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राजनीति: वेनेजुएला का गहराता संकट

शावेज की मौत के बाद अमेरिका को उम्मीद थी कि वेनेजुएला से उसके संबंध बेहतर होंगे। लेकिन शावेज के उत्तराधिकारी निकोलस मादुरो ने अमेरिका की इस मंशा पर पानी फेर दिया। हालांकि मादुरो में वह चतुराई नहीं थी जो उन्हें लोगों में लोकप्रिय करे और वे विश्व पटल पर वेनेजुएला का प्रभाव कायम रख सकें। मादुरो ने भी सत्ता के केंद्रीकरण की कोशिशें कीं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की घटती कीमत से मादुरो प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके।

वेनेजुएला से तेल खरीदने वाले देशों को अमेरिका ने कड़ी चेतावनी दी है। (AP Photo/Ariana Cubillos, File)

ब्रह्मदीप अलूने

साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद, पिछड़ापन, राजनीतिक अस्थिरता, तानाशाही और सैन्य प्रभुत्व से तीसरी दुनिया के देश अभिशिप्त रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के बाद दुनिया की स्थिति में जो सुधारात्मक और सकारात्मक बदलाव की उम्मीदें की गई थीं, वे सही दिशा में आगे नहीं बढ़ सकीं और अंतत: महाशक्तियों के प्रभुत्व के मायाजाल से तीसरी दुनिया के देश कभी उबर ही नहीं सके। दरअसल, दक्षिण अमेरिका का खूबसूरत देश वेनेजुएला खनिज संसाधनों से समृद्ध होने के बाद भी महाशक्तियों के हस्तक्षेप और राजनीतिक अदूरदर्शिता के चलते गहरे संकट में फंस गया है। दुनिया के कच्चे तेल के सबसे बड़े केंद्र समझे जाने वाले इस देश की मुद्रा का भारी अवमूल्यन हो चुका है, महंगाई बेतहाशा बढ़ गई है, पानी का गंभीर संकट है, लोग भूखे रहने को मजबूर हैं, सुपर बाजारों पर सरकारी नियंत्रण स्थापित कर दिया गया है जहां महंगा और दूषित खाना बेचा जा रहा है, लोगों के रोजगार छिन गए हैं और लोग दूसरे देशों में भागने को मजबूर हो रहे हैं। अमेरिकी प्रतिबंधों से हालात बिगड़ चुके हैं। वेनेजुएला से तेल खरीदने वाले देशों को अमेरिका ने कड़ी चेतावनी दी है। इनमें भारत भी शामिल है।

दूसरी ओर वेनेजुएला ने भारत को प्रस्ताव दिया है कि वह तेल आयात को आसान बनाने के लिए रुपए में भुगतान कर सकता है। विपक्ष विरोध को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है। अमेरिका मादुरो को सबक सिखाना चाहता है तो वहां की सेना सहित रूस-चीन जैसे देश राष्ट्रपति मादुरो के साथ खड़े हैं। वेनेजुएला की सड़कों पर चौबीसों घंटे विरोध प्रदर्शन, हिंसा और आगजनी हो रही है। ऐसे में भी संयुक्त राष्ट्र खामोश है। किसी भी देश की आंतरिक राजनीति जब महाशक्तियों के हितों से संचालित होने लगे तो समस्या और गहरा जाती है। वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो साम्यवादी विचारधारा के समर्थक होकर चीन और रूस से दोस्ती को मजबूत किए हुए हैं। वे लोकतांत्रिक प्रक्रिया को धता बता कर सत्ता पर अपना नियंत्रण बनाए रखना चाहते हैं। सेना उनके साथ है। चीन अपने आर्थिक हितों को पूरा कर महाशक्ति बनने का ख्वाब लिए लातिन अमेरिका में भी अपना प्रभाव मजबूत करने में जुटा है। चीन ने वेनेजुएला में भारी निवेश किया है और उसे कर्ज भी दे रखा है। लातिन अमेरिका में अपने पैर मजबूत करने के लिए चीन के लिए यह सबसे मुफीद वक्त और स्थिति है।

वेनेजुएला में विपक्षी नेता ख्वान ग्वाइदो राष्ट्रपति मादुरो को सत्ता से बेदखल करने के लिए देश भर में चरणबद्ध आंदोलन चला रहे हैं। ग्वाइदो को कई देशों का समर्थन हासिल है और अमेरिका ने तो इस विपक्षी नेता को खुल कर वेनेजुएला के राष्ट्रपति के तौर पर मान्यता भी दे दी है। अमेरिका के सुर में सुर मिलाते हुए वेनेजुएला के पड़ोसी राष्ट्रों- ब्राजील, कोलंबिया, चिली, पेरू, इक्वाडोर, अर्जेंटीना और पराग्वे ने ग्वाइदो को अंतरिम राष्ट्रपति के रूप में मान लिया है। कनाडा भी ग्वाइदो का समर्थन कर रहा है। यूरोपीय संघ (ईयू) वेनेजुएला में स्वतंत्र चुनाव के पक्ष में है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ते जा रहे मादुरो को अभी रूस, चीन, तुर्की, ईरान, मेक्सिको, बोलिविया और क्यूबा जैसे अमेरिका के विरोधियों का समर्थन हासिल है। जाहिर है, वेनेजुएला के आंतरिक राजनीतिक संकट से दुनिया को हस्तक्षेप करने का मौका मिल गया है और यही समस्या इस देश के लिए जानलेवा बन गई है।

वेनेजुएला का राजनीतिक इतिहास पूंजीवाद और साम्यवाद के बीच झूलता रहा है। बदलते दौर में यही उसके लिए घातक साबित हुआ। कच्चे तेल के भंडार वाले इस देश में ह्यूूगो शावेज 1998 में नए समाजवादी संविधान के आश्वासन पर चुनाव जीत कर राष्ट्रपति बने थे। वे करीब डेढ़ दशक तक सत्ता पर काबिज रहे। इस दौरान शावेज ने जनता का विश्वास जीतने के लिए लोकलुभावन योजनाओं की शुरुआत कर व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन किया और धीरे-धीरे कार्यपालिका और न्यायपालिका के सारे अधिकारों को राष्ट्रपति के अधीन कर लिया। शावेज ने जिस प्रकार पूरी सत्ता को अपने तक केंद्रित कर देश के मुख्य संस्थानों पर अपना प्रभाव बनाया, उससे देश के लोकतंत्रिक ढांचे को गहरी चोट पहुंची। तेल बेच कर अपनी नब्बे प्रतिशत मुद्रा कमाने वाले इस देश की समस्या अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कम होती कीमतों ने बढ़ाई।

शावेज ने अल्पकालिक राजनीतिक हितों के चक्कर में ऐसी कोई दीर्घकालीन नीति नहीं बनाई जिससे देश का आर्थिक ढांचा ध्वस्त होने से बचाया जा सकता। शावेज साम्यवादी शक्तियों के प्रभाव में इतने उत्साह से आगे बढ़े कि उन्होंने अमेरिका के सामने खड़े होने से भी गुरेज नहीं किया। उन्होंने तेल की दुनिया के राष्ट्रों का लगातार नेतृत्व किया, बल्कि अमेरिका को ठेंगा दिखाते रहने का प्रयास भी। अमेरिकी विरोध के चलते ही उन्होंने रूस से लगातार संबंध मजबूत किए और कैरेबियन सागर से पूंजीवाद और अमेरिका को लगातार चुनौती देने का प्रयास किया। यह ह्यूगो शावेज का दुस्साहस ही था कि उन्होंने 2006 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश को दुरात्मा कहने से गुरेज नहीं किया था। यह शावेज का ही साहस था कि उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और रियायती दरों पर घर देने के लिए समाजवादी मॉडल को अपनाया और इसमें अपना मार्गदर्शक क्यूबा को बनाया। अमेरिकी अर्थव्यवस्था से अपना संबंध धीरे-धीरे खत्म करने के अपने वादे पर खरे उतरते हुए उन्होंने अमेरिकी कंपनियों को वेनेजुएला से अलविदा कहने को मजबूर कर दिया।

शावेज की मौत के बाद अमेरिका को उम्मीद थी कि वेनेजुएला से उसके संबंध बेहतर होंगे। लेकिन शावेज के उत्तराधिकारी निकोलस मादुरो ने अमेरिका की इस मंशा पर पानी फेर दिया। हालांकि मादुरो में वह चतुराई नहीं थी जो उन्हें लोगों में लोकप्रिय करे और वे विश्व पटल पर वेनेजुएला का प्रभाव कायम रख सकें। मादुरो ने भी सत्ता के केंद्रीकरण की कोशिशें कीं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की घटती कीमत से मादुरो प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। ऐसे में देश में चल रही लोकलुभावन योजनाओं को जारी रखना उनके लिए आसान नहीं था और यहीं से उनका विरोध शुरू हो गया। इसके साथ महंगाई बढ़ती गई और लोगों का जीवन मुश्किल हो गया।

संकट और तब गहरा गया जब इस साल राष्ट्रपति मादुरो फिर से चुनाव जीत गए। विपक्ष ने धांधली का आरोप लगा कर जहां चुनावों को खारिज कर दिया, वहीं अमेरिका ने इसे शमर्नाक करार दिया। मानवाधिकार के मसले को लेकर ब्राजील, अर्जेंटीना, पराग्वे और उरुग्वे ने पहले से ही आर्थिक समूह मर्कोसर से वेनेजुएला को बाहर कर रखा है। वेनेजुएला में विपक्ष ने इस चुनाव को मानने से इंकार कर दिया है और कहा है कि वह आगे भी विरोध जारी रखेगा। राष्ट्रपति मादुरो की असंतुलनकारी आक्रामक नीतियां भी इसके लिए काफी हद तक जिम्मेदार रही हैं। दिसंबर 2015 में वेनेजुएला में महंगाई दर एक सौ अस्सी फीसद तक बढ़ गई थी और आर्थिक नीतियों को दुरुस्त करने की बड़ी जरूरत थी। मादुरो ने 2016 में नोटबंदी जैसा कदम उठा कर लोगों की मुश्किलें और बढ़ा दीं। इस समय दुनिया में तेल की कीमतें गिरने से वेनेजुएला की आर्थिक स्थिति चरमरा गई। विदेशी कर्ज बढ़ता जा रहा है।

इस समय जरूरत इस बात की है कि संयुक्त राष्ट्र अपनी ओर से पहल कर सत्ता के दोनों पक्षों को बातचीत की मेज पर लाए। कच्चे तेल की प्राकृतिक धरोहर से आबाद वेनेजुएला के लिए कर्ज देना मुश्किल काम नहीं है, बशर्ते इस देश के राजनीतिक नेतृत्व को राष्ट्रहित में समझाने का प्रयास किया जाए। लेकिन संयुक्त राष्ट्र के इस कार्य में महाशक्तियों के सामरिक और आर्थिक हित रोड़ा बन सकते हैं। वेनेजुएला को किसी मानवीय त्रासदी से बचाने के लिए वैश्विक निकायों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को सोचना चाहिए।

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