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राजनीति: कब थमेगी खेतिहर की खुदकुशी

कृषि की बदतर हालत के कारण किसान अपने बच्चों को खेती के बजाय कोई नौकरी करने की सलाह देते हैं।

Author Updated: November 15, 2019 2:33 AM
पारंपरिक क्षेत्रों में चावल की खेती और अधिक बढ़ानी होगी।

केंद्र सरकार के कृषि विकास व किसानों की आमदनी दो गुना करने के तमाम दावों के बावजूद किसानों की आत्महत्याओं का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की ताजा रिपोर्ट ने एक बार फिर निराशाजनक आंकड़े पेश किए हैं। इसके मुताबिक 2016 में 11,379 किसानों ने खुदकुशी की है हालांकि ‘एक्सीडेंटल डेथ एंड सुसाइड इन इंडिया’ शीर्षक से प्रकाशित इस रिपोर्ट में 2015 में 12,602 आत्महत्याओं के मुकाबले 2016 में खुदकुशी के कुल मामलों में कमी आई है। 2015 में प्रति एक लाख आबादी पर आत्महत्या की दर 10.6 थी जो 2016 में घटकर 10.3 प्रति एक लाख आबादी पर आ गई।

हालांकि राष्ट्रीय दर 10.3 के मुकाबले 2016 में शहरों में खुदकुशी की दर 13.0 दर्ज की गई। रिपोर्ट के मुताबिक औसत निकालने पर पता चलता है कि हर दिन 31 से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की। किसान आत्महत्या के मामले में महाराष्ट्र लगातार पहले स्थान पर बना हुआ है। 2016 में खेतिहर मजदूरों, भूस्वामियों और काश्तकारों द्वारा की गई 11,379 आत्महत्याओं में से 3,661 आत्महत्याएं महाराष्ट्र में हुई थीं। इससे पहले 2014 में यहां 4,004 और 2015 में 4,291 किसानों ने आत्महत्या की थी।

एक ऐसा देश जो दुनिया की सातवीं बड़ी अर्थव्यवस्था है, वहां हजारों की संख्या में किसानों का हर साल मरना बेहद अफसोसनाक है। ये आंकड़े तब और भयावह लगते हैं जब पता चलता है कि औसतन हर 46 मिनट में हमारे देश में कहीं न कहीं एक किसान आत्महत्या करता है। सवाल है कि सरकार की कृषि क्षेत्र की गुलाबी तस्वीर पेश करने की तमाम कोशिशों के बावजूद किसानों की खुदकुशी रुकने का नाम क्यों नहीं ले रही है? किसान-आत्महत्या की यह तस्वीर कहीं सरकार की दोषपूर्ण नीतियों का नतीजा तो नहीं?

कहने की जरूरत नहीं कि किसानों की आत्महत्याओं का सिलसिला हमारे नीति-निर्माताओं की दोषपूर्ण आर्थिक नीतियों का ही नतीजा है। ऐसी नीतियां जिनसे गरीब और गरीब हो रहे हैं और अमीर और अमीर। खास तौर से कृषि को व्यवस्थित तौर पर आर्थिक रूप से अलाभप्रद बनाया गया है जिसके कारण किसान कर्ज के जाल में फंसते चले जाते हैं। इसी का नतीजा है कि आजादी के समय जहां सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान पचास फीसद से ज्यादा था वहीं मौजूदा दौर में यह बीस फीसद भी नहीं रहा है। जरा सोचिए, क्या कारण है कि एक किसान मंडी में टमाटर 50 पैसे प्रति किलोग्राम बेचने जाता है, लेकिन खरीदार 25 पैसे प्रति किलोग्राम देने के लिए कहता है और वह किसान एक ट्रैक्टर टमाटर को जमीन पर रौंद कर चला जाता है? उस किसान को 25 पैसे प्रति किलोग्राम बेचने के बजाय टमाटर को जमीन पर फेंकना बेहतर लगता है।

हालांकि इस साल एनसीआरबी ने किसानों की आत्महत्या के कारणों का जिक्र अपनी रिपोर्ट में नहीं किया है लेकिन 2015 की रिपोर्ट का हवाला दें तो सबसे ज्यादा आत्महत्या कर्ज में डूबने के कारण ही हुई थीं और वे कर्ज सरकारी बैंकों के थे न कि साहूकारों के। 2015 की रिपोर्ट ने बताया कि 2014 के 1,163 आत्महत्याओं के मुकाबले 2015 में तीन हजार 97 किसानों की आत्महत्याओं का कारण ऋणग्रस्तता रही थी। यानी एक ही साल में इस संख्या में तीन गुना वृद्धि हुई। कृषि-उपज से संबंधित आत्महत्या के आंकड़े भी चौंकाने वाले थे। फसलों के बर्बाद होने से जहां 2014 में 969 किसानों ने आत्महत्या की वहीं 2015 में एक हजार 562 ने।

ये आंकड़े चौंकाने वाले इसलिए हैं कि सरकार ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना और किसानों की आय दो गुनी करने की सिर्फ घोषणा ही नहीं की बल्कि इसका फायदा किसानों को मिल रहा है इसका दावा भी किया जा रहा है। लेकिन आत्महत्या की प्रवृत्ति में वृद्धि ने इस सरकारी दावा को धता बता दिया है। इतना ही नहीं, राज्य सरकार ने तो महाराष्ट्र के किसानों की आय दो गुनी होने के आंकड़े भी जारी कर दिए थे जबकि एनसीआरबी ने सबसे ज्यादा आत्महत्या की घटनाओं को महाराष्ट्र से ही उजागर किया है। रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2015 में जिन 4,291 किसानों ने महाराष्ट्र भर में अपनी जान गंवाई उनमें से एक हजार 293 मामले तो ऋणग्रस्तता के थे।

इसी क्रम में राज्यवार आंकड़ों पर गौर करें तो महाराष्ट्र के बाद कर्नाटक दूसरे और मध्यप्रदेश तीसरे स्थान पर है। यह रिपोर्ट कुछ राज्यों के लिए राहत भरी खबर लेकर भी आई है। बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल आदि कुछ ऐसे खुशकिस्मत राज्य हैं जहां किसान आत्महत्या का एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ जबकि इनमें बिहार और झारखंड गरीब राज्यों की श्रेणी में आते हैं। इतना ही नहीं, बिहार प्रति व्यक्ति आय में सबसे निचले पायदान पर है। इसलिए यह पता लगाना बेहद जरूरी है कि ऐसे कौन से कारक हैं जिन्होंने यहां के किसानों के सब्र का बांध टूटने नहीं दिया!

गरीबी और बीमारी भी किसानों की आत्महत्या की अहम वजह हैं। ये दोनों ही कारण घटती आय से सीधे जुड़ते हैं। गरीबी के कारण लोग इलाज के लिए ऋण लेते हैं और निम्न आय के कारण ऋण चुका नहीं पाते। नतीजतन, ब्याज बढ़ते रहने के कारण कर्ज एक पहाड़ की मानिंद बढ़ता रहता है जिसके बोझ को किसान सह नहीं पाते। खाद्यान्न उत्पादन में सबसे अग्रणी राज्य पंजाब की बात करें तो एक अध्ययन के अनुसार वहां के करीब 95 प्रतिशत ग्रामीण परिवार कर्ज में डूबे हैं जबकि 96 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों की आय खर्च की तुलना में कम है। सवाल है कि यह कौन सी ऐसी आर्थिक नीति है जिसमें किसी स्थान विशेष की लगभग पूरी ही आबादी इस प्रकार का दयनीय जीवन व्यतीत करने को विवश है? यह भविष्य के किसी भयावह तूफान की आहट तो नहीं?

कृषि की बदतर हालत के कारण किसान अपने बच्चों को खेती के बजाय कोई नौकरी करने की सलाह देते हैं और यही कारण है कि एक बड़ी आबादी गांवों से शहर की ओर लगातार पलायन कर रही है। यह तस्वीर भारत के भविष्य के लिए खतरे की घंटी है, क्योंकि जब हमारे अन्नदाता ही नहीं होंगे तो हम खाएंगे क्या? दूसरी ओर देखें तो किसानों की आत्महत्याओं से शासन को एक राजनीतिक संदेश जाता है, लेकिन बदकिस्मती से हमारे नेता इन पर सिर्फ सहानुभूति प्रकट करते आए हैं और उन्होंने ऐसी नीतियां बनाई हैं जिनसे आर्थिक मुश्किलें ही पैदा हुई हैं।

आखिर प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, डीडी किसान चैनल, मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना आदि किस काम के हैं जब आत्महत्या का सिलसिला रुकने का नाम ही नहीं ले रहा है? स्वाभाविक है कि सभी योजनाएं सिर्फ कागजों तक सीमित हैं, इसलिए अनेक योजनाओं को शुरू करने के बजाय मौजूदा योजनाओं को ही धरातल पर क्रियान्वित करने की आवश्यकता है। पिछले दो दशकों में तीन लाख से ज्यादा किसानों ने मौत को गले लगाया है। कारण साफ है कि इस दौरान की सरकारें हमारे अन्नदाताओं की समस्याओं को दूर करने में नाकाम रही हैं। इसके मद्देनजर किसानों की मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग पर जोर देने की जरूरत है। इसके पीछे विचार यह है कि संकट की घड़ी में किसान को यह महसूस न होने दिया जाए कि वह बिल्कुल अकेला है।

अक्सर सुनने को मिलता है कि किसान कीटनाशक खाकर आत्महत्या कर लेते हैं। ब्रिटेन में ऐसी नीति मौजूद है जिसके तहत वहां खतरनाक कीटनाशकों पर प्रतिबंध लगाया गया है और बंदूक को पहुंच से बाहर कर दिया गया है। चीन में छोटे और सीमांत किसानों को ब्याजमुक्त या निम्न ब्याज दरों पर कर्ज दिया जाता है। श्रीलंका में भी एक बेहद अच्छी नीति अपनाई गई है जहां कृषि कर्ज का उपयोग केवल कृषि में किया जाता है। किसान उस पैसे का प्रयोग शादी वगैरह में नहीं कर सकते।

इसके अलावा, देश में अनुबंध कृषि को प्रोत्साहन देने की जरूरत है। अनुबंध कृषि में कई खेतों को मिला कर खेती की जाती है जिससे जोत का आकार बढ़ जाता है। इससे न केवल अनुबंध खेती करने वाली कंपनी बल्कि किसानों को भी अच्छा मुनाफा होता है। समझना होगा कि जोत का छोटा आकार भी खेती में घाटे की बड़ी वजह है। बहरहाल, सरकार को खेती-किसानी के मामले में निरंतर गंभीर रहने की जरूरत है, केवल दिखावटी और छिटपुट प्रयास से हालात नहीं बदलने वाले।

रिजवान अंसारी

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