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राजनीति: कृषि कर्ज माफी पर सवाल

कृषि क्षेत्र में मौजूद समस्याओं को दूर करने के लिए कृषि कर्ज माफी को समाधान नहीं माना जा सकता।

Author Published on: January 27, 2020 12:41 AM
पिछले एक दशक में कृषि कर्ज माफी की अनेक घोषणाएं की गर्इं।

महाराष्ट्र सरकार ने दो लाख रुपए तक के कृषि कर्ज को माफ करने की घोषणा की है, जिसकी पात्रता के गणना की तारीख 30 सितंबर, 2019 रखी गई है। महाराष्ट्र में एक करोड़ सैंतीस लाख किसान हैं। वित्त वर्ष 2017-18 में नवासी लाख किसानों में से चवालीस लाख किसानों के कृषि कर्ज माफ कर दिए गए थे। इस बार लगभग पचास लाख से अधिक किसानों को कर्ज माफी का लाभ मिल सकता है, जिसका कारण कर्ज माफी की पात्रता सीमा को डेढ़ लाख रुपए से बढ़ा कर दो लाख रुपए किया जाना है। कर्ज माफी के पात्र किसानों की संख्या के आधार पर कृषि कर्ज माफी की लागत लगभग पचास हजार करोड़ रुपए आने का अनुमान है।

सरकार द्वारा किसानों को कर्ज माफी देने के पीछे सबसे बड़ा तर्क यह है कि जब कॉरपोरेट के फंसे कर्ज (एनपीए) को बट्टे-खाते में डाला जा सकता है, तो किसानों का कर्ज को क्यों नहीं माफ किया जा सकता है। फिलहाल, कृषि एनपीए एक लाख करोड़ रुपए से ज्यादा है, जो कुल एनपीए का 12.4 फीसद है। पिछले दशक में तीन लाख करोड़ रुपए से ज्यादा के कृषि कर्ज माफ किए जा चुके हैं। इस प्रकार, कृषि एनपीए और माफ किए गए कर्ज को जोड़ा जाए तो कुल राशि 4.24 लाख करोड़ रुपए हो जाती है, जो उद्योगों के बट्टे खाते में डाले गए 5.7 लाख करोड़ रुपए से बहुत कम नहीं है। यदि महाराष्ट्र सरकार द्वारा घोषित हालिया कृषि कर्ज माफी की राशि को कृषि एनपीए और माफ की गई कर्ज राशि को जोड़ दिया जाए, तो कुल कृषि एनपीए और माफ की गई कर्ज की राशि 4.7 लाख करोड़ रुपए हो जाती है। इधर, दिवाला और शोधन अक्षमता कानून आने के बाद से बड़े चूककर्ता कारोबारियों का कुछ हद तक पुनर्वास हो रहा है। इससे वसूली में भी तेजी आई है। हालांकि, चूककर्ता किसानों को कृषि कर्ज माफी देने के बाद भी उनकी वित्तीय स्थिति में कोई सुधार नहीं हो रहा है और वे कर्ज के जाल में फंसते जा रहे हैं।

पिछले एक दशक में कृषि कर्ज माफी की अनेक घोषणाएं की गर्इं। राज्य सरकारों ने भी बड़े पैमाने पर कृषि कर्ज माफ किए। बावजूद इसके, किसानों को माफ की गई कर्ज की पूरी राशि नहीं मिल पा रही है। राज्यों के बजट विश्लेषण से पता चलता है कि जिस साल कृषि कर्ज माफ किया गया, उसके बाद के कई सालों तक कर्ज माफी की राशि बैंकों को नहीं दी गई। इसका कारण राज्यों के खजाने में पैसा नहीं होना रहा है। चूँकि, वित्तीय जवाबदेही और बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) कानून के प्रावधानों के कारण चौदहवें वित्त आयोग ने राज्यों को निर्धारित सीमा से अधिक बाजार से उधार लेने के लिए प्रतिबंधित कर रखा है। इसलिए राज्य सरकारें बाजार से पैसा नहीं उठा पा रही हैं। तेलंगाना ही केवल ऐसा राज्य है, जिसने घोषित कर्ज माफी की नब्बे फीसद राशि का भुगतान वित्तीय संस्थानों को कर दिया है।

आमतौर पर कृषि कर्ज माफी की राशि संबंधित राज्य सरकारों द्वारा बैंकों को कई किस्तों में दी जाती है। एक बार कर्ज माफी का लाभ मिलने के बाद किसानों को दोबारा कर्ज मिलने में परेशानी होती है। वित्तीय संस्थान चूककर्ता किसानों को कर्ज देने से परहेज करते हैं। समय पर वित्तीय सहायता नहीं मिलने की वजह से चूककर्ता किसानों का कर्ज बढ़ता चला जाता है, जिससे कृषि उत्पादकता में गिरावट आती है। कृषि कर्ज माफी की वजह से नए कृषि कर्ज के वितरण में भी कमी आ रही है। उदाहरण के लिए, वित्त वर्ष 2018 में महाराष्ट्र, कर्नाटक और पंजाब की सरकार ने कृषि कर्ज माफ किए थे, जिसकी वजह से वित्त वर्ष 2018 में किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) का वर्ष दर वर्ष कर्ज वितरण महाराष्ट्र में चालीस फीसद, कर्नाटक में एक फीसद और पंजाब में तीन फीसद हुआ। इस तरह, कृषि कर्ज माफी किसानों की कर्जग्रस्तता को कम करने के बजाय बढ़ाती जा रही है। साथ ही, अब वैसे किसान जो नियमित रूप से कर्ज का भुगतान कर रहे हैं, वे भी कर्ज नहीं चुकाने के लिए प्रेरित हो रहे हैं। वर्तमान में एक बार कर्ज माफी का लाभ मिलने के बाद किसान दोबारा कर्ज की राशि बैंक को नहीं लौटा रहे हैं। आमतौर पर ऐसे किसान अगली कर्ज माफी की घोषणा का इंतजार करते हैं।

भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) ने वर्ष 2008 में की गई कृषि कर्ज माफी पर 5 मार्च 2013 को एक रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। रिपोर्ट के अनुसार कर्ज माफी योजना को लागू करने के दौरान अपात्र किसानों को कर्ज माफी का लाभ देने, लाभार्थी किसानों को कर्ज माफी का प्रमाणपत्र नहीं देने, स्वतंत्र एजेंसियों से कर्ज माफी का अंकेक्षण नहीं कराने जैसी गलतियां सामने आई थीं।

कृषि क्षेत्र में मौजूद समस्याओं को दूर करने के लिए कृषि कर्ज माफी को समाधान नहीं माना जा सकता। किसानों की समस्याओं को दूर करने से ही स्थिति में सकारात्मक बदलाव आ सकता है। इसके लिए खाद्य उत्पादों की प्रतिस्पर्धी और समावेशी मूल्य शृंखलाओं का निर्माण करना चाहिए। सहकारिता मॉडल की मदद से उत्पादन से लेकर विपणन तक की संपूर्ण मूल्य शृंखला में सुधार आ सकता है। इसके अलावा कृषि उपज और लाइवस्टॉक विपणन (एपीएलएम) अधिनियम 2017 के मॉडल को भी अमलीजामा पहनाने की जरूरत है। इससे कृषि विपणन प्रणाली में मौजूद बाधाओं को दूर करने में आसानी होगी। बैंकों द्वारा कर्ज के लिए संपत्ति गिरवी रखने पर भी शुल्क लगाने की प्रक्रिया को भी समाप्त करने की जरूरत है। मौजूदा समय में इस नियम की वजह से बैंकिंग परिचालन में अनेक मुश्किलें आ रही हैं साथ ही साथ बैंक के खर्च में अनावश्यक रूप से वृद्धि हो रही है।

किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) योजना का आगाज भारतीय रिजर्व बैंक ने वर्ष 1998 में किया था। केंद्र सरकार तीन लाख रुपए तक के केसीसी लेने वाले किसानों को त्वरित भुगतान रियायत दे रही है। समय पर कर्ज की अदायगी करने वाले किसानों को पांच फीसद ब्याज देना होता है। मार्च, 2019 के अंत में, सभी अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक (एएससीबी) ने केसीसी श्रेणी में 6680 अरब रुपए का कर्ज दिया था, जो कुल कृषि कर्ज का साठ फीसद था। आज किसानों के बीच यह सबसे लोकप्रिय कर्ज है। फिर भी, कई कारणों जैसे- प्राकृतिक आपदा, उपज की वास्तविक कीमत नहीं मिलने, कृषि कर्ज माफी की घोषणा आदि के कारण किसान केसीसी का पुनर्भुगतान नहीं कर पा रहे हैं।

किसानों की कर्जग्रस्तता में वृद्धि का एक बहुत बड़ा कारण लगभग सत्तर फीसद कृषि योग्य भूमि पर बंटाईदार या काश्तकार किसानों द्वारा खेती-किसानी करना है। मौजूदा नियमों के अनुसार काश्तकार किसान न तो कर्ज पाने के हकदार हैं, न ही सरकारी योजनाओं का लाभ लेने का। सरकार द्वारा दिए जाने वाले सारे फायदे भूमि मालिकों को मिलते हैं। केरल एकमात्र ऐसा राज्य है, जिसने काश्तकार किसानों को आर्थिक शोषण से बचाने के लिए मनी लेंडिंग एक्ट को अमलीजामा पहनाया है। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना राज्यों में भी काश्तकार किसानों की बेहतरी के लिए काम किया जा रहा है। वित्त वर्ष 2018 के बजट में काश्तकार किसानों को काश्तकारी का प्रमाणपत्र देने की बात कही गई थी। किसानों के जीवन को खुशहाल बनाने के लिए इस संकल्पना को जल्द से जल्द लागू किया जाना चाहिए। हकीकत ये है कि कृषि कर्ज माफी से किसानों का कोई भला नहीं हो रहा है। नीति आयोग और रिजर्व बैंक तक इसका कई बार विरोध कर चुके हैं। आज किसानों की समस्याओं का स्थायी समाधान करने की जरूरत है, न कि उन्हें कर्ज में फंसाने की।

सतीश सिंह

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