कई देशों से भी पीछे है। कार्बन उत्सर्जन के मामले में भी भारत अमेरिका और चीन से बहुत पीछे है। ग्रीन हाउस गैसों के मामले में एक अमेरिकी एक साल में 16.6 टन कार्बन डाइआॅक्साइड का उत्सर्जन करता है, जबकि एक भारतीय महज 1.5 टन कार्बन डाइआॅक्साइड का उत्सर्जन करता है। यानी एक अमेरिकी बारह भारतीयों के बराबर ग्रीन हाउस गैसों को छोड़ने का जिम्मेदार है।

आंकड़े के अनुसार कार्बन उत्सर्जन के मामले में भारत विश्व के कुल कार्बन उत्सर्जन का महज प्रति व्यक्ति 1.7 टन ही करता है। भारत इसे और भी कम करने की कोशिश में लगा है। इसी के तहत राष्ट्रीय सौर ऊर्जा मिशन, राष्ट्रीय ऊर्जा कुशलता वृद्धि मिशन, राष्ट्रीय हरित भारत मिशन, राष्ट्रीय सतत बसावट भारत मिशन, हिमालय पारिस्थितिकी प्रणाली, राष्ट्रीय हरित कृषि मिशन तथा जलवायु परिवर्तन के लिए राष्ट्रीय रणनीतिक ज्ञान मिशन की स्थापना की गई है और इन पर कार्य भी चल रहा है।

हर साल जंगलों में आग लगने से निकला धुआं हिमालयी क्षेत्र के ग्लेशियरों पर जमता जा रहा है। इससे कार्बन के कण गर्मी अधिक सोख रहे हैं। इस कारण आने वाले समय में तापमान बढ़ने से ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है। इससे जहां टिहरी बांध पर दबाव बढ़ेगा, वहीं निचले इलाकों में बाढ़ का खतरा बढ़ गया है। दूसरी ओर यह भी बताया जा रहा है कि इस वर्ष जंगल की आग के कारण उत्तर भारत का तापमान 0.2 डिग्री बढ़ सकता है और इससे मानसून प्रभावित हो सकता है। भारत का तकरीबन पूरा उत्तरी इलाका जंगलों की आग और फैक्ट्रियों की जहरीली गैसों से पूरी तरह प्रदूषित हो चला है। इसका सीधा असर भी इस इलाके में दिखाई पड़ रहा है।

अब भारत के सामने सबसे बड़ी चिंता विकास और साथ ही पर्यावरण को बेहतर बनाए रखने की है। गौरतलब है कि आजादी के बाद जिस पश्चिमी विकास के मॉडल को अपनाया गया, उसका असर हर स्तर पर दिखाई देने लगा है। खासकर खेती-किसानी, कुटीर उद्योगों और मझोले उद्योगों की खस्ता हालत इसका प्रमाण है। सरकारों ने गांधी के ‘स्वदेशी’ मॉडल को जिस तरह दरकिनार कर दिया, उसका नतीजा सामने है। देश के ज्यादातर बड़े शहर कई बड़ी पर्यावरणीय समस्याओं और जनसंख्या वृद्धि की चपेट में आ गए हैं। इसलिए जिस विकास के मॉडल के रास्ते पर हम बढ़ रहे हैं, उससे निकट भविष्य में ग्रीन हाउस गैसों की विकट समस्या से निजात पाना संभव नहीं लगता है। आज भारत के कई शहर दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में शुमार हो चुके हैं। राजधानी दिल्ली में प्रदूषण की समस्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन आम जनता और सरकार क्या इस खतरे के प्रति वाकई संवेदनशील हैं? हमारी स्थिति अमेरिकी लोगों जैसी ही होती जा रही है जहां अपने निहित स्वार्थ में पर्यावरण को बर्बाद करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी जाती। इसलिए सिद्धांत की जगह हमें व्यावहारिक रूप से पर्यावरण पर सोचने की जरूरत है।

ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने के वैकल्पिक स्रोतों को हर हाल में जितनी भी जल्दी हो, बड़े स्तर पर अमल में लाने की जरूरत है। बिना इसके बात नहीं बनने वाली है। जानी मानी शोध पत्रिका ‘प्रोसीडिंग्स आॅफ रॉयल सोसायटी’ और स्विस वैज्ञानिकों के मुताबिक बिजलीघरों, फैक्ट्रियों और वाहनों में जीवाश्म र्इंधनों के जलाने से पैदा होने वाली ग्रीन हाउस गैसें ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार हैं। भारत में भी जलवायु परिवर्तन का असर पूरी तरह से दिखाई पड़ रहा है। सर्दी, गर्मी और बारिश की बढ़ती प्रचंडता ही नहीं, बल्कि बेमौसम बरसात का लगातार बढ़ते जाना, इस बात के सबूत हैं कि खतरे की घंटी बज चुकी है। पिछले साल राजधानी दिल्ली में बेमौसम बारिश साठ फीसद हुई, जिससे कई तरह की समस्याएं पैदा हुर्इं। ऐसे में यह चिंता होना लाजिमी है कि आने वाले वक्त में जलवायु परिवर्तन कहीं बड़े स्तर पर तो अपना असर नहीं डालेगा।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार जलवायु परिवर्तन का असर न केवल सेहत पर विपरीत असर डाल रहा है, बल्कि प्रमुख खाद्य उत्पादों और फलों की पैदावारपर भी इसका असर देखा जा रहा है। पिछले साल अप्रैल से दिसंबर तक दो लाख हेक्टेयर से अधिक फसल की बर्बादी हुई। इससे वैज्ञानिकों की चेतावनी सच साबित हो रही है कि ऋतु चक्र में आया बदलाव कई समस्याओं को जन्म देने वाला होगा। अंतरराष्ट्रीय कृषि अनुसंधान सलाहकार समूह के मुताबिक 2050 तक भारत में सूखे के कारण गेहंू की पैदावार में पचास फीसद की कमी आएगी। इस कारण बीस करोड़ लोग भुखमरी के शिकार होंगे। कार्बन डाइआॅक्साइड का संकेद्रण कई प्रतिशत बढ़ जाने के कारण ऋतु चक्र में बेतहाशा बदलाव आएगा जिससे हाइपोथर्मिया, दिल और सांस की बीमारियां तेजी से बढ़ेंगी। धरती का तापमान बढ़ने से डेंगू, मलेरिया और पीला बुखार जैसी घातक बीमरियों के कीटाणु वायुमंडल में तेजी के साथ पनप सकते हैं और करोड़ों लोगों को अपनी चपेट में ले सकते हैं।

समस्या एक स्तर पर नहीं है और न अकेला भारत इसका समाधान कर सकता है। इसके बावजूद हमें अपनी हिफाजत के लिए कदम उठाने होंगे। अभी तक जितने भी प्रयास इस बाबत हुए हैं, वे नाकाफी हैं। हमारी सरकारों के सामने समस्या विकट है कि न तो विकास के पश्चिमी मॉडल को छोड़ सकते हैं जहां पर्यावरण और विकास दो अलग-अलग चीजें समझी जाती हैं और न गांधी के स्वदेशी मॉडल को अपनाने के लिए हम आगे बढ़ने के लिए तैयार हैं। ऐसे में जो समाधान हो सकता है, उसे हमें अमल में लाना ही होगा। जहां गांधी के स्वदेशी मॉडल को विकास का आधार बना सकें, वहां उसे बिना किसी हिचकिचाहट के अपना लेना चाहिए और जहां पश्चिमी मॉडल के बगैर काम नहीं चले, वहां उसे भारतीय जलवायु और समाज के अनुरूप बना कर आगे बढ़ाते रहना चाहिए। समाधान की यह दिशा पर्यावरण की समस्या की एक समझ वाली दिशा हो सकती है।

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