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राजनीति: रोजगार से दूर होती महिलाएं

भारत में एक तिहाई कंपनियां तो ऐसी हैं जहां कोई भी महिला कार्यरत नहीं है, जबकि इकहत्तर फीसद कंपनियों में महिलाओं की संख्या मात्र दस फीसद से भी कम है। महज चौबीस फीसद कंपनियां ऐसी हैं जहां महिलाओं और पुरुषों को बराबर का अधिकार दिया गया है। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हो जाती। अगर महिलाएं नौकरी में हैं भी, तो उनके सामने वे तमाम बाधाएं हैं जिनके चलते या तो वे खुद नौकरी छोड़ देती हैं या फिर निकाल दी जाती हैं। यह स्थिति कमोबेश दुनियाभर में एक जैसी है।

Author Published on: October 18, 2019 1:14 AM
समाज और परिवार द्वारा निरंतर यह छवि गढ़ी जाती है कि महिलाएं स्वयं काम नहीं करना चाहतीं।

देश में समान योग्यता रखने के बावजूद महिलाओं की बेरोजगारी दर पुरुषों के मुकाबले दोगुनी है। यह खुलासा ‘भारत में नियुक्ति में लैंगिक भेदभाव’ नामक शोध में हुआ है। इसके मुताबिक शहरों में काम करने वाली योग्य शिक्षित महिलाओं में सत्तासी फीसद बेरोजगार हैं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा मात्र चार फीसद है, जिनके पास काम नहीं है। ‘फीमेल लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट (एलएफपीआर) 2017-18’ की रिपोर्ट भी इस हकीकत को पुष्ट करती है। यह रिपोर्ट बताती है कि पिछले साल भारत में महिलाओं की रोजगार में शामिल होने की दर 23.3 फीसद के निचले स्तर पर थी।

2011-12 में पंद्रह से उनतीस वर्ष की कामकाजी महिलाओं की रोजगार में शमिल होने की दर में आठ फीसद की गिरावट हुई थी, जो 2017-18 में 16.4 फीसद हो गई। इसी तरह तीस से पचास वर्ष की महिलाओं में रोजगार की दर में सात फीसद की गिरावट देखने को मिली थी। स्पष्ट है कि तीस से पचास वर्ष की कामकाजी महिलाओं में तीन में से दो काम नहीं कर रही हैं। इनमें से ज्यादातर का कहना है कि वे गृहस्थी की जिम्मेदारियां निभा रही हैं।

लेकिन क्या परिवार का दायित्व ही महिलाओं की प्राथमिकता है, या फिर वे भी बाहर जाकर काम करना चाहती हैं। समाज और परिवार द्वारा निरंतर यह छवि गढ़ी जाती है कि महिलाएं स्वयं काम नहीं करना चाहतीं। लेकिन वास्तविकता इससे अलग है। जनगणना के आंकडेÞ बताते हैं कि यदि महिलाओं के लिए रोजगार के रास्ते खुले हों तो घर में रहने वाली एक-तिहाई महिलाएं काम करना चाहेंगी। दरअसल, भारत ही नहीं विश्वभर में महिलाओं का संघर्ष दो तरफा है।

एक ओर परिवार और दूसरी ओर रोजगार देने वाली सस्थाएं हैं जो उन्हें काम पर रखने की इच्छुक नहीं होतीं। भारत में सामाजिक मानक महिलाओं को लेकर आश्चर्यजनक रूप से रूढ़िवादी हैं। 2012 में हुए एक शोध में चौरासी फीसद भारतीयों ने इस बात पर सहमति जताई थी कि यदि रोजगार कम हो तो महिलाओं के बजाय पुरुषों को काम करने का अधिक अधिकार है। यह सोच हैरान नहीं करती क्योंकि आर्थिक स्वावलंबन पर आज भी पुरुषों का आधिपत्य माना जाता है और यह स्वीकारोक्ति घर और बाहर दोनों ही जगह है। यही कारण है कि पुरुष को नौकरी करने के लिए किसी से अनुमति नहीं लेनी पड़ती, जबकि लड़कियों और महिलाओं को काम करने, रोजगार योग्य नए कौशल सीखने के लिए अपने पिता, भाई या पति से अनुमति लेनी पड़ती है।

यह चिंताजनक विषय है कि समान शैक्षणिक स्तर और काबिलियत होने पर भी महिलाओं के पास रोजगार नहीं है। यह सवाल पैदा होना भी स्वभाविक है कि पिछले कुछ दशकों में जब शिक्षा तक महिलाओं की पहुंच बढ़ी है तो उनके पास रोजगार क्यों नहीं है। अध्ययन बताते हैं कि करीब अठहत्तर फीसद पात्र स्नातक महिलाएं संगठित कार्यबल का हिस्सा नहीं बनती हैं। ये वे महिलाएं हैं जो केवल सामाजिक कारणों से अपनी पढ़ाई पूरी करती हैं, न कि संगठित कार्यबल में भागीदार बनने की इच्छा के कारण। ये ‘इच्छा’ उस समाजीकरण की परिणति है जो स्त्री को यह विश्वास दिलाती है कि उसका जन्म परिवार की देखभाल के लिए ही हुआ है और पुरुष का कर्तव्य घर के लिए पैसे कमाना है।

यह तथ्य ही इस हकीकत को सत्यापित करने के लिए काफी है कि देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान भारतीय प्रबंधन संस्थान (आइआइएम) अमदाबाद की लगभग पचास फीसद स्नातक लड़कियां काम नहीं कर रही हैं। उन्होंने अपनी प्रतिभा को दरकिनार करते हुए परिवार को प्राथमिकता दी। ‘स्त्रियां होती ही ऐसी हैं, उनके लिए स्वयं की इच्छा कोई मायने नहीं रखती, अगर कुछ उनके लिए महत्त्वपूर्ण है तो घर-परिवार’, निरंतर दोहराए गए ये वाक्य महिलाओं के इर्द-गिर्द सम्मोहन का ऐसा मायाजाल सदियों से बनाते आ रहे हैं कि वे स्वयं ही यह विश्वास करने लगती हैं कि उनका पहला और आखिरी दायित्व परिवार की देखभाल ही है। परिवार और बच्चों को संभालने का दबाव महिलाओं पर निरंतर बनाया जाता है।

अगर महिलाएं उस दबाव का सामना करते हुए कार्यस्थल की राह चुनती हैं तो वहां भी उन्हें उसी असहयोगात्मक व्यवहार का सामना करना पड़ता है जो उन्हें अपने परिवार से मिलता है। कार्यस्थल पर उनके किए हर कार्य को संशय से देखा जाता है। अगर वे किसी कार्य में असफल हो जाएं तो उसे मानवीय भूल न मान कर ‘स्त्री होने के कारण प्राप्त असफलता’ की तथाकथित अवधारणा से जोड़ कर देखा जाता है। घर से लेकर कार्यस्थल पर निरंतर कसी जाने वाली कसौटी के चलते अधिकांश महिलाएं स्वयं ही अपनी आर्थिक आत्मनिर्भरता के स्वप्न को तिलांजलि दे देती हैं।

हाल ही में हुए नेशनल सैंपल सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक तकनीकी प्रशिक्षण पाने के बाद रोजगार पाने में महिलाएं पुरुषों की तुलना में काफी पीछे हैं। आंकड़े बताते हैं कि तकनीकी प्रशिक्षण पाने वालों में करीब सत्तर फीसद युवक और अड़तीस फीसद महिलाओं को ही रोजगार मिल पाता है। ऐसा इसलिए होता है कि कंपनियां ही महिलाओं को काम पर रखना नहीं चाहतीं। भारत में एक तिहाई कंपनियां तो ऐसी हैं जहां कोई भी महिला कार्यरत नहीं है, जबकि इकहत्तर फीसद कंपनियों में महिलाओं की संख्या मात्र दस फीसद से भी कम है। महज चौबीस फीसद कंपनियां ऐसी हैं जहां महिलाओं और पुरुषों को बराबर का अधिकार दिया गया है। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हो जाती। अगर महिलाएं नौकरी में हैं भी, तो उनके सामने वे तमाम बाधाएं हैं जिनके चलते या तो वे खुद नौकरी छोड़ देती हैं या फिर निकाल दी जाती हैं। यह स्थिति कमोबेश दुनियाभर में एक जैसी है।

पिछले साल अक्तूबर में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) ने बताया था कि ‘स्वचालन’ जैसी नई प्रौद्योगिकियों ने वैश्विक स्तर पर महिलाओं से जुड़ी लगभग अठारह करोड़ नौकरियों को खतरे में डाल दिया है। ‘हाई पोटेंशियल अंडर हाई प्रेशर इन इंडिया टेक्नोलॉजी सेक्टर’ की रिपोर्ट बताती है कि भारत में उच्च क्षमता वाले पुरुष और महिलाएं एक समान स्तर पर शुरू करते हैं, लेकिन समय के साथ महिलाओं के लिए लिंगभेद उभर रहा है। जो कम कमाती हैं, कम विकास के अवसर प्राप्त करती हैं, जो प्रगति के लिए आगे बढ़ती हैं और पुरुषों की तुलना में घर पर अधिक जिम्मेदारियों का सामना करती हैं, उन्हें पीछे धकेल दिया जाता है। महिलाओं का मां बनना कंपनियों को नुकसान का सौदा दिखाई पड़ता है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि जब महिलाओं ने अपनी गर्भावस्था का जिक्र अपने मैनेजर या सहकर्मियों से किया तो उन्होंने पाया कि उन्हें कैरियर में प्रोत्साहन दिए जाने की दर में कमी आई।

बंगलुरु में नई कंपनियों और छोटी कंपनियों के सर्वे में यह बात सामने आई कि छियालीस फीसद कंपनियों ने पिछले डेढ़ साल में ज्यादातर पुरुष कर्मियों की ही बहाली की। वहीं इसी तरह के एक अध्ययन में इस बात का खुलासा हुआ कि 2004-05 से 2011-12 के दौरान अट्ठाईस लाख महिलाओं को नौकरी से निकाल दिया गया। संशोधित मातृत्व लाभ अधिनियम के बाद एक साल में ही ग्यारह से अठारह लाख महिलाओं की नौकरी चली गई।

यह तय है कि जब तक महिलाओं पर परिवार और नौकरी में से किसी एक को चुनने का दबाव रहेगा, तब तक महिलाएं नौकरियों से दूर होती रहेंगी। आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन का सुझाव है कि बच्चों की देखभाल के लिए दी जाने वाली मदद से महिलाओं के कामकाजी होने की संभावना बढ़ जाएगी। एसोचैम के सुझावों के मुताबिक श्रमबल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए विशेष रोजगार कौशल प्रशिक्षण, छोटे शहरों में रोजगार के अवसर, बच्चों और बुजुर्गों की देखरेख के लिए केयर सेंटर, सुरक्षित कार्यस्थल जैसे प्रयास बढ़ाने होंगे। सरकारी स्तर पर प्रयास तो अपरिहार्य हैं ही, पर उससे भी अधिक उस सोच में बदलाव की आवश्यकता है जो स्त्री का दायरा घर की चारदीवारी तक सीमित रखना चाहती है।

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