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राजनीति: संकट में पेरिस समझौता

अमेरिका के भीतर भी पेरिस समझौते से अलग होने का विरोध हो रहा है। ट्रंप प्रशासन के इस फैसले के बावजूद अमेरिका के कई राज्य, शहर, उद्योग, संस्थाएं इस फैसले के खिलाफ लामबंद हो रहे हैं।

Author नई दिल्ली | Published on: November 12, 2019 1:54 AM
संयुक्त राष्ट्र के तहत यह समझौता सन 2015 में हुआ था।

एक दशक से जलवायु परिवर्तन का संकट बढ़ता ही जा रहा है। इसी कालखंड में इस समस्या पर पर्यावरण कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों ने सबसे ज्यादा चिंता जताई। दुनियाभर में जागरूकता अभियान चले। फिर भी ज्यादा कुछ हो नहीं पाया, बल्कि धरती का तापमान पहले से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ चला है। मौसम की चाल तेजी से बदलने लगी है। ग्लेशियर पिघलने लगे हैं। समुद्र का स्तर उठ रहा है। कई जीव-जंतु नई परिस्थितियों से तालमेल नहीं बैठा पाने की वजह से लुप्त होने की कगार पर हैं। सूझ नहीं रहा है कि सात सौ सत्तर करोड़ आबादी वाले ग्रह की आबोहवा और तापमान सुधारने के लिए एकमुश्त क्या किया जाए? हालांकि इस बीच जो कुछ सूझा था, उसे करने की जी-तोड़ कोशिश भी की गई। मसलन, विश्वस्तर पर एक पहल चार साल पहले की गई थी, जिसे पेरिस समझौता कहते हैं। लेकिन इस समझौते पर भी इस समय संकट है।

संयुक्त राष्ट्र के तहत यह समझौता सन 2015 में हुआ था। दुनिया के एक सौ छियानवे देशों ने पेरिस समझौते की शर्तों पर सहमति जताई थी। इसका मुख्य मकसद जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार कार्बन उत्सर्जन की एक सीमा तय करना था, ताकि पृथ्वी के बढ़ते तापमान को रोका जा सके। पेरिस समझौते का लक्ष्य था कि 2025 तक हर साल जलवायु परिवर्तन रोकने के काम के लिए सौ अरब डालर जुटाए जाएंगे। दुनिया में सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन करने वाले देशों की सूची में पहले दो नंबर पर आने वाले अमेरिका और चीन की इस समझौते में भागीदारी से इस करार की कामयाबी की काफी उम्मीदें बंधी थीं।

अमेरिका ने इस कोष के लिए तीन अरब डालर देने की पेशकश की थी। लेकिन सरकार बदलते ही अमेरिका ने पेरिस समझौते से खुद को अलग करने का फैसला कर लिया। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक जून, 2017 को एलान कर दिया की अमेरिका पेरिस समझौते में अपनी प्रतिभागिता खत्म कर देगा। इस फैसले का कारण यह बताया गया कि अमेरिका का हित प्रथम है। तर्क दिया गया कि इस समझौते में बंधने से घरेलू उद्योग कारखाने एक सीमा में बंध गए हैं। इससे उत्पादन और रोजगार बढ़ाने में दिक्कतें आ रही हैं। इसके अलावा, कोष के लिए तीन अरब डालर की मदद को भी नई सरकार ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर एक बोझ की तरह देखा।

पेरिस समझौते को विश्व बिरादरी की एक ऐतिहासिक पहल के तौर पर प्रचारित किया गया था। दुनिया के लगभग सभी देशों की भागीदारी और लंबे सोच-विचार के बाद समझौते का ढांचा बना था। पेरिस समझौते के अनुच्छेद-28 के तहत कोई भी देश समझौता लागू होने के तीन साल तक अपने आप को इससे अलग नहीं कर सकता था। और उन तीन साल के बाद अलग होने की प्रक्रिया की समय अवधि एक साल की है। इसलिए 2016 से प्रभाव में आए इस समझौते से अलग होने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए टंÑप सरकार को नवंबर, 2019 तक का इंतजार करना पड़ा।

पेरिस समझौता लागू होने के तीन साल पूरे होते ही चार नवंबर को अमेरिकी प्रशासन ने इस समझौते से अलग होने की औपचारिक प्रक्रिया शुरू कर दी। इस तरह चार नवंबर, 2020 को यह प्रक्रिया पूरी हो जाएगी और अमेरिका इस समझौते से खुद को अलग कर लेगा। उसके बाद अमेरिका पर कार्बन उत्सर्जन नियंत्रित रखने की कोई बंदिश नहीं होगी, और न ही अमेरिका को संयुक्त राष्ट्र के पास अपने यहां हुए कार्बन उत्सर्जन की मात्रा दर्ज करानी पड़ेगी।

यह मसला एक सौ छियानवे देशों में किसी एक देश के बाहर होने तक सीमित नहीं माना जाना चाहिए। दुनिया के सबसे ताकतवर देश के बाहर होने का असर दूसरे कई देशों पर पड़ना तय है। इस घटना को सिर्फ राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय राजनीति का मामला मानना भी समझदारी नहीं है। मसला पृथ्वी के भविष्य का है। सवाल यह है कि क्या अब वह गुंजाइश बची है कि कोई देश सिर्फ अपना हित देखे और खुद को वैश्विक खतरों से अलग रख सके? यह बात समझी जानी चाहिए कि इस समय विश्व के सामने जलवायु परिवर्तन से ज्यादा सार्वभौमिक क्या और कोई समस्या है?

बेशक अमेरिका हर क्षेत्र में बहुत ताकतवर है। लेकिन देर-सवेर उसे भी सोचना पड़ेगा कि पर्यावरण का मसला सिर्फ आर्थिक वृद्धि में रुकावट तक सीमित नहीं है। इस समझौते से अलग हो जाने से अंतरराष्ट्रीय समूह में उसकी पैठ कमजार पड़ सकती है। मसलन, ऐसा करके उसने चीन और यूरोपीय यूनियन को वैश्विक नेतृत्व का मौका दे दिया है। चीन इन दिनों जिस तरह से स्वच्छ ऊर्जा पर जोर दे रहा है, उसे देखते हुए आगे यह आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि वह इस मसले पर दुनिया का नेतृत्व करता नजर आने लगे।

बहरहाल, पूरी दुनिया में अमेरिका के इस कदम की आलोचना-समालोचना भी खूब हो रही है। अमेरिका के अंदर और दुनियाभर के जानकार ट्रंप के इस फैसले के पीछे के तर्क समझने में लगे हैं। एक बड़ा कारण यह समझा जा रहा है कि अमेरिका में फॉसिल फ्यूल इंडस्ट्री का वहां की राजनीति में बड़ा दबदबा है। इसी बीच, मीडिया में राष्ट्रपति ट्रंप, उपराष्ट्रपति पेन्स व अमेरिकी एनवायरनमेंटल प्रोटेक्शन एजेंसी के अध्यक्ष स्कॉट प्रुइट और पेट्रोकेमिकल उद्योग के बीच विशेष संबंधों का जिक्र सुनने में आता रहा है।

वैसे यह सभी जानते हैं कि पेरिस समझौते से अलग होने का सबसे ज्यादा फायदा कोयला, तेल, ऊर्जा आदि क्षेत्रों में लगीं अमेरिकी कंपनियों को होगा। बेशक एक राष्ट्र के रूप में अमेरिका के लिए यह मामला उसकी आर्थिक वृद्धि से जोड़कर दिखाया जा सकता है। अमेरिका ही क्या, बाकी दुनिया पर भी यह बात लागू है। लेकिन यह बात भी दोहराई जानी चाहिए कि जान है तो जहान है। जलवायु परिवर्तन से दुनिया की जान पर बन आई है। आर्थिक वृद्धि और विकास की बातें इसके सामने बहुत छोटी पड़ रही हैं। ऐसा भी नहीं है कि इस बात को खुद अमेरिका के अंदर ही बहुत सारे तबके न समझ रहे हों।

अमेरिका के भीतर भी पेरिस समझौते से अलग होने का विरोध हो रहा है। ट्रंप प्रशासन के इस फैसले के बावजूद अमेरिका के कई राज्य, शहर, उद्योग, संस्थाएं इस फैसले के खिलाफ लामबंद हो रहे हैं। ऐसी करीब तीन हजार आठ सौ इकाइयों का समूह बन चुका है जिसका नाम रखा गया है- ‘वी आर स्टिल इन’ यानी हम अभी भी समझौते में हैं। इन उद्योगों-प्रतिष्ठानों का इरादा अपने स्तर पर पेरिस समझौते के निर्देशों को लागू रखना है।

गौरतलब है कि अमेरिका की इन सभी इकाइयों का अमेरिकी सकल घरेलू उत्पाद में करीब सत्तर फीसद योगदान है। ये इकाइयां दो तिहाई अमेरिकी जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करती हैं। यह समूह इतना बड़ा है कि अगर वह एक अलग देश होता तो इसे विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था कहा जाता। अमेरिका में कई अलग शहरों के जनप्रतिनिधि और बड़ी कंपनियां अपने-अपने स्तर पर अपने क्षेत्रों में पेरिस समझौते को लागू रखने की तरफदार हैं। इसके पीछे कई कारण हैं।

खुद अमेरिका ही पिछले कुछ सालों में जलवायु परिवर्तन का शिकार बनने लगा है। चाहे वह कैलिफोर्निया के जंगलों की आग हो, मायामी में बढ़ता समुद्र का स्तर या ह्यूस्टन और पोर्टोरिको में भीषण तूफानों से हुई घरों और कारखानों की तबाही। ऐसी प्राकृतिक आपदाएं बढ़ने लगी हैं। वैज्ञानिक इसका सबसे बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन को बता रहे हैं। कुल मिलाकर समस्या की तीव्रता को लेकर कोई संशय नहीं है। न ही पेरिस समझौते की जरूरत को लेकर कोई विवाद था। लेकिन इधर इस समझौते पर संकट का मंडराना जरूर एक चिंता पैदा कर रहा है।

सुविज्ञा जैन

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