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वाजदा खान की कविताएं : वक्त का वजूद

सुर्ख चाहतों की जादुई दुनिया में, अंतिम तल पर उगे, मेरे अजीज रौशन रंगो, क्या शीर्षक दूं तुम्हें, धड़कनों पर लय के साथ, फैल रहे हो, उदास खयालों के दुनियावी

Author नई दिल्ली | July 24, 2016 1:12 AM
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वक्त का वजूद

सुर्ख चाहतों की जादुई दुनिया में
अंतिम तल पर उगे
मेरे अजीज रौशन रंगो
क्या शीर्षक दूं तुम्हें
धड़कनों पर लय के साथ
फैल रहे हो
उदास खयालों के दुनियावी
कैनवस पर
सुनहरे ख्वाबों के साथ
चित्रित हो रहे हो
दहक रहे हो कपोलों पर
चमक रहे हो पलकों पर
खिल रहे हो अपने समूचे
अस्तित्व के साथ
मेरे भीतर उगी नई सृष्टि की
सूक्ष्म कोमल पंखुड़ियों में


क्या शीर्षक दूं तुम्हें

मेरे अजीज रोशन रंगो
बेखबर बिखरी पड़ी रूमानियत को
समेट रहे हो तुम अपने भीतर
एक एक रंग से रची जा रही हैं
काली रातों में भटकती हिरणी
इच्छाओं की संजीदा शबीहें
सज गई कायनात की दरो-दीवारों पर

नजर उठाई तो शोख रंगतों के नायाब
बिंब बेहद सादगी से उतर गए गहरे कहीं
अपरिवर्तनीय काल क्रम में

डरती हूं तब्दील न हो जाऊं कहीं
रंग-ए-दीवानगी से भरी तस्वीर में
समझ नहीं पाऊंगी फिर
बेहद गहरे और खामोश आकाश के
तमाम दृश्यात्मक और अदृश्य
सृजनात्मक जज्बातों का अर्थ

वे बदलने लगे हैं अब
वक्त के साथ कुछ कुछ
अपना दुनियावी अर्थ
क्योंकि तुम्हारी अनंतकाल से रूखी दुनिया में
वक्त के वजूद का
कोई रंग ही नहीं।


थोड़ा-सा करार

बस थोड़ी-सी राहत
बहुत थोड़ी-सी नमी
थोड़ा-सा करार
बहुत बेजा न था मेरा इस तरह
तुम्हारे सामने बैठ कर सोचना

कितना कुछ सामान्य दिखता है
दिन के पार
पर जब अंधेरा उतरता है
निर्जनता के निस्संग पलों में
आंखें अख्तियार करती हैं गीलापन

गूंजती वक्त की अनहद पुकार
सन्नाटे में चमकती अधैर्य की रेखा
कुछ पल के लिए

मापतौल के पल
जेहन में फड़फड़ाती बेचैनियां
विवेक से कोसों दूर

आखिर कितनी काट-छांट
कितनी धीरता
धरती की उपमा से भी बड़ी
कोई उपमा है क्या
खैर…।

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