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राजनीति: लक्ष्यों और चुनौतियों में घिरा जी-20

पहले से शक्तिशाली अमेरिका, रूस और चीन जैसे देशों और उभरती वैश्विक शक्तियों- भारत व जापान जैसे देशों की परस्पर तनातनी के चलते जी-20 कहीं से भी बीस देशों के मूलभूत आर्थिक सिद्धांतों को सार्वभौमिक हित पूरे करता नहीं दिखता।

Author July 3, 2019 1:23 AM
जी-20 की बैठक में भारत एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में उभरा है। (Reuters Photo)

विकेश कुमार बडोला

जी-20 की स्थापना का मुख्य उद्देश्य विकसित, विकासशील और आर्थिक आधार पर अति पिछड़े देशों के मध्य आर्थिक संतुलन साधना था, ताकि इन देशों को विकसित बनाने की दिशा में प्रतिवर्ष एक नई सामूहिक कार्ययोजना बने और उस पर ठोस काम हो। लेकिन पिछले दो दशकों में जी-20 की कार्ययोजनाएं समूह के विकसित सदस्य देशों के परस्पर आर्थिक, व्यापारिक और सामरिक विवादों के कारण परिणामोन्मुखी नहीं बन पार्इं।

जापान के शहर ओसाका में पिछले हफ्ते बीस देशों के समूह यानी जी- 20 का चौदहवां शिखर सम्मेलन संपन्न हो गया। इस बार समूह देशों का संकल्प था, ‘महत्त्वपूर्ण, व्यवस्थित व औद्योगिक रूप में समृद्ध यानी विकसित और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को भविष्य में एक साथ लाया जाए, ताकि विश्व की अर्थव्यवस्था को सावर्देशीय आर्थिक प्रगति का आधार बनाया जा सके।’ जी-20 सम्मेलन जापान में पहली बार हुआ। पिछले वर्ष अर्जेंटीना में आयोजित जी-20 वार्ता के प्रमुख कार्यकारी बिंदुओं में भावी कार्य, विकास हेतु ढांचागत क्षेत्र में सुविधाएंऔर दीर्घकालिक खाद्य आपूर्ति जैसे बिंदु शामिल थे, जो अर्जेंटीना की राष्ट्रीय चुनौतियों के समग्र रेखांकन के बाद उपजे विचारणीय बिंदु थे। प्राय: जी-20 के सदस्य देशों में से जिस देश में वार्षिक जी-20 शिखर सम्मेलन आयोजित होता है, वह अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप ही सम्मेलन के कार्यकारी बिंदुओं को निर्धारित करने पर बल देता है। जी-20 वैश्विक अर्थव्यवस्था को सार्थक, कल्याणकारी और

सार्वदेशीय-सार्वभौमिक हितसाधक बनाने के लिए प्रयासरत है। इसलिए जी-20 सम्मेलन में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक, विश्व व्यापार संगठन, वित्तीय स्थिरता बोर्ड, अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन, आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन, एशियाई विकास बैंक, संयुक्त राष्ट्र और विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख प्रतिनिधियों की उपस्थिति हर दृष्टि से अनिवार्य व उपयोगी होती है। इन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के प्रमुखों का भी दायित्व बनता है कि वे जी-20 जैसे आयोजन के उद्देश्यों, मूलभूत सिद्धांतों और सम्मेलन में निर्धारित नवीन लक्ष्यों की प्राप्ति में जी-20 की नीतियों पर विमर्श करें। लेकिन चूंकि जी-20 जैसे मंचों की स्थापना ही अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा अपने-अपने कार्यों और दायित्वों का समुचित निर्वाह न करने के कारण हुई है, इसलिए वर्तमान में जी-20 में इन संस्थाओं को आमंत्रित करने का उद्देश्य इनसे संतुलित आर्थिक प्रगति के बारे में कोई सीख या सुझाव लेना नहीं, अपितु इन्हें जी-20 द्वारा प्रतिवर्ष निर्धारित की जाने वाली मौद्रिक, आर्थिक और व्यापारिक नीतियों के अनुरूप अपने संस्थागत दायित्व निभाने के लिए प्रेरित करना है।

लेकिन जी-20 के मंचों से यह कार्य भी नहीं हो पा रहा, क्योंकि इस समूह में जहां एक ओर जापान जैसे विकसित, प्रशांत व शासकीय रूप में स्थिर देश हैं और जिनका ध्यान तकनीक आधारित व्यवसाय-व्यापार करने और आर्थिक प्रगति के लिए अपने हितों के अनुसार अर्थ नीतियां बनाने पर केंद्रित है, तो दूसरी ओर अर्जेंटीना, भारत, इटली जैसे देश भी हैं, जो आतंकवाद, जलवायु, खाद्यान्न व जलापूर्ति जैसी समस्याओं के समाधान को प्राथमिकता देते हैं। जी-20 में व्याप्त इन परिस्थितियों से सामंजस्य न बिठाने की स्थिति में विकसित देशों के लिए यह समूह औपचारिक सम्मेलन बनता जा रहा है और इसीलिए वे जी-20 की प्रमुख बैठक व बैठक की सामूहिक चिंताओं से अलग अपने-अपने हितों के अनुरूप द्विपक्षीय, त्रिपक्षीय तथा बहुपक्षीय वार्ताओं के प्रति अधिक गंभीर हो रहे हैं।

जी-20 सम्मेलन से कुछ दिन पूर्व ओसाका में सदस्य देशों के वित्त मंत्रियों, विदेश मंत्रियों और केंद्रीय बैंक के गर्वनरों ने जापान के प्रतिनिधित्व में सम्मेलन के लिए सूचीबद्ध होने वाले विचार बिंदुओं पर चर्चा की थी। इनमें से एक प्रमुख बिंदु जापान सहित चीन, दक्षिण कोरिया और ब्राजील जैसे देशों में बढ़ती वृद्ध आबादी का था। जी-20 में शामिल जिन देशों में युवाओं से अधिक कार्यमुक्त बूढ़े लोगों की संख्या है, वे देश अपने भावी आर्थिक विकास की आशंकाओं से घिरे हुए हैं। इसलिए यह प्रमाणित है कि जापान की मेजबानी में जी-20 की आर्थिक चिंताएं एक नई दिशा में मुड़ चुकी हैं। बढ़ती बूढ़ी आबादी वाले जापान और उस जैसे देशों को चिंता है कि ऐसे में जी-20 के सदस्य देशों के साथ आर्थिक संतुलन साधने में मुश्किलें आ सकती हैं। पूर्व में जी-8 को लेकर विश्व के प्रमुख देशों में जैसे मतभेद उभरे और जिस कारण जी-8 के स्थापना उद्देश्यों और लक्ष्यों को हासिल नहीं किया जा सका, कमोबेश वही स्थिति आज जी-20 के साथ भी देखने को मिल रही है।

सामूहिक रूप में जी-20 की विश्व के सकल घरेलू उत्पाद में नब्बे फीसद, वैश्विक व्यापार में अस्सी फीसद (यदि यूरोपीय संघ के परस्पर-व्यापार को छोड़ दें तो पचहत्तर फीसद) की सहभागिता है। जी-20 के सदस्य देशों में विश्व की दो-तिहाई जनसंख्या रहती है और इनके पास विश्व के कुल भू-क्षेत्र का लगभग आधा भू-क्षेत्र है। इस समूह में शामिल देशों की सरकारें और इनके केंद्रीय बैंकों के गर्वनर वैश्विक आर्थिक परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए परस्पर लाभांश वितरण, अंतरराष्ट्रीय श्रम व रोजगार की स्थितियों को सुगम बनाने और संतुलित आर्थिक विकास के लिए प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले सम्मेलन से पूर्व नीतियां बनाते हैं। जी-20 की स्थापना का मुख्य उद्देश्य विकसित, विकासशील और आर्थिक आधार पर अति पिछड़े देशों के मध्य आर्थिक संतुलन साधना था, ताकि इन देशों को विकसित बनाने की दिशा में प्रतिवर्ष एक नई सामूहिक कार्ययोजना बने और उस पर ठोस काम हो। लेकिन पिछले दो दशकों में जी-20 की कार्ययोजनाएं समूह के विकसित सदस्य देशों के परस्पर आर्थिक, व्यापारिक व सामरिक विवादों के कारण परिणामोन्मुखी नहीं बन पार्इं।

जी-20 में शामिल अमेरिका, चीन, रूस, ब्रिटेन और फ्रांस दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश हैं। संयुक्त राष्ट्र के स्थायी सदस्य इन देशों के बीच ही अनेक अंतरराष्ट्रीय, क्षेत्रीय, महासागरीय और दूसरी समस्याओं को लेकर एक-दूसरे के विरोध में कई गुट बने हुए हैं। पिछले दो साल से अमेरिका और चीन के मध्य व्यापार युद्ध चल रहा है। अमेरिका की नई अर्थनीतियां और व्यापारिक नियम चीन ही नहीं अपितु दक्षिण एशिया में भारत पर भी भारी पड़ रहे हैं। चीन-अमेरिकी व्यापार युद्ध ने भारत की भी चिंताएं बढ़ाई हैं। इन्हीं समस्याओं को लेकर जी-20 में जहां एक ओर भारत-रूस-चीन ने अलग से त्रिपक्षीय वार्ता की, वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भी भारत के प्रधानमंत्री से भेंट कर भारत-अमेरिका के संबंधों में व्यापारिक शुल्क को लेकर उत्पन्न खटास कम करने की कोशिश की। जी-20 से इतर भारत ने एक दर्जन से अधिक देशों के प्रमुखों के साथ द्विपक्षीय और त्रिपक्षीय वार्ताएं कीं।

पहले से शक्तिशाली अमेरिका, रूस और चीन जैसे देशों और उभरती वैश्विक शक्तियों- भारत व जापान जैसे देशों की परस्पर तनातनी के चलते जी-20 कहीं से भी बीस देशों के मूलभूत आर्थिक सिद्धांतों को सार्वभौमिक हित पूरे करता नहीं दिखता। इतना अवश्य है कि जी-20 और इसके समांंतर अनेक द्विपक्षीय, त्रिपक्षीय वार्ताओं के मंचों पर पिछले कुछ सालों से भारत के दृष्टिकोण को गंभीरता से लिया जा रहा है। वास्तव में जी-20 समूह में विकसित और विकासशील दोनों तरह के देश हैं। जहां विकसित देशों की आर्थिक समस्याएं खुद को अधिक अर्थसंपन्न बनाने से जुड़ी हैं, वहीं विकासशील देशों के समक्ष राजनीतिक अस्थिरता से लेकर आतंक, पर्यावरण, कुपोषण, नारी एवं बाल विकास संबंधी समस्याएं और अनेक अन्य सामाजिक बाधाएं भारी विसंगतियों के साथ खड़ी हैं। विकासशील देशों के सम्मुख इन समस्याओं के समाधान की दिशा में युद्ध स्तर पर कार्य करने की चुनौतियां तो हैं ही, उनके सामने वैश्विक आर्थिक वातावरण के अनुरूप अपनी अर्थ नीतियां बना कर आर्थिक रूप में समृद्ध बनने की बड़ी चुनौतियां भी हैं। यही कारण है जो जी-20 जैसे मंच पर प्रस्तुत किए जाने वाले और सामूहिक सहमति से कार्यान्वयन के लिए पारित कार्यक्रम बड़े पैमाने पर निष्फल ही रहे हैं।

वास्तव में जी-20 में शामिल शक्तिशाली राष्ट्र, समूह के मूलभूत उद्देश्यों और प्रतिवर्ष मेजबान देश की जरूरतों के आधार पर निर्धारित होने वाले सामूहिक नवीन उद्देश्यों को पूरा करने की दिशा में अधिक कार्यशील नहीं होते। इसके स्थान पर उनका ध्यान जी-20 मंच पर चर्चित अपनी निजी समस्याओं को सुलझाने पर अधिक होता है। जब तक जी-20 में शामिल शक्तिशाली राष्ट्रों की यह प्रवृत्ति नहीं बदलती तब तक यह मंच विश्व स्तर पर अर्थ संतुलन साधने के लिए औपचारिकताएं ही करता रहेगा और धरातल पर कुछ भी ठोस काम नहीं हो सकेगा।

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