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राजनीतिः काल की कसौटी पर आइंस्टीन

सन 1919 में सूर्य ग्रहण की घटना से आइंस्टीन ने अपने प्रकाश संबंधी सिद्धांत को साबित कर दिया और लंदन टाइम्स ने सात नवंबर, 1919 को लिखा कि न्यूटन का सदियों पुराना सिद्धांत गलत साबित हो गया। पर इतनी प्रसिद्धि और नोबल पुरस्कार जर्मनों के गले नहीं उतरा और उससे पूर्व ही जब 1920 में आइंस्टीन बर्लिन में व्याख्यान देने आए तो उनके विरोध में भारी प्रदर्शन हुए। यहूदी-विरोधी भावनाएं भड़कने लगीं। उनका जर्मन न होना उनकी निंदा का कारण था।

अल्बर्ट आइंस्टीन का जन्म 14 मार्च 1879 को जर्मनी के उल्म नगर में एक साधारण यहूदी परिवार में हुआ था।

निरंकार सिंह

करीब सौ साल पहले अल्बर्ट आइंस्टीन ने अपने सबसे चर्चित सापेक्षिता के सिद्धांत की जो परिकल्पना प्रस्तुत की थी, आज भी वह बिल्कुल सही साबित हो रही है। कई प्रयोगों से उनके सिद्धांतों की पुष्टि हो रही है। दरअसल गैलीलियो, युक्लिड और न्यूटन जैसे वैज्ञानिकों ने पृथ्वी, आकाश और गुरुत्वाकर्षण आदि के विषय में जिस अनुसंधान का आरंभ और संवर्धन किया था और भौतिक विज्ञान में जिस जड़तावाद को जन्म दिया, उसके मूलाधार गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत पर 1921 में अल्बर्ट आइंस्टीन के अमेरिका के प्रिंस्टन में दिए गए चार व्याख्यानों ने उथल-पुथल मचा दी थी। उनके सापेक्षिता के सिद्धांत ने भौतिकी में क्रांति ला दी। अंतरिक्ष और काल के बारे में हमारे जो विश्वास थे, उनमें मौलिक परिवर्तन हो गए। आइंस्टीन की दृष्टि से हमें अंतरिक्ष और ब्रह्मांड के बारे में अपनी परिकल्पनाओं को इतनी दूर तक ले जाना पड़ा, जिसकी पिछले जमाने में कोई मिसाल नहीं मिलती।

अल्बर्ट आइंस्टीन का जन्म 14 मार्च 1879 को जर्मनी के उल्म नगर में एक साधारण यहूदी परिवार में हुआ था। उनके पिता हरमन आइंस्टीन और चाचा जैकब आइंस्टीन ने देखा कि उनका खेलकूद, बाल सुलभ शैतानियों में मन नहीं लगता था। स्कूल का अनुशासित माहौल भी उन्हें अच्छा नहीं लगता था। पर उनके चाचा ने अल्बर्ट को गणित इस तरह पढ़ाना शुरू किया कि बीजगणित और रेखा गणित में उनकी दिलचस्पी बढ़ती चली गई। अब गणित उन्हें प्रिय लगने लगा। खिलौने में उनकी कोई रुचि नहीं थी। लेकिन जब उनके पिता ने उन्हें एक कंपास (दिशादर्शक) लाकर दिया तो उन्हें यह बहुत पसंद आया। कंपास की सुई सदैव उत्तर दक्षिण रहती थी। यह देख कर वे बहुत आश्चर्य में पड़ गए। इसने उनके जीवन की दिशा बदलने में बड़ी भूमिका निभाई। अल्बर्ट की मां को संगीत का अच्छा ज्ञान था और वे उन्हें संगीत सिखाने लगीं। इसलिए गणित और संगीत उनके दो प्रिय विषय बन गए।

सन् 1902 में आइंस्टीन को यंत्र बनाने वाली एक स्विस कंपनी में नौकरी मिल गई। इस दौरान उन्हें अपना शोध करने का पूरा मौका मिला। 1908 में उन्हें बर्न विश्वविद्यालय में लेक्चरर के रूप में नियुक्ति मिली। 1912 में आइंस्टीन ने गुरुत्वाकर्षण पर काम किया। 1912 में वे ज्यूरिख लौट आए और उन्हें वहां के पॉलीटेक्निक में नियुक्ति मिली। इसके बाद अप्रैल 1914 में वे बर्लिन आ गए और वहां उन्हें बतौर प्रोफेसर नियुक्ति मिली, पर पढ़ाने के दायित्व से उन्हें मुक्ति मिल गई। इससे उन्हें अपना शोध करने का पूरा मौका मिला। 1921 में नोबल पुरस्कार की घोषणा हुई। इससे पूर्व 1915 में उन्होंने सापेक्षता के सिद्धांत पर नई जानकारियां प्रकाशित की थीं। सन 1919 में सूर्य ग्रहण की घटना से आइंस्टीन ने अपने प्रकाश संबंधी सिद्धांत को साबित कर दिया और लंदन टाइम्स ने सात नवंबर, 1919 को लिखा कि न्यूटन का सदियों पुराना सिद्धांत गलत साबित हो गया। पर इतनी प्रसिद्धि और नोबल पुरस्कार जर्मनों के गले नहीं उतरा और उससे पूर्व ही जब 1920 में आइंस्टीन बर्लिन में व्याख्यान देने आए तो उनके विरोध में भारी प्रदर्शन हुए। यहूदी-विरोधी भावनाएं भड़कने लगीं। उनका जर्मन न होना उनकी निंदा का कारण था। पर आइंस्टीन अपने विचारों से हिले नहीं। 1921 में वे पहली बार अमेरिका गए। उनका उद्देश्य अपने वतन अर्थात भावी इजरायल में हिब्रू विश्वविद्यालय के लिए धन एकत्रित करना था। वहां उनका भारी स्वागत हुआ। वे जगह-जगह व्याख्यान देते हुए आगे बढ़ते चले गए। उन्हें दूसरे देशों में भी आमंत्रित किया गया। उन्होंने यूरोप के हर देश की राजधानी में भाषण दिए। वे एशियाई देशों, मध्यपूर्व देशों, लैटिन, अमेरिकी देशों में भी गए। उन्हें हर जगह सम्मान और प्यार मिला। वे श्रीलंका में रहने वाले हिंदुओं से भी खासे प्रभावित हुए। उन्हें जापानी अत्यंत बुद्धिमान और प्रतिभावान लगे। वे चीन भी गए। वे अपने काम में इस कदर मशगूल रहते थे कि जब दिसंबर, 1922 में नोबल पुरस्कार लेने के लिए उन्हें स्वीडन बुलाया गया तो वे पहुंच नहीं सके थे। 1923 में वे फिलस्तीन अवश्य गए। अपने अनोखे सिद्धांतों के लिए उन्हें अनेक पुरस्कारों, पदकों और सम्मानों से नवाजा गया। 1929 का वर्ष आइंस्टीन के लिए पचासवां वर्ष था। पर दूसरी ओर जर्मनी में यहूदियों के प्रति विरोध जोर पकड़ता चला गया। नाजीवाद के संरक्षण में यहूदियों को पकड़-पकड़ कर उन पर अत्याचार किए जा रहे थे।

सन् 1932 में वे फिर अमेरिका गए। इस बार उन्हें प्रिंस्टन विश्वविद्यालय में नियुक्ति मिली। उन पर काफी दबाव था कि वे अमेरिका या इंग्लैंड में बस जाएं। जर्मनी में समय-समय पर उनका बहुत अपमान भी हुआ था और यह बढ़ता जा रहा था। पर फिर भी उन्हें जर्मनी से प्यार था। उन्होंने तय किया कि वे पांच महीने प्रिंस्टन में रहेंगे और शेष सात महीने बर्लिन में रहेंगे। दिसंबर, 1932 में वे जर्मनी से अमेरिका के लिए रवाना हुए। इसी दौरान एडोल्फ हिटलर ने जर्मनी की सत्ता हथिया ली। इसके बाद आइंस्टीन ने जर्मनी वापस जाने का इरादा छोड़ दिया। 1935 तक आइंस्टीन ने अमेरिका को ही अपना ठिकाना बनाया था। उन्हीं दिनों डेनमार्क के परमाणु वैज्ञानिक नील्स बोहर ने आइंस्टीन को सूचना दी कि जर्मनी के भौतिक शास्त्री लीसे मैटनर ने यूरेनियम के परमाणु को तोड़ने में सफलता हासिल कर ली है। इससे पदार्थ की थोड़ी-सी मात्रा से बड़े पैमाने पर ऊर्जा पैदा की गई है। इसके अलावा बर्लिन से दो जर्मन रसायन शास्त्रियों आॅटो हान और फ्रिज स्ट्रासमैन ने भी इसी दिशा में प्रयोग किए हैं। बोहर को लगा कि अगर यूरेनियम के परमाणुओं को नियंत्रित रूप से तोड़ने में सफलता पा ली गई तो बहुत बड़ी तादात में ऊर्जा पैदा की जा सकेगी और हिटलर जैसा व्यक्ति उसका उपयोग महाविनाश के लिए कर डालेगा। आइंस्टीन इसके पीछे छिपी योजना ताड़ गए थे। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलीन रूजवेल्ट को सारी बातें समझार्इं। इसके बाद अमेरिका में भी मैनहट्टन परियोजना के नाम से वह शोध कार्य प्रारंभ हो गया। 1945 में जब उन्होंने प्रिंस्टन विश्वविद्यालय से अवकाश लिया, तब भी वे शोध कार्यों में भाग लेते रहे। वे अन्य वैज्ञानिकों को शांति प्रयासों के लिए लगातार प्रेरित भी करते रहे।

सापेक्षता सिद्धांत विकसित करने के बारे में अनेक किस्से मशहूर हैं। आइंस्टीन खुद भी इनके बारे में चटखारे ले-लेकर सुनाते थे। उनकी पत्नी एल्सा भी इसमें पीछे नहीं रहती थीं। उन्होंने बताया कि एक बार वे गाउन पहने नाश्ते की टेबल पर आए, पर नाश्ते को हाथ तक नहीं लगाया। पत्नी ने समझा, शायद वे बीमार हैं। वे उनका हाल-चाल पूछने लगीं। आइंस्टीन अचानक बोल पड़े कि मुझे गजब का ख्याल सूझा है। वे काफी पीने लगे। काफी देर तक विचारों में खोए रहने के बाद वे वायलिन बजाने लगे। वायलिन बजाते-बजाते बीच में रुक जाते और कागज पर कुछ लिखने लगते और फिर वायलिन बजाते जाते थे। जब पत्नी उनसे पूछती कि क्या बात है तो वे बताते कि बड़ा अनोखा विचार आया है। पर बार-बार पूछने के बाद भी उन्होंने ब्योरा देने से इंकार कर दिया। वायलिन बजाना और बीच-बीच में लिखना काफी देर तक जारी रहा और फिर वे अपने अध्ययन कक्ष में चले गए। वे हफ्ते भर तक बाहर नहीं आए। खाना अंदर जाता रहा। कभी आधा तो कभी पूरा ही खाना वापस आ जाता था। सात दिन बाद जब वे वापस आये तो उनका चेहरा पीला पड़ चुका था, पर उस पर प्रसन्नता की लकीरें थीं। हाथ में दो कागज थे, जिनमें सापेक्षता का सिद्धांत लिखा था। उनके छात्र, मित्र, पत्रकार सभी उनसे पूछते थे कि जरा सापेक्षता का सिद्धांत सरलतम भाषा में समझाइए। एक बार उन्होंने वास्तव में समझा दिया। उन्होंने कहा कि अगर आपका मित्र या कोई प्रिय व्यक्ति आपके पास एक घंटा बैठे तो भी आपको लगेगा कि अभी चंद मिनट ही हुए हैं। जबकि कोई अप्रिय व्यक्ति पांच मिनट भी बैठे तो लगेगा घंटों हो गए। यही सापेक्षिता का सिद्धांत है।

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