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कौशल पंवार की कहानी : जोहड़ी

सण किनारे से थोड़ा हट कर गहरे गारे में दबा हुआ था। उसको बाहर खींच कर लाना था। बतेरी भी सभी मजदूरों की तरह अपने कपड़ों को दबोचते हुए पानी के अंदर चली गई थी।

Author नई दिल्ली | July 24, 2016 1:01 AM
उसकी समझ में कुछ नहीं आया। अपनी पूरी ताकत लगा कर उसने अपने आपको छुड़ाने की कोशिश की। लेकिन नाकाम रही।

बतेरी के गांव के चारों और र्इंट के विशालकाय भट्ठे थे। गरमी में जब लू चलती, तो ये भट्ठे आग में घी का काम करते। शायद यही कारण था कि लू लगने से मक्खी-मच्छरों का सफाया हो जाता था। इसलिए बतेरी ने कभी शाम को मच्छरों का जमावड़ा अपने घर के आसपास नहीं देखा था। गांव के बुजुर्ग बताते कि जब तक यह जोहड़ी वाला बाबा जिंदा रहेगा, तब तक इस गांव में मच्छर पैदा नहीं होंगे, क्योंकि बाबा ने इन मच्छरों को बांध रखा है। यह भी कि गांव में कोई बड़ी बीमारी नहीं फैलेगी। बाबा से पहले गांव में कैतक की बीमारी (प्लेग) फैल चुकी थी, जो उचित इलाज न मिलने के कारण बहुत से लोगों की जिंदगियां लील चुकी थी। इस बीमारी से लड़ने के लिए लोगों ने बाबा को अपने गांव में बुलाया था। बाबा ने पूरे गांव को अपनी तंत्र विद्या से बांध दिया था, ऐसा लोगों का विश्वास बना हुआ था। इसलिए बतेरी भी इसे ही सच मानती थी।

गांव की हर जाति की औरत जोहड़ी वाले बाबा की पूजा करती थी। बतेरी का परिवार अछूत होने के कारण बाबा के दर्शन दूर से ही कर सकता था। बाबा झोपड़ी के बाहर निकल कर प्रसाद ले लिया करते और मोरपंख का झाड़ू उनके सिर पर फेर कर आशिष दे देते। फिर उस झाड़ू को झाड़ देते थे, ताकि उससे दूसरी महिलाएं भींट (स्पर्श से अछूत) न जाएं। कई सवर्ण महिलाएं जो निस्संतान थीं, बाबा की भभूत लेती थीं और घंटों बेहोश होकर बाबा की झोपड़ी में पड़ी रहती थीं। जिसे भरी दोपहरी में जोहड़ी के आसपास खेलते नंग-धड़ंग बच्चे देखा करते। वे सब प्रसाद लेने की उम्मीद से ताकते रहते कि कब पुजारिन झोपड़ी से बाहर आए और प्रसाद खाने को मिले। वे पीपल के पेड़ की पूजा ब्राह्मणों का देवता मान कर करती थीं। इसके पीछे भी यही मानसिकता काम करती। जबकि बतेरी के दादा बताते थे कि पीपल का पेड़ उनके देवता हैं और इन लोगों ने इस पेड़ पर भी अपना अधिकार कर लिया है, जिस पर जाने का भी अधिकार हमसे छिन गया है। बतेरी अपने दादा की बातें बड़े ध्यान से सुनती थी।

यह जोहड़ी बतेरी के घर के दक्षिण की ओर से गांव और भट्ठे के बीच पुल का काम करती थी। इसकी गहराई बीच में सबसे ज्यादा थी, इतनी की हाथी भी डूब जाए। इसके चारों और मिट्टी की बनी दीवारें ऐसी लगती थीं जैसे किसी रियासत के महाराज ने अपने रंगमहल में स्नानागार बनाया हो, ताकि स्नान करते वक्त कोई और न देख सके। प्रकृति का यह बतेरी के समाज को दिया अद्भुत उपहार था। इसकी दीवार की ओट उन जैसी महिलाओं के लिए शौचालय का काम करती थी। यह जगह उनके लिए चर्चा का केंद्र रहती थी, जहां आकर महिलाएं ढेरों बातें करतीं। अपने मन का गुबार निकालतीं, चुगलियां करतीं, एक-दूसरे को छेड़तीं, गालियां देतीं, अपने सुख-दुख साझा करतीं।

किशोर लड़कियां अपनी सहेलियों के साथ अपनी इच्छाएं-भावनाएं बांटने के लिए यहां का बहाना कर घंटों बतियातीं। बतेरी तो पोपी, भुनती, गोमी, गुड्डी आदि सहेलियों को लेकर दोपहर में भी वहीं जमी रहती। दरअस्ल, किशोर लड़कियां अपने मां-बाप के सामने बातें नहीं कर पाती थीं। घर में एकांत नहीं मिलता था। जोहड़ी इन सबके लिए सबसे उपयुक्त स्थान होता था। कई बार उसकी सहेलियां दोपहर को जोहड़ी पर जाने से मना करती थीं, भूत-प्रेत के डर से, तब बतेरी निडर होकर कहती- ‘ए तो जाण-बूझ कै बणाया गया डकोसला है, कोई भूत-भूत नी औंदा, बल्कि या तो उन करसाणा (राजपूत) नै चाल चल्या राखी है, ताकि वै ओड़े तास खेल सकै, जुआ खेल सकै, शराब और उस बाबा मोल्लड के साथ गांजा अफीम पी सकै, अपणे जांदे सारे खिसक ले हैं, बता उनका ओठे कै काम।’ सबने उसकी हां में हां मिलाई।

गरमी के मौसम में जब गर्म हवाएं चलतीं और र्इंट भट्ठों से उठने वाला धुंआ गांव को तपाने लगता तो यह जोहड़ी गांव वालों को ठंडक देती। जोहड़ी का पानी ठंडा रहता था, चारों ओर खड़े पेड़-पौधों के कारण। कीकर, नीम, बेरी, झाड़ियां आदि इसके लिए छाते का काम करती थीं, मानो सूरज की तेज किरणों से इसके पानी को बचा रही हों। सभी दोपहर को इसमें नहाते और तैरते। छोटे-छोटे बच्चे झाड़ियों में लुका-छुपी खेलते, तो कभी पानी की ओर झुकी टहनियों को पकड़ कर झूलते या फिर उन पर चढ़ कर पानी में छलांग लगाते।

पर जाति-व्यवस्था कहां पीछा छोड़ने वाला था। जब गांव में हर चीज बंटी हुई तो जोहड़ी का पानी कैसे बच सकता था? जोहड़ी के एक तरफ राजपूतों के घर थे और दूसरी तरफ दलितों के। पहले तो कोई दलित जोहड़ी में जाने की हिम्मत ही नहीं करता था, लेकिन धीरे-धीरे समय के साथ कुछ बदलाव आया। छिटपुट दलितों के बच्चे स्कूल का रुख करने लगे थे। मां-बाप के समझाने के बावजूद बालक उसमें नहाने और खेलने निकल जाते थे। उस घोषित डोल (दीवार) को लांगने लगे थे। कई बार कलह का कारण भी बन चुकी थी यह जोहड़ी। इसलिए गांव के लोगों ने पंचायत में फैसला किया था कि कोई भी दलित इस पानी को छुएगा। लेकिन बच्चे कहां मानने वाले थे। बतेरी और उसकी पूरी जमात तो हर वक्त इस नियम को तोड़ने पर उतारू थी।

एक बार बतेरी अपनी उम्र के लड़के-लड़कियों के साथ जोहड़ी में उधम मचा रही थी। तभी दूसरी ओर के बच्चे भी नहाने के लिए आ धमके। फिर क्या था, सभी लाल-लाल दीदे निकाल कर देखने लगे इन बच्चों की ओर। उन्हें पानी से निकलने को कहने लगे यह कहते हुए कि पानी भींट गया… अब हम इसमें कैसे नहाएंगे? सभी दलित बच्चे मजाक-मजाक कहने लगे कि अब चूंकि पानी भींट गया, तो इसमें हम ही नहा लिया करेंगे…। यह बतेरी ने कहा था।

इतना सुनते ही कि हम ही नहाया करेंगे, उन बच्चों ने मिल कर गालियां निकालते हुए पानी में डुबोने लगे उसकी गर्दन पकड़ कर। बतेरी कि सांस फूलने लगी। सभी बच्चे डर कर रोने लगे। तभी भैंसों को नहलाने आ रहे एक सीरी (बंधुआ मजदूर) ने उनको आकर छुड़ाया और धमकाया कि मना करने के बाद भी तुम जमींदार राजकुवरों की बात क्यों नहीं मान रही थी। शाम तक यह बात घर वालों को पता लग चुकी थी। इसकी कीमत सभी को दोपहर में बाहर न निकलने के रूप में चुकानी पड़ी।

र्इंट भट्ठों के साथ ही गुगा मैड़ी का मंदिर था। उसके सामने खुला मैदान था, जिसमें भैंसें बैठती थीं। यह मैदान गोबर इकट्ठा करने के काम में लिया जाता था, जिससे उपले और भटोड़े बनते थे, जो शेरशाह सूरी के मार्ग पर बनाए गए गुंबदों के समान माइलस्टोन की तरह दूर से दिखते थे। बतेरी और उसकी सहेलियां गोबर बटोरने जाती थीं। भैसों के पीछे-पीछे दौड़तीं तसला लेकर। जब भी भैंस गोबर करती, वे झट से उठा लेतीं और जब तसला भर जाता तो उसे एक ढेर पर डालती जातीं। अच्छा-खासा गोबर का ढेर लगने के बाद वे उठा कर घर ले जातीं। उसे पाथतीं। धूप में सूखने के बाद उसके भटोड़े बनाए जाते, जो चमासे (बारिश) के मौसम में खाना बनाने, आंच करने के काम आते और कई बार आय का भी साधन बन जाते थे।

कई बार भैंसों के पीछे भागते-भागते उनमें टक्कर भी हो जाती। भैंसों का मालिक गालियां निकालता और कई बार तो लाठी भी चला देता। गांव में एक जमींदार के पास दर्जन भर बैल, भैंसें थीं। जब उसकी भैंसें निकलतीं तो कोई और अपनी भैंसों को पानी पिलाने नहीं निकलता था। दबदबा था पूरे गांव में उसका। किसी भी घर की बहू-बेटी निकलती तो जागीर समझ कर वह उसे छेड़ देता था। मारे शर्म के वह किसी को कुछ नहीं बता या कह पाती। बतेरी को उसका खौफ-सा था, डर लगता उसकी आंखों को देख कर। एक दिन जमींदार को उसने एक लड़की की बांह पकड़ते हुए देखा था। वह उसके अंगों को छेड़ रहा था और जैसे ही उसकी नजर बतेरी पर पड़ी तो वह डर कर भाग गई थी। यह सब उसने दूसरी सहेली को बताया था, पर उसने यह किसी और को बताने से मना कर दिया था। इसलिए जब भी उनकी भैंस निकलती तो वह अपना तसला लेकर मैड़ी के मैदान की ओर निकल जाती थी। जबकि सभी उसकी भैंसों का इंतजार करतीं, क्योंकि बहुत सारा गोबर मिल जाता, जिससे उनको ज्यादा देर तक नहीं खड़ा होना पड़ता था।

दोपहर को वे सभी जोहड़ी के किनारे आसपास बैठ जाती थीं। जोहड़ी के किनारे ही पीपल का पेड़ था, जिसके चारों ओर मिट्टी का चबूतरा बना हुआ था, जिस पर महिलाएं पूजा करके प्रसाद चढ़ाती थीं। हलुआ, पूरी, मिठाइयां और बताशे आदि। बतेरी उस प्रसाद को खाया करती थी, पर दूसरी लड़कियां बहुत डरती थीं प्रसाद खाने से। सबके मां-बाप ने बाहर का प्रसाद खाने से मना किया हुआ था। बतेरी सबको समझाती कि कुछ नहीं होता प्रसाद खाने से। जब सब देखतीं कि प्रसाद से उसको कुछ नहींं हुआ, तो बाकी बाद में खातीं। अब हर रोज का नियम बन गया था कि पहले प्रसाद बतेरी खाए, उसके बाद सब लड़कियां खाएं। धीरे-धीरे सब प्रसाद को होड़ लगा कर खाने लगीं।

अब बतेरी बड़ी हो गई थी। उसने गोबर बटोरना बंद कर दिया था। वह अपने मां-बाप के साथ सड़क पर बजरी आदि बिछाने की दिहाड़ी पर जाने लगी थी। कई बार पूरा परिवार काम पर जाता- भाई, मां, चाचा और खुद बतेरी भी। ऐसे में वह पहले घर पहुंचती और घर पर खाना बनाती, जिसमें दाल-रोटी, तो कभी खाली लाल मिर्च की चटनी होती थी। कभी-कभी वे भट्टे से र्इंटें निकालने का काम भी करते।

एक बार बतेरी और उसका छोटा भाई रामभेर काम पर गए। भट्टा, जिसकी आग दो दिन पहले ही ठंडी हुई थी, उसमें से पकी र्इंटें अलग करनी थी। गरम राख में से निकाल कर अलग ढेर बनाया जा रहा था। उसमें दो जनों को मिल कर काम करना होता था, एक भट्टे पर चढ़ कर र्इंटे निकालता, उन्हें नीचे फेंकता और दूसरा नीचे खड़े होकर पकड़ता और जमीन पर तह लगाता हुआ रखता जाता। अगर जरा-सा भी नीचे वाले का ध्यान इधर-उधर हुआ तो पकी र्इंट सीधा सिर पर और जान का खतरा। साथ ही घूरती हुई जमींदार की आंखें, ‘काम तेजी से होना चाहिए और कोई भी र्इंट जमीन पर गिर कर न टूटने पाए’ लगी रहती।

बतेरी और उसका भाई काम कर रहे थे। बतेरी जब भी जमींदार की तरफ देखती तो घबरा जाती, जिससे कई बार र्इंट उसके सिर पर लगते-लगते बची थी। भाई ने गुस्से से उसकी ओर देखा था। क्या कहे बेचारी उसको? बतेरी को काम करते हुए ऐसा लगता रहा कि जैसे किसी की आंखें उसी की ओर हैं। उसे घबराहट-सी हो रही थी। भाई से कहा कि वह पानी पीने जा रही है। वह पीपे की ओर बढ़ी, पर जमींदार उसकी ओर पानी का गिलास बढ़ा रहा था। वह उसे देखते ही उल्टे पांव वापस आ गई थी। जैसे-तैसे काम पूरा हुआ और वे सभी घर लौट आए।

शाम की रोटी जमींदार के घर से मिलनी थी। अपने घर जाकर हाथ-मुंह धोकर सभी उसके घर रोटी खाने जाने वाले थे, पर बतेरी ने जाने से मना कर दिया। अजीब-सी बैचेनी महसूस कर रही थी वह। मानो जमींदार की आंखें उसे अंदर तक भेद रही थीं। घर पर भी उसकी आंखें उसका पीछा करती रही थीं। बतेरी के गांव के बड़े जमींदार सण की खेती करते थे, जिससे बहुत पैसा कमाया जाता था। सण से जूट का सामान बनता था और चारपाई, पीढ़ा आदि उसी से भरे जाते थे। इसकी पैदावार बहुत महंगी होती थी और ज्यादा मजदूरों की देख-रेख की जरूरत पड़ती थी। कच्चे सण को काटना बहुत मेहनत का काम होता। ऊपर से दिहाड़ी सिर्फ चालीस से पैंतालीस रुपए और दो समय की चाय। गरमी के मौसम में इसकी कटाई और मुश्किल होती थी। कांटेदार होने के कारण कपड़ों को भी फाड़ देती थी। इसके कांटे शरीर में सूल की तरह चुभते थे।

कटे सण को खेत से लाकर गारे में दबाया जाता, जो महीने भर दबा रहता। इन सबके बदले मजदूर को महीनों लटका कर दिहाड़ी के पैसे मिलते और बड़ी-बड़ी गालियां मिलतीं, जो बिना कारण के, कई बार तो मजाक-मजाक में भी गालियां ही मिलतीं, जो मां या बहन से जुड़ी होतीं। जब उस जमींदार का सण गल गया तो निकालने के लिए मजदूरों की जरूरत थी। उसका सीरी (बंधुआ मजदूर) बतेरी के मोहल्ले में आकर बोल गया कि कल काम पर आना है। इसकी दिहाड़ी तीस रुपए थी और उसकी लकड़ी भी उन्हें ही मिलती थी। बतेरी भी काम करने आ गई थी।

सण किनारे से थोड़ा हट कर गहरे गारे में दबा हुआ था। उसको बाहर खींच कर लाना था। बतेरी भी सभी मजदूरों की तरह अपने कपड़ों को दबोचते हुए पानी के अंदर चली गई थी। सण के गट्ठर को दम लगा कर खींच रही थी। उसने इसको पानी में डुबकी लगा कर झाड़ा ताकि गारा अलग हो जाए। जैसे-तैसे बतेरी ने खींच कर लाए गट्ठर को पानी में दो-तीन बार डुबोया था। गारा अच्छी तरह झड़ा नहीं था, तो बतेरी ने सोचा कि एक बार और पानी में डुबो दंू ताकि मिट्टी अलग हो जाए। जब उसने दोबारा ऐसा किया और उसे हाथों में लेकर ऊपर की ओर उठा कर पानी में डाला तो गट्ठर पानी के बोझ के कारण उसके हाथों से छूट गया और जोर से छपाक की आवाज करता हुआ पानी में गिर गया। पानी ऊपर उठा और किनारे के लोगों को भिगो गया। पास में ही जमींदार उसे घूर रहा था कि छपाक से गंदला पानी उस पर पड़ा। वह जोर से चिल्लाया और गालियां देता हुआ बतेरी की ओर बढ़ा। उसकी बांह पकड़ कर उसे दबोच लिया।

बतेरी इससे बेफिकर थी कि वह ऐसा करेगा। उसकी समझ में कुछ नहीं आया। अपनी पूरी ताकत लगा कर उसने अपने आपको छुड़ाने की कोशिश की। लेकिन नाकाम रही। थोड़ा-सी कमजोर पकड़ हुई तो बतेरी ने दूसरे हाथ से जोरदार तमाचा जमींदार के मुंह पर रसीद कर दिया। चटाक की आवाज सुन कर सभी का ध्यान उनकी ओर गया। सबने सोचा कि बतेरी के मुंह पर जमींदार ने तमाचा मारा है। अंदर से बड़ी कुलबुलाहट महसूस की थी सभी ने और धीरे-धीरे सभी मजदूर बतेरी के चारों ओर आकर खड़े हो गए। लेकिन जमींदार दोनों हाथों से अपना मुंह ढके हुए था।

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