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राजनीति: पाकिस्तान की अग्निपरीक्षा

हाफिज सईद, मसूद अजहर और इनके संगठन लश्कर ए तैयबा और जैश ए मोहम्मद पर कार्रवाई के लिए पाकिस्तान पर दबाव लंबे समय से बना हुआ था और पाकिस्तान हमेशा दिखावे की कार्रवाई करता रहा। जबकि हकीकत यह है कि वह इन संगठनों को हर तरह से मजबूत करता रहा, ताकि ये आइएसआइ, सेना और सरकार के भारत-विरोधी अभियानों को जारी रखें।

Author July 6, 2019 1:27 AM
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान। (फोटो-पीटीआई)

संजीव पांडेय

पाकिस्तान को थोड़ी राहत मिली है। अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) पाकिस्तान को छह अरब डॉलर का कर्ज देने को तैयार हो गया है। यह रकम पाकिस्तान को कई किस्तों में मिलेगी। पहली किस्त में एक अरब डॉलर दिए जाएंगे। आइएमएफ का यह कर्ज इस बार पाकिस्तान को कड़ी शर्तों पर मिल रहा है। पाकिस्तान और आइएमएफ के बीच हुए समझौते में जिन शर्तों को पाकिस्तान ने माना है, उन्हें जमीन पर लागू किया गया या नहीं, इसकी जांच समय-समय पर खुद अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ही करेगा। पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों को भरोसा दिया है कि वह सिर्फ आइएमएफ की शर्तों को ही नहीं मानेगा, बल्कि देश में सक्रिय आतंकी संगठनों पर भी सख्त कार्रवाई करेगा। लगता है, इसीलिए पाकिस्तान ने लश्कर ए तैयबा और हाफिज सईद पर कार्रवाई शुरू भी कर दी है। पंजाब प्रांत के आतंक निरोधी विभाग ने हाफिज सईद, उसके सहयोगियों और उसके कई ट्रस्टों के खिलाफ लाहौर, गुजरांवाला और मुल्तान में तेईस मुकदमे दायर किए गए हैं। वित्तीय कार्रवाई बल (फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स) की चेतावनी के बाद पाकिस्तान पर आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए चौतरफा दबाव बना हुआ है। आतंकी संगठनों के खिलाफ पाकिस्तान सरकार की यह कार्रवाई किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है।

हाफिज सईद, मसूद अजहर और इनके संगठन लश्कर ए तैयब्बा और जैश ए मोहम्मद पर कार्रवाई के लिए पाकिस्तान पर दबाव लंबे समय से बना हुआ था और वह हमेशा दिखावे की कार्रवाई करता रहा। जबकि हकीकत यह है कि वह इन संगठनों को हर तरह से मजबूत करता रहा, ताकि ये आइएसआइ, सेना और सरकार के भारत-विरोधी अभियानों को जारी रखें। हालांकि गंभीर आर्थिक संकट में फंसे पाकिस्तान के पास इस कार्रवाई के अलावा कोई चारा भी नहीं था। लेकिन अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं इन आतंकी संगठनों पर ठोस कार्रवाई चाहती हैं, क्योंकि विगत का अनुभव खासा खराब रहा है। इसका मुख्य कारण पाकिस्तान की तमाम संवैधानिक संस्थाओं में इन आतंकी संगठनों की भारी पैठ है। बताया जाता है कि हाफिज सईद और लश्कर ए तैयबा के खिलाफ पाकिस्तानी जांच एजेंसियों ने मुंबई हमलों के मामले में पक्के सबूत दिए थे। कई अधिकारियों ने अपनी गवाही भी लश्कर के खिलाफ दी थी। लेकिन उस समय हाफिज को न्यायालय से मदद मिल गई।

इस समय पाकिस्तानी सेना खुद संकट में है। इमरान खान सरकार के आने के बाद लगातार बढ़ते आर्थिक संकट ने सैन्य बजट पर ही असर दिखाना शुरू कर दिया है। 2019-20 के आम बजट में पाकिस्तान सरकार ने सैन्य बजट में बढ़ोतरी नहीं की है। सेना पर आर्थिक संकट की आंच आई तो अब सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा सीधे लंदन पहुंच गए। उन्होंने लंदन में अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को कई संदेश दिए। ये संदेश भारत-पाकिस्तान, पाकिस्तान-अफगानिस्तान संबंधों को लेकर थे। बाजवा ने वहां ब्रिटिश और अमेरिकी अधिकारियों को संदेश देने की कोशिश की, भारत से संबंध सुधारने को पाकिस्तान इच्छुक है। सीमा पर तनाव पाकिस्तान कम करना चाहता है। वहीं बाजवा ने यह भी संदेश दिया कि अफगानिस्तान शांति वार्ता में पाकिस्तान सकारात्मक भूमिका लगातार निभा रहा है। वह अमेरिका, रूस और चीन के साथ तालिबान की बातचीत में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

हालांकि ईरान और अफगानिस्तान से संबंधों को ठीक करने को लेकर पाकिस्तान ने कुछ गंभीर प्रयास किए हैं। हाल में अफगानिस्तान राष्ट्रपति अशरफ गनी ने पाकिस्तान का दौरा किया था। दोनों मुल्कों के नेताओं के बीच गंभीर विचार-विमर्श अफगान शांति को लेकर हुआ। ईरान के दौरे पर गए इमरान खान ने अपनी खराब वित्तीय हालत का हवाला देते हुए ईरानी नेतृत्व से सीमा पर शांति की अपील की। लेकिन भारतीय सीमा पर अभी तक पाकिस्तान की तरफ से गंभीर प्रयास नहीं दिख रहे हैं। लंदन में पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने संकेत दिए हैं कि वे भारत से बातचीत को तैयार हैं, पर उनकी सेना के बाकी जनरल उनसे कितने सहमत हैं, यह भी बड़ा सवाल है। दूसरी ओर, भारत सरकार ने अपनी जम्मू-कश्मीर नीति को लेकर स्पष्ट रवैया अख्तियार किया है। जबकि पाकिस्तान भारत से होने वाली बातचीत में कश्मीर मुद्दे को हल करने की पहली शर्त रखता है। जबकि भारत का तर्क है कि पहले पाकिस्तान आतंकवाद बंद करे, इसके बाद ही उससे कोई निर्णायक बातचीत हो सकती है। इन तनावों और शर्तों के खेल के बीच दोनों मुल्कों में व्यापार कम हो चुका है। फिलहाल दोनों देशों के बीच 2.4 अरब डॉलर का सलाना व्यापार है। पुलवामा में हुए हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान को दिए सर्वाधिक तरजीही राष्ट्र (एमएफएन) का दर्जा वापस ले लिया था और पाकिस्तानी आयात पर आयात शुल्क बढ़ा कर दो सौ फीसद तक कर दिया था। इससे पाकिस्तान के छोटे उद्योगों को खासा नुकसान हुआ।

पाकिस्तान ने पिछले चालीस साल से भारत के खिलाफ छद्म युद्ध छेड़ रखा है। लेकिन इसके बावजूद दोनों मुल्कों के बीच बातचीत का रास्ता खुला होना चाहिए। पाकिस्तान भारत का पड़ोसी राष्ट्र है, इस सच को स्वीकार करना होगा। भारत के एक और पड़ोसी देश चीन से भी भारत के संबंध अरसे से खराब रहे हैं। लेकिन चीन के साथ भारतीय कूटनीति का मिजाज अलग है, और पाकिस्तान के साथ अलग। हालांकि चीन भी भारतीय सीमा में समय-समय पर घुसपैठ करता रहा है। लेकिन दिलचस्प स्थिति यह है कि तमाम तनावों के बीच चीन और भारत के बीच व्यापार संबंध मजबूत हुए हैं। पाकिस्तान से तनाव के कारण व्यापार संबंध खराब ही रहे हैं। जबकि इसका नुकसान पाकिस्तान और भारत दोनों को है। पाकिस्तान के बालाकोट में आतंकी शिविर पर भारतीय वायुसेना की कार्रवाई के बाद पाकिस्तान ने अपने हवाई क्षेत्र को प्रतिबंधित कर दिया। इस प्रतिबंध से भारतीय विमान कंपनियों को अब तक साढ़े पांच सौ करोड़ रुपए नुकसान हो चुका है, क्योंकि भारतीय हवाई अड््डों से मध्य एशिया, यूरोप और उत्तरी अमेरिका जाने वाले विमानों को या तो अपना रास्ता बदलना पड़ा है, कई कंपनियों ने अपनी हवाई सेवाएं फिलहाल बंद कर दी हैं। इससे यात्रियों की परेशानी भी बढ़ी है। हवाई यात्रा महंगी हो गई है। सबसे ज्यादा नुकसान सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एयर इंडिया को हुआ है। इसे खुद केंद्रीय नागरिक उडड्यन राज्यमंत्री ने स्वीकार किया है। पाकिस्तानी हवाई क्षेत्र बंद होने के कारण एयर इंडिया को चार सौ इनक्यानबे करोड़ रुपए का घाटा हुआ है। इंडिगो, स्पाइस जेट जैसी कंपनियों को भी काफी नुकसान हुआ है।

भारत और पाकिस्तान के बीच अगर सैन्य तनाव बढ़ा तो दोनों को अपने बजट संसाधन का बड़ा हिस्सा सैन्य खर्चों की तरफ धकेलना होगा। इस समय भारत अपने सैन्य बजट पर लगभग पैंसठ अरब डॉलर सलाना खर्च कर रहा है। जबकि अगर इसका एक हिस्सा देश में कृषि, उद्योग, शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च किया जाए, निश्चित तौर पर पांच लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था भारत बन जाएगा। लंबे समय से बहस हो रही है कि सैन्य उपकरणों की खरीद पर लगाया जाने वाला पैसा व्यर्थ जा रहा है। दोनों मुल्कों के बीच पूर्ण युद्ध की आशंका न के बराबर है, क्योंकि दोनों मुल्क परमाणु शक्ति से संपन्न हैं। इसलिए पूर्ण युद्ध के बजाय दोनों मुल्कों के बीच छिटपुट लड़ाई ही समय-समय पर होगी। अगर प्रयास किया जाएं तो दोनों मुल्कों के बीच छिटपुट संघर्ष भी खत्म हो जाएगा। लेकिन दुनिया की कई ताकतें शायद यह न होने दें। हालांकि पाकिस्तान ने अपने सैन्यीकरण का नतीजा देख लिया। आज पाकिस्तान कंगाली के कगार पर है। देश चलाने के लिए पैसा नहीं है। अब अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां पाकिस्तान पर दबाव बना रही हैं कि आर्थिक सहायता तभी मिलेगी, जब पाकिस्तान अपनी सीमा के अंदर बैठे आतंकी संगठनों पर निर्णायक कार्रवाई करेगा।

 

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