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राजनीति: मानसिक दबाव में जवान

अर्धसानिक बलों के जवान उचित खानपान न मिलने, छुट्टियां न मिलने जैसी शिकायतें सोशल मीडिया पर भी करते रहे हैं।

Author Updated: December 12, 2019 2:28 AM
झारखंड के सरायकेला में एक जवान ने अपने असिस्टेंट कमांडेट सहित छह जवानों को मार डाला था। हत्यारोपी जवान अवसाद से पीड़ित था। (फोटो-फिनेंशियल एक्सप्रेस)

कुछ दिन पहले नक्सल प्रभावित राज्य छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले में भारत तिब्बत सीमा पुलिस (आइटीबीपी) के एक जवान ने अपने ही छह साथी जवानों की गोली मार कर हत्या कर दी थी। दो दिन पहले झारखंड में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के जवानों में संघर्ष के दौरान गोलियां चलीं, जिसमें दो जवान मारे गए। ये घटनाएं विचलित करने वाली हैं। इन घटनाओं के कारण जो भी रहे हों, लेकिन इतना तय है कि हमारे अर्धसैनिक बलों की हालत अच्छी नहीं है। ये घटनाएं बता रही हैं कि सुरक्षा बलों के ज्यादातर जवान बुरी तरह अवसादग्रस्त और मानसिक दबाव में हैं, इसलिए इनके भीतर कहीं न कहीं गहरा असंतोष पनप रहा है। इसके कारण चाहे पारिवारिक हों अथवा विभागीय, लेकिन गौर करें तो साथी जवानों पर हमले और हत्याओं की घटनाएं नई बात नहीं हैं। कुछ साल पहले औरंगाबाद में केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआइएसएफ) के एक जवान ने अपने ही चार साथियों को गोलियों से उड़ा दिया था। इसी तरह झारखंड के सरायकेला में एक जवान ने अपने असिस्टेंट कमांडेट सहित छह जवानों को मार डाला था। हत्यारोपी जवान अवसाद से पीड़ित था।

आमतौर पर आत्महत्या की प्रवृत्ति उन जवानों में सर्वाधिक देखी जाती है जो सीमा पर पहरा देते हैं या जोखिम भरे क्षेत्रों में काम करते हैं। अक्सर इन कार्यों में जवानों को अपनी जान भी गंवानी पड़ती है। आंकड़ों पर गौर करें तो भारत-पाक सीमा पर गोलीबारी, आतंकवादी और उग्रवादी गतिविधियों के कारण पिछले तीन वर्षों में सुरक्षा बलों के तकरीबन चार सौ से अधिक जवानों ने जान गंवाई है। इनमें सबसे अधिक जवान सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के शहीद हुए हैं। इस बल ने 2015 से 2017 के दरम्यान एक सौ सड़सठ जवानों को खोया है। अपने साथी जवानों की शहादत को देख कर अन्य जवानों का विचलित होना स्वाभाविक है। मनोवैज्ञानिकों की मानें तो इनमें से कुछ जवान अवसाद में चले जाते हैं। गृह मंत्रालय ने एक रिपोर्ट में जवानों की आत्महत्या और अवसाद के कई कारण गिनाए थे, जिसकी वजह से पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न अर्ध सैनिक बलों के चार सौ से अधिक जवानों ने आत्महत्या की और साथ ही अपने साढ़े तीन दर्जन से अधिक साथियों को निशाना बनाया। ध्यान दें तो आत्महत्या और साथियों को निशाना बनाने के अलावा बड़ी संख्या जवान नौकरी भी छोड़ रहे हैं। इसका मतलब साफ है कि जवान अपनी नौकरी की सेवा शर्तों को लेकर बहुत संतुष्ट नहीं हैं।

आमतौर पर अर्धसैनिक बलों के उच्चाधिकारी यह दलील देते हैं कि जवानों में आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति का मूल कारण उनका पारिवारिक तनाव है, न कि नौकरी के दौरान उपजने वाला मानसिक दबाव। इसमें कोई दो राय नहीं कि जवानों के आत्महत्या करने और नौकरी छोड़ने के पीछे पारिवारिक तनाव बड़ा कारण है। लेकिन दूसरे कारण भी हैं जो जवानों को विचलित करते रहते हैं। सच तो यह है कि नौकरी की कठिन सेवा शर्तें भी जवानों की परेशानी और आत्महत्या की बड़ी वजह है। कुछ वर्षों से सेना द्वारा नौकरी की सेवा-शर्ते एवं वेतन में व्याप्त विसंगतियों को लेकर सवाल उठाया जाता रहा है। कठिन सेवा शर्तें कई किस्म की परेशानियां खड़ी कर रही हैं।

केवल सीआरपीएफ की ही बात करें तो अस्सी प्रतिशत जवानों को पिछले दो दशक से एक जगह पर स्थायी रूप से नियुक्ति नहीं मिल पाई है और वे समय-समय पर मिलने वाली प्रोन्नति से भी वंचित हैं। सच कहें तो उनका जीवन खानाबदोशों की तरह हो गया है। सरकार को समझना होगा कि वे भी समाज का हिस्सा हैं और उन्हें भी मानवीय संवेदनाएं प्रभावित करती हैं। उनके मन में भी अपने परिवार के साथ रहने की इच्छा होती है। माना कि उनके कंधे पर देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी है और उन्हें अपने कार्यों को अंजाम देना चाहिए। यह भी सही है कि उन्हें उपद्रवग्रस्त क्षेत्रों से लेकर दुर्गम क्षेत्रों में भेजा जाना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन सरकार और सेना के उच्च अधिकारियों की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे जवानों की भावनाओं का ख्याल रखें और उन्हें उचित पोषण के अलावा जरूरत पड़ने पर छुट्टियां दें, ताकि वे सामाजिक समारोहों में शामिल हो सकें।

अगर उन्हें समय-समय पर छुट्टियां मिलती रहें तो वे अवसाद में जाने से बचेंगे। दूसरी महत्त्वपूर्ण बात ये है कि जवानों को आधुनिक संसाधनों से लैस किया जाना बेहद आवश्यक है, क्योंकि उन्हें लंबी दूरी तक पैदल चलना, प्रतिकूल जमीनी हालात से समझौता करना, बेहद नमी और गर्म जलवायु में सामंजस्य स्थापित करना होता है। उन्हें विषम परिस्थितियों में भोजन और पानी के बिना भी कई-कई दिनों तक रहना पड़ता है। घने जंगल और पथरीले रास्तों के बीच जानलेवा मच्छरों और अन्य कीटों की मौजूदगी उनकी जान पर बन आती है।

हालांकि सरकार ने पिछले कुछ समय में जवानों की इन समस्याओं पर गौर किया है और कुछ कदम उठाए भी हैं। जैसे जवानों में व्याप्त मानसिक तनाव दूर करने के लिए ‘सहयोग और मिलाप’ जैसे कार्यक्रम शुरू किए गए हैं। इसके सार्थक परिणाम देखने को मिल रहे हैं। इस पहल से जवानों में आत्महत्या करने और सहकर्मियों को निशाना बनाने की प्रवृत्ति में कमी आने के संकेत मिल रहे हैं। सरकारी आंकड़ें बताते हैं कि 2016 में सेना में आत्महत्या के संदिग्ध मामलों की संख्या एक सौ चार थी, जो 2017 में घट कर पचहत्तर और 2018 में अस्सी तक आ गई थी। इसी अवधि में सेना में भी सहकर्मियों की हत्या के मामलों में भी काफी कमी आई है। आंकड़ों पर गौर करें तो इस अवधि में यह संख्या क्रमश: दो, एक और एक थी।

इसी तरह 2016 में नौसेना में आत्महत्या के संदिग्ध मामलों की संख्या छह थी, जो 2017 में पांच और 2018 में आठ दर्ज की गई। अच्छी बात यह रही कि इस अवधि में नौसेना में सहकर्मियों की हत्या का कोई मामला सामने नहीं आया। वायुसेना की बात करें तो 2016 में आत्महत्या के संदिग्ध मामलों की संख्या उन्नीस थी, जो 2017 में इक्कीस और 2018 में सौलह दर्ज की गई। 2016 में वायुसेना में सहकर्मियों की हत्या का केवल एक मामला सामने आया, जबकि 2017 और 2018 में ऐसा एक भी मामला देखने को नहीं मिला। अब जब सरकार जवानों में हत्या-आत्महत्या जैसी प्रवृत्ति को रोकने के लिए उन्हें मनोवैज्ञानिक सलाहकारों की मदद दे रही है तो नि:संदेह उनके स्वभाव में बदलाव आएगा। अकसर देखा-सुना जाता था कि जवान कपड़े और भोजन को लेकर नाराजगी जताते थे। लेकिन अब अच्छी बात यह है जवानों को पहले के बजाए अब बेहतर कपड़े, गुणवत्तापरक भोजन, विवाहितों के लिए आवास और यात्रा जैसी कई सुविधाएं दी जा रही हैं, ताकि उनमें किसी तरह का अवसाद न पनपे।

अर्धसानिक बलों के जवान उचित खानपान न मिलने, छुट्टियां न मिलने जैसी शिकायतें सोशल मीडिया पर भी करते रहे हैं। जवानों की इस प्रवृत्ति देश व समाज में गलत संदेश जा रहा था। गौर करें तो अभी गत वर्ष पहले देखने-सुनने को मिला था कि सीमा सुरक्षा बल के एक जवान ने खराब खाने को लेकर अपना वीडियो जारी किया, वहीं सीआरपीएफ का एक जवान एक वीडियो में अद्धर्सैनिक बल के जवानों को सेना के बराबर वेतन और अन्य सुविधाओं देने की मांग कर रहा था। हालांकि अब सरकार ने देर से ही सही, पर जवानों की सुध ली है और कुछ इस तरह का वातारवरण निर्मित कर रही है जिससे कि जवान आत्महत्या जैसे कदम न उठाएं और न ही अवसादग्रस्त होकर अन्य साथियों को निशाना बनाएं।

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