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राजनीति: महिला सशक्तिकरण और समाज

आजादी के सात दशक बीत जाने के बाद जिस तरह हमारे देश में शिक्षा, स्वास्थ्य, औद्योगीकरण, रोजगार, नगरीकरण के क्षेत्र में वृद्धि होने के साथ ही समाज में सामाजिक-राजनीतिक चेतना विकसित हो रही है, उसके सापेक्ष महिलाओं की स्थिति उतनी संतोषप्रद नहीं दिखाई देती। हालांकि कुछ दशकों से हमारे देश में महिलाओं की शैक्षिक स्थिति में सुधार आया है, लेकिन फिर भी साक्षरता का फीसद पुरुषों की तुलना में कम ही है।

Author Published on: November 1, 2019 1:59 AM
महिला सशक्तिकरण व विकास का प्रबल आधार बनाया जा सकता है।

चंद्रशेखर तिवारी

भारतीय संस्कृति में नारी को सम्मानजनक स्थान देने की परंपरा प्राचीन काल से चली आई है। हमारे वैदिक शास्त्रों में कहा गया है- ‘यत्र नार्यस्तु पूजयंते, रमयंते तत्र देवता’। हिंदू सनातन धर्म में मां दुर्गा को जगत का पालन करने, उसका कल्याण करने और दुष्टों का संहार करने की अधिष्ठात्री देवी माना गया है। गार्गी, सावित्री, सीता, कौशल्या और कुंती जैसी अनेक विदुषी नारियों के व्यक्तित्व, त्याग और साहस की गाथाएं आज भी हमारे समाज में प्रचलित हैं। भारतीय समाज के विभिन्न कालखंडों पर यदि नजर डालें तो पाते हैं कि वैदिक काल में महिलाओं को कुटुंब समाज में पर्याप्त सम्मान प्राप्त था। तत्कालीन समाज में यह धारणा विद्यमान थी कि नारी के बगैर पुरुष को धर्म, कर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती। उत्तर वैदिक काल आने तक महिलाओं की इस उन्नत स्थिति में आंशिक गिरावट आने लगी। सामाजिक स्तर पर उन पर कुछ पाबंदियां लगाई जाने लगीं। इसी दौर में बाल विवाह की परंपरा भी शुरू हो गई थी। हालांकि उस समय महिलाओं की स्थिति ज्यादा शोचनीय नहीं थी। वैदिक युग के बाद ग्यारहवीं सदी के पूवार्द्ध तक नारियों की स्थिति धीरे-धीरे कमजोर होने लगी।

मध्यकालीन युग में नारियों की दशा दयनीय स्थिति में पहुंच चुकी थी। समाज में पर्दा प्रथा शुरू हो गई थी। महिलाओं की आर्थिक पराधीनता, कुलीन विवाह प्रथा और अशिक्षा आदि के कारण समाज में उनकी स्थिति शोचनीय स्तर पर पहुंचने लगी। वर्तमान की अगर बात करें तो महिलाओं की स्थिति को स्वतंत्रता से पूर्व और स्वतंत्रता के बाद अलग-अलग काल खंडों में देखा जा सकता है। स्वतंत्रता से पूर्व महिलाएं कई तरह की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूढ़ियों में जी रही थीं। इसके पीछे अशिक्षा, आर्थिक पराधीनता, संयुक्त परिवार प्रणाली, बहुपत्नी प्रथा और दहेज जैसी कुप्रथाएं जिम्मेदार रहीं। ब्रिटिश शासन के दौर से महिलाओं की स्थिति में मामूली बदलाव शुरू होने लगा था। उन्नीसवीं सदी में राजा राममोहन राय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, ऐनी बेसेंट और महात्मा गांधी जैसे समाज सुधारकों ने महिलाओं को समाज की मुख्यधारा में लाने की पहल की और उनके उत्थान के लिए तमाम काम किए।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में महिलाओं की स्थिति, विकास और उनके सशक्तिकरण का सवाल अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। आजादी के सात दशक बीत जाने के बाद जिस तरह हमारे देश में शिक्षा, स्वास्थ्य, औद्योगीकरण, रोजगार, नगरीकरण के क्षेत्र में वृद्धि होने के साथ ही समाज में सामाजिक-राजनीतिक चेतना विकसित हो रही है, उसके सापेक्ष महिलाओं की स्थिति उतनी संतोषप्रद नहीं दिखाई देती। हालांकि कुछ दशकों से हमारे देश में महिलाओं की शैक्षिक स्थिति में सुधार आया है, लेकिन फिर भी साक्षरता का फीसद पुरुषों की तुलना में कम ही है। वर्ष 2001 की जनगणना के आधार पर देश की कुल साक्षरता दर 64.4 फीसद आंकी गई थी, इसमें पुरुषों की साक्षरता दर 75.85 फीसद और महिलाओं की साक्षरता दर 54.16 फीसद थी। इससे पूर्व 1991 में पुरुषों की साक्षरता 64.13 और महिलाओं की साक्षरता मात्र 39.29 फीसद ही थी।

जबकि 2011 की जनगणना के अनुसार कुल साक्षरता दर 74.0 फीसद है, जिसमें पुरुषों की साक्षरता दर 82.1 फीसद और महिलाओं की साक्षरता दर बढ़ कर 65.5 फीसद हो गई है। इन आकड़ों से साफ पता चला है कि पिछले दो दशकों में महिलाओं की शिक्षा में संतोषजनक सुधार आया है। हमारे देश में महिलाओं की साक्षरता नगरीय क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत कम है। शिक्षित नहीं होने के कारण ही महिलाएं पुरुषों परआश्रित रहती हैं या अन्य निम्न स्तर और अथक परिश्रम वाले कामों को करने के लिए मजबूर होती हैं।

विशाल जनसंख्या के सापेक्ष हमारे भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति अच्छी नहीं है। ग्रामीण, दुर्गम और पर्वतीय इलाकों में प्रसव की समुचित स्वास्थ्य सुविधा न मिलने से कई प्रसूता महिलाओं की मौत तक हो जाती है। इसके अलावा असमान लिंग अनुपात, महिला मृत्यु दर ज्यादा होना, कुपोषण और महिलाओं में बीमारियों की अधिकता जैसे कई सवाल महिलाओं के जीवन को प्रभावित करते हैं। हमारे देश में खेती, उद्योग, खनन और अन्य से जुड़े कार्यों में महिलाओं को पुरुषों की अपेक्षा बेहद कम पारिश्रमिक मिलता है। बड़ी विडंबना है कि महिलाएं जो अपने घर-परिवार में खेती-बाड़ी, पशुपालन और अन्य घरेलू कामों में दिन-रात लगी रहती हैं, उनके इस परिश्रम की कोई भी कीमत नहीं आंकी जाती और न ही उन्हें इस काम का यथेष्ट श्रेय मिलता है।

महिला सशक्तिकरण में समाज की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण है। देश की समग्र प्रगति तब तक नहीं हो सकती, जब तक उस देश की राजनीति से लेकर शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में वहां की महिलाएं सशक्त बन कर न उभरी हों। तमाम प्रभावी नीतियों और योजनाओं के बावजूद हकीकत यह है कि महिलाएं व्यावहारिकता में अब भी तरह-तरह की सामाजिक और आर्थिक समस्याओं से जूझ रही हैं। निश्चित तौर पर यह मानना होगा कि जब तक परिवार और समाज सकारात्मक सोच के साथ आगे नहीं बढ़ेगा, तब तक महिलाओं के विकास और सशक्तिकरण की बातें करना महज एक कल्पना ही होगी।

समाज में प्रत्येक पुरुष और महिला को संविधान द्वारा समान तौर पर समस्त मूलभूत अधिकार दिए गए हैं, लेकिन फिर भी किसी न किसी रूप में सामाजिक रूढ़िवादी मान्यताओं और विषमताओं के कारण महिलाएं अपने अधिकारों से वंचित रह जाती हैं। अत: इस महत्त्वपूर्ण मुद्दे के समाधान की दिशा में हमारे देश में स्थित कई गैर सरकारी और स्वैच्छिक संस्थाएं, लिंग विभेद और महिलाओं से जुड़ी अन्य समस्याओं को दूर करने के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से सहयोग लेकर अपने स्तर पर प्रयास कर रही हैं।

मीडिया और संचार माध्यमों की भी महिला विकास में बड़ी भूमिका है जिसे महिला विकास और सशक्तिकरण के संदर्भ में भी उतना ही कारगर माना जा सकता है। यद्यपि भारत का महिला और बाल विकास विभाग महिलाआें के विकास के लिए सतत प्रयत्नशील रहा है और अन्य सरकारी व गैर सरकारी संस्थाएं भी अपने स्तर पर कार्य कर रही हैं, लेकिन इधर कुछ वर्षों में देखने में आया है कि मीडिया और संचार माध्यम इस दिशा में सक्रिय हुए हैं और उनका सकारात्मक परिणाम सामने आने लगा है। दिल्ली के निर्भया कांड के बाद उसे राष्ट्रीय फलक पर प्रमुख मुद्दा बनाने में जो सराहनीय भूमिका मीडिया और अन्य संचार साधनों ने निभाई, वह निश्चित ही प्रशंसनीय रही। समाचारपत्रों और टीवी के माध्यम से प्रसारित खबरों और योजनाओं की जानकारी अथवा विज्ञापनों का भी व्यापक प्रभाव महिला वर्ग पर पड़ा है। महिला सशक्तिकरण और विकास, बालिका शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा व महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी योजनाओं और उनसे जुड़ी समस्याओं पर दूरदर्शन, आकाशवाणी सहित तमाम अन्य चैनल कार्यक्रम प्रसारित कर इस संदर्भ में अच्छा प्रयास कर रहे हैं।

यहां पर यह बात भी ध्यान में रखनी होगी कि कुछ निजी चैनलों में प्रसारित होने वाले कतिपय धारावाहिक कार्यक्रमों में महिलाओं के चरित्र, व्यक्तित्व और पारिवारिक संबंधों को जिस काल्पनिक और विकृत रूपों में दिखाया जा रहा है, वह समाज को सकारात्मक सोच नहीं दे पा रहा है। यही बात विज्ञापनों के बारे में कही जा सकती है कि महिलाओं की सुंदरता और शरीर का उपयोग उपभोग की वस्तु के रूप में ही उपभोक्ताओं को आकर्षित करने में किया जाता है। विज्ञापन कंपनियों का उद्देश्य तो केवल वस्तुओं की बिक्री बढ़ाना होता है। इसलिए यहां सवाल यह उठता है कि क्या विज्ञापन कंपनियां अपनी तरफ से महिला सशक्तिकरण व विकास के लिए विज्ञापन नहीं बना सकतीं? सफल महिला उद्यमी के अनुभवों को साक्षात्कार, फीचर, आलेख व वृत्तचित्रों के जरिये समाज में जागृति लाने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया जा सकता है। इनके अलावा सिनेमा, नाटक, कठपुतली और नुक्कड़ नाटक जैसे दूसरे जनसंचार माध्यमों को भी महिला सशक्तिकरण व विकास का प्रबल आधार बनाया जा सकता है।

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