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राजनीति: अतिक्रमण की भेंट चढ़ते तालाब

हमारी सांस्कृतिक परंपरा में वर्षा जल को संरक्षित करने पर विशेष ध्यान दिया गया था

Author Updated: December 3, 2019 2:01 AM
मृतप्राय तालाब-पोखरों की संख्या पूरे देश में बीस हजार से ऊपर पहुंच गई है।

आज पूरे देश में पोखर और तालाब संकट में हैं। बहुत सारे तालाब या तो सूख गए हैं या अंतिम सांसें गिन रहे हैं। उत्तर प्रदेश में आगरा के राजपुर गांव में कभी अपार जल राशि रहा करती थी। वह जल आसपास के लोगों तथा जीव-जंतुओं के लिए जीवन अमृत प्रदान करता था, पर नवधनाढ्यों की नजर उस पर ऐसी लगी कि आज उस तालाब के स्थान पर विशाल अट््टालिकाएं खड़ी हैं। बदायूं जिले के अनेक तालाब भू माफिया की भेंट चढ़ चुके हैं। चंदोखर, पक्का तालाब तथा चमरतलैया, जिनका क्षेत्रफल पचास बीघे से भी अधिक था, अपना अस्तित्व गंवा चुके हैं। अब उनके स्थान पर कल्याण नगर, प्रोफेसर कॉलोनी जैसी पाश कॉलोनियां उग आई हैं। पक्का तालाब का संबंध सुरंग के माध्यम से राजा महिपाल के महल से था, जहां स्नान करने के लिए रानियां जाया करती थीं। अब पक्का तालाब का अवशेष मात्र शेष है।

इसी प्रकार कानपुर-आगरा राजमार्ग पर एत्मादपुर से पहले कभी ‘बुढ़िया का तालाब’ विशाल दरिया के रूप में स्थित था, जिसमें रजवाहे के माध्यम से पानी निरंतर आता रहता था और वह वर्ष पर्यंत लबालब भरा रहता था। अब वहां पर पानी का नामोनिशान नहीं है, बबूल सहित कांटेदार वृक्षों का जंगल खड़ा हो गया है। प्रयागराज स्थित तालाब नवल राय अब इतिहास का विषय बन गया है। उसके स्थान पर आज इस नाम का मोहल्ला कायम है। प्रयागराज में ही धरा गांव का तालाब अपने आप में अद्वितीय था। चालीस एकड़ में फैले इस तालाब की भूमि कंक्रीट की बनाई गई थी और उसमें चारों ओर से आकर बरसाती पानी जमा होता था। वह अड़ोस-पड़ोस के गांवों सहित जीव-जंतुओं के पेयजल के साथ-साथ फसलों की सिंचाई और अन्य आवश्यक कार्यों में उपयोग में लाने पर भी वर्ष पर्यंत लबालब भरा रहता था। पर आज वहां पानी के स्थान पर सूखी भूमि नजर आती है।

गोरखपुर स्थित असुरन पोखरा सन 1075 से 1077 के मध्य राजा शूरपाल ने विष्णु मंदिर के साथ बनवाया था। वह आज पानी रहित होकर असुरन मोहल्ले के नाम से गोरखपुर में जाना जाता है। कानपुर देहात घाटमपुर स्थित कुष्मांडा देवी मंदिर का तालाब भी अपनी यही कहानी कह रहा है। गाजीपुर के सिद्ध पीठ भुड़कुड़ा के उत्तरी छोर पर स्थित पोखरा चमत्कारी पोखरा के नाम से जाना जाता है, जिसे सिद्ध पीठ के दूसरे महान संत गुलाल साहब ने लगभग साढ़े पांच सौ साल पहले खुदवाया था।

वह आज अंतिम सांसें गिन रहा है। इसी प्रकार अलीगढ़ से अतरौली स्थित राजमार्ग पुर गांव का तालाब, शाहजहांपुर की तहसील तिलहर और पुवाया की सीमा में लघौला चेना में चौरासी बीघा के विशाल क्षेत्र में फैला तालाब, अमेठी के एक सौ नौ हेक्टेयर में फैला समदा ताल, नोएडा के बिलासपुर में स्थित चालीस बीघा में फैले बूढ़े बाबा का तालाब, बदायूं के अनेक तालाब भू माफियाओं की बुरी नजर का शिकार होकर अपने अस्तित्व को गवां बैठे हैं और उनके पेट में कंक्रीट के जंगल उग कर मुहल्लों के रूप में परिवर्तित हो गए हैं। मुरादाबाद के खुशहालपुर रोड स्थित लोको शेड के पास स्थित तालाब तथा चित्रकूट जिला कलेक्ट्रेट के पास स्थित चंदेल राजाओं द्वारा बनवाए गए मिनी खजुराहो के नाम से विख्यात गणेश बाग स्थित बावड़ी और तालाब आज अंतिम सांसें ले रहे हैं। उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। कभी समीपवर्ती गांव के सांस्कृतिक, धार्मिक आयोजनों के केंद्र बनने वाले ये तालाब आज मृतप्राय हो गए हैं।

मृतप्राय तालाब-पोखरों की संख्या पूरे देश में बीस हजार से ऊपर पहुंच गई है। उत्तर प्रदेश सरकार के आंकड़ों के अनुसार मेरठ में 1115, बुलंदशहर में 3997, मुजफ्फरनगर में 767, शामली में 348, मुरादाबाद में 2532, अमरोहा में 2101, रामपुर में 2257, संभल में 599, अलीगढ़ में 1848, हाथरस में 94, प्रयागराज में 2800, प्रतापगढ़ में 1378, वाराणसी में 1519, बलिया में 4622, बरेली में 6500, शाहजहांपुर में 5000, बदायूं में 2243, पीलीभीत में 1071, नोएडा में 1002, लखनऊ में 1345, कन्नौज में 1818, चित्रकूट में 1499, फतेहपुर में 6650, कानपुर देहात में 2750, आगरा मंडल में 9423, आजमगढ़ में 45,000, सोनभद्र में 7000, गोरखपुर में 5646 और बस्ती मंडल में 4200 पोखर और तालाब हैं, जिनमें से दस फीसद तालाबों में भी गत जून माह में पानी नहीं था।

प्रदेश सरकार इन तालाबों पर पानी भरवाने का प्रयास कर रही थी। पर मनरेगा के अंतर्गत किए गए प्रयासों के बावजूद जल भरे तालाबों की संख्या कुल के सापेक्ष बीस फीसद नहीं हो पाई है। वर्षा ऋतु में अवश्य ही इनमें कुछ पानी देखने को मिला, पर उसके जाते ही पानी सूखना प्रारंभ हो गया है। गरमी आते-आते अधिकांश तालाब जल विहीन हो जाएंगे। मनरेगा द्वारा नए-नए तालाब बनाए जा रहे हैं, पर उनका निर्माण बिना किसी योजना के अदूरदर्शिता पूर्ण ढंग से किया जा रहा है। निर्माण के लिए निर्माण तो हो रहा है, पर यह नहीं देखा जा रहा कि इन तालाबों में पानी कहां से आएगा। उनमें प्राय: प्राकृतिक बरसाती पानी नहीं पहुंच पाता, जबकि तालाबों का निर्माण ऐसे स्थान पर होना चाहिए, जहां वर्षा का जल एकत्रित हो और भूगर्भ के जल स्तर को भी बढ़ाए।

आज देश का तीन चौथाई भाग पेयजल की समस्या से जूझ रहा है। देश के अनेक भागों में जल की अनुपलब्धता के कारण आंदोलन और संघर्ष हो रहे हैं। दक्षिण भारत के चेन्नई से लेकर उत्तर भारत के अनेक शहरों में पेयजल की समस्या मुंह बाए खड़ी है। देश के लगभग सत्तर प्रतिशत घरों में शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं है। लोग प्रदूषित पानी पीने को बाध्य हैं, जिसके चलते लगभग चार करोड़ लोग प्रतिवर्ष प्रदूषित पानी पीने से बीमार होते हैं और लगभग छह करोड़ लोग फ्लोराइड युक्त पानी पीने को विवश हैं। उन्हें पीने के लिए शुद्ध जल उपलब्ध नहीं है। देश में प्रतिवर्ष लगभग चार हजार अरब घन मीटर पानी वर्षा के जल के रूप में प्राप्त होता है, पर उसका लगभग आठ फीसद पानी ही हम संरक्षित कर पाते हैं। बाकी पानी नदियों, नालों के माध्यम से बह कर समुद्र में चला जाता है।

हमारी सांस्कृतिक परंपरा में वर्षा जल को संरक्षित करने पर विशेष ध्यान दिया गया था, जिसके लिए जगह-जगह पोखर, तालाब, बावड़ी, कुएं आदि निर्मित कराए जाते थे, जिनमें वर्षा जल एकत्र होता और वह वर्ष भर जीव-जंतुओं सहित मनुष्यों के लिए भी उपलब्ध होता था। पर वैज्ञानिक प्रगति के नाम पर इन्हें संरक्षण न मिलने के कारण अब तक लगभग साढ़े चार हजार नदियां तथा बीस हजार झील, पोखर, तालाब आदि सूख गए हैं।

देश का कोई भी ऐसा हिस्सा या प्रदेश नहीं है, जहां पोखर और तालाब दिन-प्रतिदिन सूख न रहे हों तथा उन पर भू माफिया और बिल्डरों का अवैध कब्जा न हुआ हो। इसे देखते हुए प्रकृति प्रेमी और जल संरक्षण तथा संवर्धन की दिशा में कार्य कर रहे लोगों द्वारा समय-समय पर ऐसे जल स्रोतों की सुरक्षा के लिए माननीय उच्च न्यायालय तथा उच्चतम न्यायालय में भी गुहार लगाई गई।

हिंचलाल तिवारी, जगपाल और अन्य की जनहित याचिका में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा देश के सारे झील-तालाब-झरनों को अतिक्रमण मुक्त करने का आदेश दिया गया था। इसके बाद गाजीपुर के इकबाल अहमद की जनहित याचिका पर उच्च न्यायालय इलाहाबाद ने तालाबों से अतिक्रमण हटाने के लिए 2005-06 में आदेश पारित करते हुए कहा था कि 1952 के पहले के राजस्व अभिलेखों में पोखर, तालाब आदि के रूप में अंकित जलाशयों को अतिक्रमण मुक्त कर उन्हें बहाल किया जाए। माननीय न्यायालयों द्वारा पारित उक्त निर्णयों से समस्या विशेष का तो समाधान हुआ तथा कुछ जलाशयों को जीवनदान मिला पर उनका व्यापक प्रभाव नहीं पड़ा। भू-माफिया, राजनेता और अधिकारियों के गठजोड़ की वजह से जलाशयों की मुक्ति तथा उनकी बहाली की दिशा में ठोस कार्रवाई नहीं की गई।

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