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राजनीति: प्लास्टिक कचरे से बढ़ता संकट

हैरानी की बात तो यह है कि जिन राज्यों में प्लास्टिक के इस्तेमाल पर रोक लगाने की घोषणा कर दी गई है उन राज्यों में इस घोषणा पर अमल नहीं किया गया है। प्लास्टिक के इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगाने के लिए सबसे पहली जरूरत इसका विकल्प सामने लाने की थी। लेकिन राज्य सरकारों ने इसे पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। इसी का नतीजा है कि प्रतिबंध के बावजूद प्लास्टिक का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है।

Author Updated: August 27, 2019 4:51 AM
चीन ने चौबीस श्रेणियों के ठोस कचरे के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया है।

संजय ठाकुर

भारत में प्लास्टिक कचरे का निबटान एक बड़ी समस्या बना हुआ है। ये समस्या अब और ज्यादा विकराल इसलिए हो रही है कि कई कंपनियां और पुनर्चक्रण इकाइयां चोरी-छिपे विदेशी प्लास्टिक कचरे का आयात कर रही हैं। एक मोटे अनुमान के मुताबिक हर साल एक लाख इक्कीस हजार टन से ज्यादा प्लास्टिक कचरा पश्चिम एशिया, यूरोप और अमेरिका सहित पच्चीस से ज्यादा देशों से भारत लाया जा रहा है। पचपन हजार टन प्लास्टिक कचरा तो पाकिस्तान और बांग्लादेश से ही आ रहा है। पिछले एक वर्ष के दौरान उत्तर प्रदेश में अट्ठाईस हजार आठ सौ छियालीस टन, दिल्ली में उन्नीस हजार पांच सौ सत्रह टन और महाराष्ट्र में उन्नीस हजार तीन सौ पचहत्तर टन से ज्यादा प्लास्टिक कचरा आयात किया जा चुका है।

विश्व के सबसे बड़े प्लास्टिक कचरा आयातक देश चीन ने चौबीस श्रेणियों के ठोस कचरे के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया है। इसके बाद भारत में प्लास्टिक कचरे का आयात और बढ़ गया। चीन के बाद मलेशिया, वियतनाम और थाइलैंड सहित कई अन्य देशों में भी प्लास्टिक कचरे के आयात पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए गए हैं जिससे भारत की मुश्किलें और भी बढ़ गई हैं। हालांकि भारत सरकार ने देश के खतरनाक अवशिष्टों के प्रबंधन और आयात से जुड़े नियमों (हैजारड्स एंड अदर वेस्ट्स (मैनेजमेंट एंड ट्रांसबॉउंडरी मूवमेंट रूल्स, 2015) को संशोधित करके एक मार्च, 2019 को ठोस प्लास्टिक कचरे के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया है लेकिन इसमें खामियों के चलते भारत में प्लास्टिक कचरे के आयात की छूट मिल रही है। ऐसी छूट के चलते इस्तेमाल की गर्इं पॉलीऐथिलीन टेरेफ्थैलेट प्लास्टिक बोतलों को महीन कचरे के रूप में आयात किया जा रहा है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के एक अध्ययन के अनुसार भारत में प्रतिदिन पच्चीस हजार नौ सौ चालीस टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है जिसमें से चालीस प्रतिशत फिर से इकट्ठा ही नहीं हो पाता है। कुल प्लास्टिक कचरे का छठा हिस्सा भारत के साठ बड़े शहरों में पैदा होता है जिसमें से अकेले दिल्ली में रोजाना छह सौ नवासी टन प्लास्टिक कचरा निकलता है। देश में हर साल सबसे ज्यादा चार लाख उनहत्तर हजार अठानवे टन प्लास्टिक कचरा महाराष्ट्र में होता है। इसके बाद गुजरात (दो लाख उनहत्तर हजार दो सौ चौरानवे टन), दिल्ली (ढाई लाख टन), तमिलनाडु (एक लाख पचास हजार तीन सौ तेईस टन), उत्तर प्रदेश (एक लाख तीस हजार सात सौ सतहत्तर टन) और कर्नाटक (एक लाख उनत्तीस हजार छह सौ टन) का नंबर आता है। सबसे कम (तेरह टन सालाना) प्लास्टिक कचरा मेघालय में होता है। इसके बाद अरुणाचल प्रदेश (साढ़े चौदह टन), मणिपुर (तीस टन), गोवा (एक सौ छह टन) और उत्तराखंड (तीन हजार सोलह टन) का स्थान आता है। सबसे ज्यादा घातक स्थिति तो यह है कि प्लास्टिक कचरे का उचित रूप से निपटान न होने से हर साल अस्सी लाख टन से ज्यादा प्लास्टिक कचरा समुद्र में जा रहा है।

धरती में घुलनशील प्लास्टिक के दस मानकों के संबंध में भारतीय मानक ब्यूरो ने अधिसूचना जारी की है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी प्लास्टिक के इस्तेमाल को रोकने के आदेश दिए हैं। केंद्र सरकार ने भी प्लास्टिक कचरे से पर्यावरण को होने वाले नुकसान का आकलन करवाने के लिए कई समितियां और कार्यबल बनाए हैं। ऐसे कानूनों और नियमों को कड़ाई के साथ लागू न किए जाने से प्लास्टिक कचरा अभी भी एक बड़ी समस्या बना हुआ है।

देश के कई राज्यों में प्लास्टिक के इस्तेमाल पर रोक लगाने के फरमान तो जारी कर दिए गए हैं लेकिन इन राज्यों की सरकारों के ढुलमुल रवैए और नीति-निर्माण के स्तर की खामियों से इसके इस्तेमाल को पूरी तरह रोकने में अभी तक सफलता नहीं मिल पाई है। ऐसे में वास्तविक स्थिति यह है कि सरकारी दस्तावेजों में प्लास्टिक के इस्तेमाल पर रोक के बावजूद व्यापक स्तर पर इसका इस्तेमाल हो रहा है। प्लास्टिक पर रोक लगाने वाले राज्यों में सिक्किम, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, त्रिपुरा, हिमाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, झारखंड, गोवा, कोलकाता, उत्तराखंड, जम्मू एवं कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, मध्यप्रदेश और बिहार शामिल हैं। इनके अतिरिक्त गुजरात, केरल, ओड़िशा और पश्चिम बंगाल में भी आंशिक रूप से प्लास्टिक के इस्तेमाल पर रोक लगाई गई है। जबकि तेलंगाना, असम, मेघालय, मणिपुर और मिजोरम में प्लास्टिक के इस्तेमाल पर अभी भी कोई रोक नहीं है।

हैरानी की बात तो यह है कि जिन राज्यों में प्लास्टिक के इस्तेमाल पर रोक लगाने की घोषणा कर दी गई है उन राज्यों में इस घोषणा पर अमल नहीं किया गया है। प्लास्टिक के इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगाने के लिए सबसे पहली जरूरत इसका विकल्प सामने लाने की थी। लेकिन राज्य सरकारों ने इसे पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। इसी का नतीजा है कि प्रतिबंध के बावजूद प्लास्टिक का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है। दूसरी बात यह कि लोगों को प्लास्टिक से होने वाले नुकसान के बारे में जागरूक नहीं किया गया, इसीलिए लोग बिना किसी डर के इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। प्लास्टिक के इस्तेमाल पर पूरी रोक के लिए उस प्लास्टिक पर भी गंभीरता से विचार किए जाने की जरूरत थी जो कई तरह के सामान की पैकिंग में उपयोग किया जाता है। इसमें दूध, मक्खन, तेल, घी, बिस्कुट, चिप्स, नमकीन, कुरकुरे और डिटर्जेंट पाउडर जैसे सामान हैं।

प्लास्टिक के इस्तेमाल को रोकने के लिए इस संबंध में बनाए गए कानूनों को भी प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया गया। इस कारण लोग बेरोकटोक इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। प्लास्टिक पर रोक के फैसले के समय विभिन्न राज्यों की सरकारों ने मौजूदा प्लास्टिक को नष्ट करने के लिए भी कोई योजना नहीं बनाई। प्लास्टिक ऐसा पदार्थ है जो मिट्टी में न घुलने के कारण भूमि में जाकर जल को भूमि में शोषित होने से रोकता है। इससे भूमि की उर्वरा-शक्ति कम होती है। प्लास्टिक को सही तरीके से नष्ट न किए जाने से प्लास्टिक में मौजूद रसायन भूमि में चले जाते हैं और मिट्टी तथा भूमिगत जल को विषैला कर देते हैं। प्लास्टिक का सही निपटान न होने से जल निकास प्रणाली में अवरोध पैदा हो जाते हैं और पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचता है। जल-जनित रोगों का यह भी एक बड़ा कारण है। प्लास्टिक को मिट्टी में घुलनशील बनाने के लिए इसमें मिलाए गए रासायनिक पदार्थ स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत खतरनाक होते हैं। प्लास्टिक के निर्माण में अल्प अस्थिर प्रकृति के अम्ल और

अल्कोहल के रूप में बने कार्बोनेट ऐस्टर नामक रसायन और कैडमियम व जस्ता जैसी विषैली धातुओं का इस्तेमाल खाद्य पदार्थों से मिल कर कैंसर के खतरे को बढ़ा देता है। कैडमियम के इस्तेमाल से उल्टियां, हृदय के आकार का बढ़ना और मस्तिष्क के ऊतकों का क्षरण जैसी समस्याएं हो सकती हैं। पॉलीऐथिलीन, पॉलीप्रोपीलीन और टेरेफ्थैलेट प्लास्टिक के विभिन्न रूप हैं जो सूक्ष्म कणों के रूप में वायु, जल और भोजन के साथ शरीर में प्रवेश करके प्रतिरोधी तंत्र को नुकसान पहुंचाते हैं। प्लास्टिक के इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगाने की दिशा में बहुत काम करने की जरूरत है। इसके लिए केंद्र सरकार को गंभीरता से विचार कर सुदृढ़ नीति व कारगर कार्ययोजना तैयार करनी होगी और कड़े कानून बना कर उन्हें प्रभावी ढंग से लागू करना होगा। सरकार को प्लास्टिक का आयात पूरी तरह बंद करके विभिन्न कंपनियों और पुनर्चक्रण-इकाइयों पर कड़ी नजर रखनी होगी।

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