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राजनीति: आतंक और पाकिस्तान

पाकिस्तान की दुनियाभर के आतंकी हमलों में संलिप्तता उजागर भी होती रही है। साल 2011 में भी अमेरिका ने गोपनीय दस्तावेजों में ग्वांतानामो बे के सात सौ कैदियों का हवाला देते हुए कई संदर्भों में इसका जिक्र किया था। इससे यह साबित हो गया था कि आइएसआइ अफगानिस्तान में अमेरिकी गठबंधन सेनाओं से लड़ रहे विद्रोहियों, यहां तक कि अलकायदा को भी समर्थन देती है।

Author March 16, 2019 3:15 AM
पाकिस्तान के पीएम इमरान खान। (PTI Photo)

ब्रह्मदीप अलूने

सामूहिक सुरक्षा का सिद्धांत यह दावा करता है कि शांति भंग करने वाले को सब राष्ट्र अपनी संगठित शक्ति से नियंत्रित करने में सहयोग करेंगे। यह तभी संभव हो सकता है जब सिद्ध हो जाता है कि इसका संबंध हर राष्ट्र के हितों से है। दरअसल, पाकिस्तान की आतंकवाद को प्रश्रय देने की नीति से समूची दुनिया प्रभावित है। उसकी सीमा से लगे देश आतंकी हमलों से पस्त हैं। पाकिस्तान के पूर्व में भारत स्थित है और सीमा से लगा हुआ जम्मू-कश्मीर राज्य लंबे समय से पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से अशांत है। पाकिस्तान के दक्षिण-पश्चिम में ईरान है और उसकी सीमा से लगा समूचा बलूचिस्तान अलगाव और आतंक से बेहाल है। यह इलाका जुंडुल्लाह लड़ाकों का गढ़ है जो ईरान के सुन्नी अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व का दावा करता है और उनके लिए ईरान से अलग देश बनाए जाने के लिए अभियान चला रहा है। पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिम की ओर अफगानिस्तान है। यहां सीमा से सटे कुनार और हेलमंद प्रांत में पाकिस्तान समर्थित तालिबान का दबदबा है और इससे समूचा अफगानिस्तान गृह युद्ध से झुलस रहा है। पाकिस्तान के उत्तर-पूर्व में चीन है और यहां का शिनचियांग प्रांत भी अशांत है।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ के अस्तित्व में आने से वैश्विक शांति के प्रति सभी राष्ट्रों की जवाबदेही तो बढ़ी, लेकिन कुछ राष्ट्र लगातार आतंकवाद को पाल-पोसने की नीति पर चल निकले और आज ये वैश्विक शांति को भंग कर रहे हैं। पाकिस्तान इनमें अग्रणी है। शीत युद्ध के दौर में महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता के फलस्वरूप पाकिस्तान ने जिहादी आतंक को बढ़ाने का जो सिलसिला शुरू किया था, वह आज भी बदस्तूर जारी है। इस समय पाकिस्तान की इस नीति से सबसे ज्यादा प्रभावित भारत, अफगानिस्तान और ईरान जैसे उसके पड़ोसी राष्ट्र हैं।

अस्सी के दशक की शुरुआत में अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रेगन के कार्यकाल में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआइए के नेतृत्व में सोवियत संघ को अफगानिस्तान से बाहर निकालने का अभियान शुरू किया गया था। सीआइए ने इस अभियान में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आइएसआइ और सऊदी अरब को सक्रिय साझीदार बनाया। तीनों ने मिलकर मुसलिम देशों से स्वयंसेवकों का चयन, प्रशिक्षण और उन्हें हथियार देकर अफगानिस्तान भेजना शुरू किया। इसे जिहाद का नाम दिया गया और समूचे मुसलिम जगत से कट्टरपंथी ताकतों को इस जिहाद में शामिल होने का आह्वान किया गया। यह जिहाद पूरे एक दशक तक चला और इस दौरान अमेरिका पूरी ताकत के साथ पाकिस्तान के पीछे खड़ा रहा। सोवियत रूस इस युद्ध में टिक नहीं पाया और उसे 1989 में अफगानिस्तान छोड़ना पड़ा। इस प्रकार अमेरिकी मदद से मुजाहिदीन ने एक अजेय समझी जाने वाली महाशक्ति को करारी शिकस्त दे दी थी। तत्कालीन समय में साम्यवाद को गहरी चोट देने की अमेरिकी नीति कारगर तो रही, लेकिन उसके बीज पूरी दुनिया में रक्तपात करेंगे इसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी।

अफगानिस्तान की राजनीतिक अस्थिरता कुछ समय तक अमेरिका, पाक और जिहादियों को खूब रास आई। तालिबान, उसामा बिन लादेन और इस्लामिक चरमपंथियों की उपजाऊ जमीन खामोश तो नहीं बैठ सकती थी। पाकिस्तान अफगानिस्तान को हथियाने का ख्वाब देखता रहा और उसने भारत से बदला लेने में भी जिहादियों का खूब इस्तेमाल किया। अब पाकिस्तान लश्कर-ए-तैयबा, हिजबुल मुजाहिदीन और जैश ए मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों के जरिये कश्मीर में अशांति फैला रहा है। पिछले महीने कश्मीर के पुलवामा में जैश के हमले में सीआरपीएफ के चालीस से ज्यादा जवान मारे गए थे। वहीं दक्षिण पूर्वी ईरान में रेवोल्यूशनरी गार्ड्स की बस पर आत्मघाती कार हमले में सत्ताईस सैनिकों की मौत हो गई थी। ये दोनों आत्मघाती हमले एक जैसे थे जिसमें विस्फोटकों से भरी कार को सुरक्षा बलों की बस से टकरा दिया गया था।

पाकिस्तान की दुनियाभर के आतंकी हमलों में संलिप्तता उजागर भी होती रही है। साल 2011 में भी अमेरिका ने गोपनीय दस्तावेजों में ग्वांतानामो बे के सात सौ कैदियों का हवाला देते हुए कई संदर्भों का इसका जिक्र किया था। इससे यह साबित हो गया था कि आइएसआइ अफगानिस्तान में अमेरिकी गठबंधन सेनाओं से लड़ रहे विद्रोहियों, यहां तक कि अलकायदा को भी समर्थन देती है। उसकी गतिविधियों में मदद करती है और संरक्षण भी प्रदान करती है। इन दस्तावेजों में आइएसआइ को आतंकवादी संगठन करार देते हुए माना है कि यह अलकायदा और तालिबान के समान ही एक चुनौती है। इन सब घटनाओं के बाद भी चीन और अमेरिका के सामरिक समर्थन से पाकिस्तान को आतंकवादी राष्ट्र घोषित नहीं किया जा सका है।

ऐसे में पाकिस्तान के पड़ोसी देशों के सामने उसे रोकने की चुनौती बरकरार है। पाकिस्तान की भारत के साथ सबसे लंबी सीमा है। इसके बाद अफगानिस्तान और ईरान की सीमा है। ये तीनों राष्ट्र पाकिस्तान की सामरिक घेराबंदी कर पाकिस्तान पर दबाव डाल सकते हैं। पिछले साल सितंबर में भारत ने काबुल में पहली बार ईरान और अफगानिस्तान के साथ त्रिपक्षीय बैठक की थी। तीनों पक्षों ने चाबहार बंदरगाह परियोजना को लागू करने और आतंक रोधी सहयोग को बढ़ाने सहित कई अन्य मुद्दों पर चर्चा की। तीनों देशों ने चाबहार सहित आर्थिक सहयोग को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित किया। इसके साथ ही आतंकवाद के खिलाफ अभियान, नशीले पदार्थों के खिलाफ मुहिम पर सहयोग बढ़ाने और अफगानिस्तान द्वारा संचालित और स्वामित्व वाली शांति और सुलह प्रक्रिया के निरंतर समर्थन पर भी चर्चा हुई थी।

राष्ट्रीय सुरक्षा के निर्धारण और उसकी सफलता के कुछ विशिष्ट आधार होते हैं जिनमें भू-राजनीतिक और भू-सामरिक नीति बेहद महत्त्वपूर्ण है। भारत ने पाकिस्तान से व्यापारिक संबंध बाधित करके उसके आर्थिक हितों को चोट पहुंचाई है। पाकिस्तान अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए ईरान पर निर्भर है और ईरान उससे व्यापारिक संबंध खत्म करके पाकिस्तान पर गहरा दबाव बना सकता है। अफगानिस्तान चारों ओर से मैदानी हिस्से से घिरा देश है, जिसकी पाकिस्तान पर बहुत अधिक निर्भरता है और अब तक भारत के साथ व्यापारिक संबंध के लिए पाकिस्तान से होकर जाना पड़ता था। पाकिस्तानी अधिकारी बिना नोटिस के अचानक सीमाएं बंद कर देते हैं। वे इसे अफगानिस्तान सरकार पर दबाव डालने के लिए हथियार के तौर पर इस्तेमाल करते रहे हैं। अब अफगानिस्तान को इससे राहत मिलने की उम्मीद बढ़ी है। साल 2017 में काबुल और दिल्ली के बीच हवाई रास्ते से माल ढुलाई के सीधे कॉरिडोर की शुरुआत हो गई है, वहीं चाबहार बंदरगाह से ईरान के रास्ते भारत-अफगानिस्तान का व्यापार शुरू हो गया है। भारत के अफगानिस्तान जाने के लिए ईरान ने एक पारगमन मार्ग उपलब्ध कराया है जिसे चाबहार-देलाराम जेरांग मार्ग कहते हैं।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति और विदेश नीति के संदर्भ में भू-राजनीति का महत्त्व किसी भी और तत्त्व से अधिक है। भौगोलिक रूप से भारत, अफगानिस्तान और ईरान पर पाकिस्तान की निर्भरता है ही, इसके साथ ही ये तीनों राष्ट्र आर्थिक गोलबंदी के साथ पाकिस्तान की सामूहिक सामरिक मोर्चाबंदी भी कर लें तो पाकिस्तान पर दोहरा दबाव डाला जा सकता है। सामूहिक सुरक्षा के लिए यह भी माना जाता है कि यह व्यवस्था तभी प्रभावशील हो सकती है जब उसे क्रियान्वित करने के लिए पर्याप्त शक्ति हो। जाहिर है, भारत और ईरान सामरिक और आर्थिक रूप से भी मजबूत राष्ट्र हैं। पाकिस्तान के आतंकवाद से अभिशप्त दुनिया अभी तक उसे पूरी तरह रोकने में नाकाम रही है। इसके पड़ोसी देश शांति के लिए उत्पन्न खतरों से निपटने के लिए सामूहिक उपाय कर सकते हैं और यह सामूहिक सुरक्षा का कारगर उपाय भी हो सकता है। भारत-अफगानिस्तान और ईरान की सामूहिक मोर्चाबंदी से पाकिस्तान को पस्त किया जा सकता है और इस नीति को वृहत तौर पर आजमाने की जरूरत भी है।

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