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राजनीति: दलित उत्पीड़न से उठते सवाल

दलित उत्पीड़न की आपराधिक-हिंसक घटनाएं संविधान और कानून का मखौल तो हैं ही, साथ ही ये बताती हैं कि हम आज भी जाति, वर्ण और लिंग के भेदभाव वाले समाज में रह रहे हैं। लेकिन गंभीरता से अध्ययन करने पर यह सामने आता है कि दलितों के साथ अपराध, हिंसा और अपमानजनक व्यवहार करने के पीछे मकसद कानून तोड़ना नहीं होता है। इसका कारण हमारे सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक ढांचे में निहित है।

Author July 10, 2019 1:14 AM
देश के तमाम हिस्सों में रोज दलितों के साथ हिंसा की घटनाएं सामने आ रही हैं।

स्वामी अग्निवेश

आजादी के सात दशक बाद भी देश में दलितों का उत्पीड़न बंद नहीं हुआ है। समाचार पत्रों के माध्यम से आए दिन दलित उत्पीड़न की घटनाएं सामने आती रहती हैं। दलितों के साथ घटित आपराधिक घटनाएं कुछ दिन मीडिया की सुर्खियां बनने के बाद गायब हो जाती हैं। यही हाल गुजरात के बोताद में एक दलित उप सरपंच मांजीभाई सोलंकी की हत्या के बाद भी हुआ। मीडिया अब खामोश है और मांजीभाई के परिजन न्याय की आस में हैं, जो शायद ही उन्हें मिलेगा। यहां यह देखना दिलचस्प है कि मांजीभाई कोई आम नागरिक नहीं थे। पिछले बीस साल से उनके परिवार के लोग गांव के सरपंच चुने जा रहे हैं। अभी मांजीभाई की पत्नी सरपंच हैं और वे उप सरपंच थे। यह कहा जा सकता है कि गांव में उनकी अच्छी पकड़ थी। लेकिन उनके गांव के उच्च जाति के लोगों को दलित समुदाय के व्यक्ति का सरपंच चुना जाना अच्छा नहीं लग रहा था। पहले उनको धमकियां मिलती रहीं, फिर हमला कर जान से मार दिया गया।

गुजरात में यह कोई पहली घटना नहीं है। पिछले एक महीने में यह तीसरी घटना है जिसमें किसी दलित को अपनी जान गंवानी पड़ी। सिर्फ गुजरात नहीं, देश भर में दलितों का उत्पीड़न बढ़ता जा रहा है। आज इक्कीसवीं सदी में भी दलितों की हत्या, बलात्कार और जातीय उत्पीड़न की घटनाओं में कमी नहीं देखी जा रही है। पिछले एक दशक की बात करें तो दलित समुदाय को बहुत ही विकट हालात का सामना करना पड़ा है। सरकारी आंकड़े भी इस बात की पुष्टि करते हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक पिछले दस साल (2007-2017) में दलित उत्पीड़न के मामलों में छियासठ फीसद का इजाफा हुआ है। इस दौरान देश में रोजाना छह दलित महिलाओं से बलात्कार के मामले दर्ज किए गए। आंकड़ों के मुताबिक भारत में हर पंद्रह मिनट में एक दलित के साथ कोई आपराधिक घटाना घट रही है।

देश में दलितों के साथ घट रही आपराधिक और हिंसक घटनाओं को सिर्फ कानून-व्यवस्था के पहलू से देखना सही नहीं होगा। दलित उत्पीड़न की आपराधिक-हिंसक घटनाएं संविधान और कानून का मखौल तो हैं ही, साथ ही ये बताती हैं कि हम आज भी जाति, वर्ण और लिंग के भेदभाव वाले समाज में रह रहे हैं। लेकिन गंभीरता से अध्ययन करने पर यह सामने आता है कि दलितों के साथ अपराध, हिंसा और अपमानजनक व्यवहार करने के पीछे मकसद कानून तोड़ना नहीं होता है। इसका कारण हमारे सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक ढांचे में निहित है। सदियों से हमारे समाज में सिर्फ दलित ही नहीं, बल्कि आदिवासी और महिलाओं की स्थिति भी दोयम दर्जे की रही है। शास्त्रों में भले ही महिलाओं को देवी का दर्जा दिया गया हो, लेकिन जीवन के वास्तविक धरातल पर महिलाओं का दर्जा दलितों और शूद्रों से ऊपर नहीं था।

आजादी के बाद दलितों, आदिवासियों और महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए कई नियम-कानून बने। लेकिन आज तक संपूर्ण रूप से वे धरातल पर लागू नहीं हो सके। सवर्ण और पुरुष वर्चस्व वाला हमारा समाज दलितों-महिलाओं को आज भी बराबरी का दर्जा नहीं देना चाहता। पुरुष और सवर्ण वर्चस्व वाला समाज आज भी दोनों को सेवक समझता है। ऐसे में जब भी वह किसी दलित और महिला को अपने से आगे बढ़ता हुआ देखता है तो उसे यह किसी अनहोनी से कम नहीं लगती है।

ऐसा भी नहीं है कि आजादी के बाद दलितों और महिलाओं की स्थिति में सुधार नहीं हुआ है। आजादी के बाद से ही दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं के कल्याण के लिए कई योजनाएं शुरू की गर्इं। इसका फायदा भी उन्हें हुआ है। पहले दलितों के साथ होने वाले अपराध सामने नहीं आ पाते थे। लेकिन शिक्षा और जागरूकता के बढ़ने से दलितों के साथ होने वाले अपराध अब सामने आने लगे हैं। आधुनिक शिक्षा ने दलितों को रोजगारोन्मुख बनाया है। रोजगार और राजनीतिक चेतना से दलितों के जीवन में बदलाव भी आया। राजनीतिक बदलाव से भी दलितों में चेतना का संचार हुआ है। ऐसे में पहले की तरह उनका उत्पीड़न करना आसान नहीं रह गया है फिर भी सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण उन पर होने वाले अपराध अभी बंद नहीं हुए हैं, बल्कि पिछले कुछ सालों में तो ज्यादा ही बढ़े हैं।

राजनीतिक चेतना से युक्त और सरकारी नौकरियों में बढ़ती भागीदारी से दलित समाज अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हुआ है और उसके जीवनस्तर में भी बदलाव आया है। आज गांव-देहात में सवर्ण-सामंतों के खेतों में काम करने के बजाय दलित शहरों में मजदूरी करना ज्यादा पसंद करता है। ऐसे में उच्च वर्ग के लोगों को यह बुरा लगता है कि पीढ़ी दर पीढ़ी आश्रित रहने वाला आज हमारे बराबर खड़ा होने की कोशिश कैसे कर रहा है। संविधान में सबको बराबरी का अधिकार मिला है। कानून की नजरों में सब एक समान हैं, सवर्ण इस विचार से आज भी सहमत नहीं होता है। अब चूंकि दलित और महिला हमेशा सवर्णों और पुरुषों के सामने कमतर माने जाते रहे हैं, ऐसे में वह दलितों को बराबरी करते देख बौखला जाते हैं। बिना किसी वाजिब कारण के वे आज भी अपनी जायज-नाजायज मांगों को दलितों से पूरा कराना चाहते हैं। लेकिन समय के साथ आए बदलावों ने दलितों के भीतर नई चेतना का संचार किया है। अब दलित चुपचाप उत्पीड़न को सहने और गांव-घर में ही निपटाने की बजाय थाने और अदालत का रुख करता है। दलितों के इस व्यवहार से सवर्ण-सामंती ताकतें और चिढ़ती हैं और दलितों के खिलाफ अपराध बढ़ते जाते हैं। ऐसे में देश के तमाम हिस्सों में रोज दलितों के साथ हिंसा की घटनाएं सामने आ रही हैं।

पिछले पांच वर्षों का आंकड़ा देखें तो दलितों और आदिवासियों पर हमले बढ़े हैं। लेकिन कुछ दिनों पहले देश में दलित उत्पीड़न नहीं, बल्कि दलितों के हित में बने कानूनों के दुरुपयोग की चर्चा जोरों पर रही। देश भर में एक भ्रम रचा गया कि अब दलित कानून की आड़ में सवर्णों को बेवजह फंसाया जा रहा है। हाल में सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला आया था, जिसमें एससी-एसटी एक्ट के दुरुपयोग को रेखांकित करते हुए बदलाव किए गए थे। सर्वोच्च अदालत ने कुछ अहम दिशानिर्देशों तय किए थे जिससे दलित समुदाय के किसी व्यक्ति के साथ घटित आपराधिक घटना की जांच के बाद ही मुकदमा दर्ज करने और गिरफ्तारी की बात थी। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का देशव्यापी विरोध हुआ और केंद्र सरकार ने कदम पीछे खींच लिए। अदालत के फैसले के मद्देनजर केंद्र सरकार ने एक संशोधन विधेयक लाकर एससी-एक्ट को पूर्व की स्थिति में ला दिया।

ऐसे में यह सवाल उठता है कि जब देश में किसी दलित के साथ हुई आपराधिक घटना की शिकायत के बाद तुरंत एफआईआर और गिरफ्तारी का नियम है तो दलितों के साथ इतनी आपराधिक घटनाएं कैसे घट रही हैं। असली सवाल यही है। आश्चर्यजनक रूप से सत्य तो यह है कि दलितों के साथ हिंसा आदि के मामले में एफआइआर दर्ज होने का प्रतिशत बहुत ही कम है। यदि मामला दर्ज भी हो गया तो दबाव और कोर्ट-कचहरी में व्याप्त भ्रष्टाचार की वजह से दोषी को सजा मिलने का आंकड़ा बहुत ही कम है। ऐसे में दलित-आदिवासियों के हित में कानून होने के बावजूद जमीनी स्तर पर उसके सही क्रियान्वयन न हो पाने के कारण दलितों-आदिवासियों और महिलाओं के साथ होने वाले अपराध में कमी नहीं आ रही है।

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