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राजनीति: सवालों में महिला सशक्तिकरण

किसी भी समाज का विकास उस समाज की महिलाओं के विकास से जुड़ा होता है। जिन उद्योगों में महिलाओं को निर्णय लेने की स्वतंत्रता होती है वहां उनका प्रदर्शन बेहतर होता है और स्थिरता ज्यादा रहती है। अत: ग्राम सभा और ग्राम पंचायत में महिलाओं को अपने विचार प्रस्तुत करने के लिए प्रोत्साहन की आवश्यकता है।

Author April 26, 2019 1:12 AM
रक्षाबंधन के मौके पर महिलाओं से राखी बंधवाते पीएम मोदी।

दीपक गिरकर

किसी भी समय और किसी भी परिस्थिति में परिवार, समाज और देश में महिलाओं के योगदान को कम नहीं आंका जा सकता है। हर युग में महिलाओं ने समाज को एक नई दिशा प्रदान की है। स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की व्यापक भागीदारी रही थी। महात्मा गांधी यह जान गए थे कि जब तक स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाएं नहीं उतरेंगी तब तक देश आजाद नहीं होगा। गांधी जी ने कस्तूरबा के माध्यम से चंपारण आंदोलन में महिलाओं को शामिल किया था। चंपारण आंदोलन में महिलाओं की सीधी भागीदारी कम रही थी, लेकिन परोक्ष रूप में उनकी प्रेरणा ने स्वतंत्रता आंदोलन को एक नई ऊर्जा प्रदान की थी। असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन में भी महिलाओं ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। महिलाओं की सहभागिता की वजह से ही स्वतंत्रता आंदोलन में सफलता मिली थी।

सन 2011 की जनगणना के अनुसार देश की तिरासी करोड़ आबादी गांवों में रहती है। इसमें तकरीबन चालीस करोड़ से ज्यादा महिलाएं हैं। खेती-किसानी का सत्तर फीसद काम महिलाएं ही करती हैं। जब पुरुष रोजगार के लिए शहर चले जाते हैं तो खेती-किसानी का सारा काम महिलाएं ही करती हैं। खेती-किसानी में महिलाओं को मजदूर का दर्जा हासिल है, किसान का नहीं। कृषि भूमि का मालिकाना हक अधिकतर पुरुष किसानों के नाम से है। देश की आधी आबादी देश के सबसे बड़े क्षेत्र कृषि में हाशिये पर है। ग्रामीण महिलाएं भारतीय समाज का एक उपेक्षित वर्ग है। भारतीय कानून के अनुसार जो व्यक्ति अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है, वह किसान है। इस कानून के अनुसार कृषि मजदूर, ग्रामीण महिलाएं, दूध-डेयरी व कृषि से संबद्ध सभी गतिविधियों जैसे- बागवानी और चाय बागानों में मजदूरी करने वाले किसान ही हैं। लेकिन किसानों के कल्याण के लिए जो सरकारी योजनाएं हैं, उनका फायदा इन भूमिहीन लोगों को नहीं मिलता है। ये भूमिहीन महिलाएं यदि गर्भवती हों तब भी पूरे समय तक खेतों में काम करती रहती हैं। इन्हें मातृत्व अवकाश की सुविधा नहीं है। हमारे देश की एक बहुत बड़ी विडंबना है कि कृषि भूमि खरीदने के लिए व्यक्ति का किसान होना जरूरी नहीं है।

जिस प्रकार विपरीत मौसम में सैनिक देश की रक्षा करते हैं, उसी तरह ग्रामीण महिलाएं विपरीत मौसम में भी खेती-किसानी के काम में लगी रहती हैं। अन्नदाता पुरुष किसान नहीं, बल्कि महिला किसान हैं। कृषि में महिलाओं के योगदान पर न तो सरकार और न ही किसान संगठन ध्यान देते हैं। किसान का मतलब पुरुष किसान होने से ही समझा जाता है। खेती-किसानी के सारे निर्णय जैसे कौन-सी फसल की खेती करनी है, कौन-सा बीज बोना है, खाद, उर्वरक, खेती करने की प्रक्रिया, खेती के लिए कर्ज कितना और कहां से लेना है, इन सबका फैसला पुरुष ही करते हैं। यदि खेती-किसानी से संबंधित सारे निर्णय लेने में महिलाओं का भी योगदान हो तो किसानों की आत्महत्याएं कुछ हद तक कम हो सकती हैं और साथ ही किसान पुरुष के न रहने पर वह आसानी से सारे निर्णय ले सकेगी और अपना व परिवार का भरण-पोषण कर सकेगी।

महिला आंदोलन और महिला सशक्तिकरण की बातें उच्च और मध्यम वर्ग की शहरी महिलाओं तक सीमित हैं। ग्रामीण महिलाएं सम्मान और अपने अधिकारों से वंचित हैं। यह धारणा बिलकुल गलत है कि ग्रामीण महिलाएं कोई जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार नहीं हैं या उनमें निर्णय लेने की क्षमता का अभाव होता है। ग्रामीण क्षेत्र की तस्वीर बदलने के लिए ग्रामीण महिला सशक्तिकरण पर समग्र प्रयासों की जरूरत है। किसी भी समाज का विकास उस समाज की महिलाओं के विकास से जुड़ा होता है। ग्रामीण महिला सशक्तिकरण में बहुत सारी चुनौतियां हैं। इनमें शिक्षा एवं व्यावसायिक कौशल का अभाव, सुरक्षा का अभाव, सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित, समान कार्य के लिए पुरुषों से कम मजदूरी भुगतान, निर्णय लेने के अधिकार से वंचित, परिवार व समाज में उचित सम्मान न मिलना जैसी चुनौतियां प्रमुख हैं। शिक्षा या विशिष्ट कौशल के अभाव में अधिकतर ग्रामीण महिलाएं कृषि, कृषि से संबद्ध गतिविधियों और घरेलू कार्य में कार्यरत हैं।

देश के ग्रामीण विकास में तकनीक और प्रौद्योगिकी की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। ग्रामीण महिलाओं के सबलीकरण के लिए और उन्हें आर्थिक तौर पर मजबूती प्रदान करने के लिए विभिन्न प्रकार की तकनीकों का विकास हुआ है। लेकिन इनका ज्यादा प्रचार-प्रसार नहीं होने से ग्रामीण महिलाओं में इन जानकारियों का अभाव होता है। कहने को सरकार द्वारा ग्रामीण महिलाओं के उत्थान के लिए प्रयास काफी किए गए। बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ योजना, बालिका सुकन्या समृद्धि योजना, उज्ज्वला योजना, राष्ट्रीय ग्रामीण जीविकोपार्जन मिशन, राष्ट्रीय मातृत्व योजना, महिला ई हॉट जैसी योजनाएं चल रही हैं, लेकिन शिक्षा की कमी, ग्रामीण समाज में पुरुषों का वर्चस्व और इन योजनाओं का उचित क्रियान्वयन नहीं होने से महिलाओं की दशा में खास परिवर्तन नहीं हुआ है। ग्राम पंचायतों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित कर दी गई हैं। महिलाएं पंच और सरपंच बन भी जाती हैं, लेकिन वे सिर्फ नाममात्र की पंच या सरपंच होती हैं। अधिकांश पंचायतों में जहां महिला पंच या सरपंच हैं उनके पति ही पंचायत का सारा कार्य संभालते और नियंत्रण रखते हैं। पंचायती राज संस्थानों में निर्वाचित प्रतिनिधियों को प्रशिक्षण दिए जाने का दायित्व राज्य सरकारों का है, लेकिन प्रत्यक्ष में प्रशिक्षण के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति की जाती है। इसीलिए अनेक कल्याणकारी योजनाओं और बड़े पैमाने पर नीतिगत सुधारों के बावजूद ग्रामीण महिलाओं को अधिकार और सम्मान नहीं मिला है।

आर्थिक उदारीकरण के दौर में अंधाधुंध तरीके से प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जे का दौर चल रहा है। आज बहुत से इलाकों में जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए महिलाएं संघर्षरत हैं। चिपको आंदोलन में भी ग्रामीण और आदिवासी महिलाओं की भूमिका अहम रही थी। वर्ष 2017 में किसान मुक्ति यात्राओं और किसान मुक्ति संसद के आयोजन में महिला किसानों ने भाग लिया था। लेकिन इन आंदोलनों में ग्रामीण महिलाओं की संख्या बहुत ही कम थी, वे सिर्फ मूक दर्शक के रूप में शामिल हुई थीं। देश के कुछ हिस्सों में ग्रामीण महिलाओं के आंदोलन के कारण ही शराबबंदी लागू हुई है। ऐसे में पुरुषों को समझना होगा कि जब तक उनके घर की महिलाएं सशक्त नहीं होंगी और उनके हर निर्णय में सहभागी नहीं बनेंगी तब तक किसान आंदोलन हमेशा की तरह असफल होते रहेंगे।

किसी भी समाज का विकास उस समाज की महिलाओं के विकास से जुड़ा होता है। जिन उद्योगों में महिलाओं को निर्णय लेने की स्वतंत्रता होती है वहां उनका प्रदर्शन बेहतर होता है और स्थिरता ज्यादा रहती है। अत: ग्राम सभा और ग्राम पंचायत में महिलाओं को अपने विचार प्रस्तुत करने के लिए प्रोत्साहन की आवश्यकता है। ग्रामीण महिलाओं में जागरूकता के लिए हर गांव में एक पुस्तकालय का होना जरूरी है, ग्राम सभा की नियमित बैठकें और उनमें विचार-विमर्श होना आवश्यक है। ग्रामीण महिला सशक्तिकरण तभी संभव है जब गांवों में महिलाओं के प्रति सोच में बदलाव होगा और उनके साथ उचित सम्मान और समानता का व्यवहार किया जाएगा। महिलाओं को आर्थिक मुद्दों पर अपनी सलाह देने व निर्णय लेने का अधिकार देने से ग्रामीण महिलाएं सशक्त हो सकेंगी। इसके लिए ग्रामीण युवा बालिकाओं को शिक्षा, तकनीकी ज्ञान और रोजगार कौशल से लैस करके ग्रामीण महिलाओं को सशक्त किया जा सकता है और देश के गांवों की तस्वीर बदली जा सकती है।

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