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राजनीति: पराली की तपिश में झुलसता किसान

पराली प्रबंधन की मशीनों को लेकर भी किसान संगठनों ने सरकार पर घपले के आरोप लगाए हैं।

Author Published on: November 21, 2019 1:57 AM
पराली की राजनीति में किसानों को खलनायक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही।

दिल्ली में प्रदूषण का स्तर इन दिनों घातक स्तर पर है। तमाम दावों के बीच पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं में कमी नहीं आ रही है। पंजाब में अक्तूबर महीने में पराली जलाने के लगभग तीस हजार और हरियाणा में चार हजार से ज्यादा मामले सामने आए। अभी भी यह सिलसिला जारी है। दिल्ली के प्रदूषण में पराली के धुएं से होने वाले प्रदूषण की भागीदारी लगभग चवालीस फीसद है, जबकि छप्पन फीसद दिल्ली का प्रदूषण दिल्ली से के स्थानीय कारणों से है। इसके बावजूद पराली की राजनीति में किसानों को खलनायक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही। हालांकि किसानों का दर्द कोई समझने को तैयार नहीं है।

दिल्ली सहित देश की तमाम शहरी आबादी के लिए अनाज का यही किसान पैदा करते हैं। फसलों का लागत मूल्य बढ़ने और कम कीमत मिलने से किसान परेशान हैं। दूसरी तरफ बढ़ते कर्ज के कारण किसान आत्महत्या कर रहे हैं। बदहाल आर्थिक स्थिति के कारण खेतों में पराली जलाना तो किसानों की मजबूरी है, क्योंकि पराली से निकलने वाला धुएं के प्रदूषण का पहला हमला दिल्ली पर नहीं, बल्कि उस किसान के परिवार पर ही होता है जिसके खेत में पराली जलती है। लेकिन उसकी मजबूरी है कि वह इसे जलाए नहीं तो क्या करे?

खेतों में पराली जलाने के पीछे उसकी मजबूरी को समझने को कोई तैयार नहीं है। एक सच्चाई यह है कि धान की कटाई हाथ से करने लिए अब किसानों को मजदूर नहीं मिलते। हाथ से पराली की कटाई काफी महंगी पड़ती है। पराली में इतना ज्यादा कीटनाशाक होता है कि किसान इसे हाथ से कटवाना नहीं चाहते, क्योंकि बाद में इसे चारे के तौर पर जानवरों को खिलाना खतरनाक होगा। इसलिए पंजाब और हरियाणा के किसान सबसे आसान रास्ता इसे जलाने का चुनते हैं। हालांकि एक राय यह भी है कि पंजाब सरकार ने 2009 में जो जल संरक्षण कानून बनाया था, वह भी पराली जलाने की घटनाओं को बढ़ाने के लिए जिम्मेवार है।

इस अधिनियम के मुताबिक धान के पौधों को खेतों में दस जून से पहले नहीं लगाया जा सकता। दरअसल इस तरह का कानून बनाना राज्य सरकार की मजबूरी थी। दरअसल पंजाब के किसान मई महीने में ही धान के पौधे खेतों में रोप देते थे। इससे भारी भूजल का दोहन होता था। राज्य में लगभग पंद्रह लाख ट्यूबेल हैं। साल 2009 से पहले मई की भीषण गर्मी में इन टयूबेलों से धान की खेती के लिए भारी भूजल का दोहन होता था। इससे हालात इतने खराब हुए कि आज राज्य के राज्य के एक सौ अड़तीस ब्लाकों में से एक सौ दस ब्लॉक डार्क जोन में चले गए हैं।

पंजाब में अभी भी तिहत्तर फीसद खेती सिंचाई के लिए भूजल पर निर्भर है। इसलिए राज्य सरकार ने धान का पौधा खेतों में लगाए जाने का समय जून महीने में तय किया, क्योंकि जुलाई में मानसून आने की संभावना रहती है। गौरतलब है कि एक किलो चावल पैदावार के लिए लगभग पांच हजार लीटर जल की खपत होती है। राज्य सरकार के जल संरक्षण को लेकर लागू नए नियमों से राज्य में भूजल का बचाव हुआ है, इसमें कोई शक नहीं है। लेकिन किसानों के सामने एक नई समस्या खड़ी हो गई।

नवंबर के मध्य तक गेहूं की फसल लगाने के लिए किसानों को खेत तैयार चाहिए होते हैं। ऐसे में सिर्फ पंद्रह से बीस दिनों में गेहूं की फसल के लिए खेत तैयार करने के मकसद से किसान को पराली जलाने का विकल्प ही सबसे उपयुक्त लगा, क्योंकि कम समय में दूसरे तरीकों से पराली प्रबंधन का रास्ता महंगा है। कर्ज के बोझ तले किसान इस खर्च का वहन नहीं कर सकते। दूसरे तरीकों को अपनाने पर प्रति एकड़ लगभग पांच हजार रुपए का खर्च आता है। किसान इतना पैसा खर्च करने की स्थिति में नहीं है।

किसान संगठनों के अनुसार पराली प्रबंधन के दूसरे तरीके किसान अपना सकते हैं, बशर्ते सरकार किसानों को धान पर प्रति क्विंटल दो सौ रुपए का बोनस दे दे। लेकिन लंबे समय से सरकार किसानों की यह मांग नहीं मान रही है। किसान पराली नष्ट करने वाली मशीनों को खरीदने की स्थिति में भी नहीं है। सरकारों को किसानों की बदहाल स्थिति का पता है। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने अपने आदेश कहा था कि सीमांत किसानों को मुफ्त में पराली प्रबंधन से संबंधित उपकरणों को दिया जाए। पांच एकड़ तक जमीन के मालिकों को सस्ती दर पर मशीनरी उपलब्ध करवाई जाए।

सच्चाई तो यह है कि अगर पंजाब सरकार एनजीटी का आदेश लागू कर भी दे तो काफी हद तक पराली जलाने की घटनाएं कम हो जाएंगी। पराली प्रबंधन के लिए सिर्फ उपकरण ही नहीं, ट्रैक्टर भी चाहिए। हर किसान के लिए यह संभव नहीं है कि वह लाखों रुपए खर्च कर ट्रैक्टर भी खरीद सके। ऐसी सूरत में पराली प्रबंधन के लिए खर्च तो सरकार को ही करना होगा, तभी पराली जलाने की घटनाएं बंद होंगी। लेकिन दिलचस्प बात है कि पंजाब सरकार ने किसानों को सीधी मदद करने के बजाय पराली प्रबंधन के विज्ञापन पर करोड़ों रुपए खर्च कर दिए हैं। विज्ञापन पर करोड़ों खर्च के बावजूद पंजाब जैसे राज्य में पराली जलाई जा रही है।

पंजाब सरकार का दावा है कि पराली जलाने की घटनाएं कम करने के लिए स्ट्रा मैनेजमेंट सिस्टम, हैप्पी सीडर, पैडी स्ट्रा चॉपर, हाइड्रोलिक रिवर्सेवल माउल्ड बोर्ड आदि मशीनों का उपयोग को बढ़ाया जा रहा है। इनके उपयोग से किसानों को पराली जलाने से मुक्ति मिल जाती है। पंजाब सरकार इन मशीनों की खरीद पर किसानों को छूट भी दे रही है। लेकिन अभी तक अच्छे नतीजे सामने नहीं आए हैं। पंजाब सरकार ने इस साल अट्ठाईस हजार मशीनों को बहुत ही सस्ते मूल्य पर देने का फैसला किया था। इसके लिए राज्य सरकार ने दो सौ अठहत्तर करोड़ रुपए का बजट भी रखा था। किसानों को इन मशीनों पर पचास फीसद का अनुदान भी दिया गया। फिर भी राज्य में पराली जलाने की घटनाओं में कमी नहीं आ रही।

पराली प्रबंधन की मशीनों को लेकर भी किसान संगठनों ने सरकार पर घपले के आरोप लगाए हैं। किसान संगठनों का कहना है कि जितनी कीमत पर अनुदान देकर मशीनें किसानों को उपलब्ध करवाई जा रही हैं, उससे सस्ती मशीनें खुले बाजार में उपलब्ध हैं। इस तरह अनुदान की रकम में खेल हो रहा है। मशीन बनाने वाली कंपनियों के साथ मिलकर अधिकारी घालमेल कर रहे हैं। किसानों को अनुदान के बाद पचहत्तर हजार रुपए में जो मशीन उपलब्ध कराई जा रही है, वह खुले बाजार में साठ हजार में मिल रही है।

अगर उतर भारत को हर साल अक्तूबर और नवंबर में भारी प्रदूषण से बचाना है तो उतर भारतीय राज्यों में कृषि विविधिकरण पर जोर देना होगा। किसानों को धान की खेती के लिए हतोत्साहित करना होगा। किसानों को तिलहन, दलहन, मक्का, रागी की खेती के लिए प्रोत्साहित करना होगा। इन फसलों को बढ़ावा देने से देश भर में फैल रहे गैर संक्रामक रोगों में भी कमी आएगी, जिसमें मधुमेह और रक्तचाप जैसी बीमारी शामिल हैं। पंजाब जैसे राज्य में चावल की खपत नहीं के बराबर है। पंजाब के धान से बना चावल दूसरे राज्यों में जाता है। बासमती का निर्यात पश्चिम एशिया के देशों में होता है। जबकि गैर बासमती चावल का निर्यात अफ्रीकी देशों में होता है। किसान धान की खेती तभी छोड़ेंगे जब उन्हें दूसरी फसलों की अच्छी कीमत मिले।

संजीव पांडेय

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