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राजनीति: भुखमरी के शिकार आदिवासी

इंडियन फेमिन कमीशन ने 1880 में सिफारिश की थी कि पांच सदस्यों के परिवार को साल भर के लिए एक टन अनाज चाहिए।

Author Updated: November 22, 2019 2:24 AM
सरकार के मुलाजिम किसी भी सूरत में यह स्वीकार करने को राजी नहीं हैं कि भूख से मौत होती है।

आदिवासी बहुल राज्य झारखंड में 1967 से अभी तक दस लाख से अधिक लोग भूख की भेंट चढ़ चुके हैं। राज्य में बच्चों की बिक्री, महिलाओं की तस्करी और बड़े पैमाने पर पलायन का क्रम रुकने का नाम नहीं ले रहा है। हालांकि, सरकार के मुलाजिम किसी भी सूरत में यह स्वीकार करने को राजी नहीं हैं कि भूख से मौत होती है।

सूखे-अकाल के हालात में नेवला, गिलहरी और बंदर मार कर खाने वाले आदिवासियों की इस जमीन पर पिछले चार सालों में बाईस मौतें सामने आ चुकी हैं, जो पूरे देश में भुखमरी से हुई कुल पचासी मौतों का एक चौथाई है। आज राशन और पानी के लिए तरसते झारखंड ने 1939 में अकालग्रस्त ओडिशा-बंगाल का पेट भरा था। इस इलाके को ‘जंगलतरी’ कहा जाता था, जो आज दाने-दाने को तरस रहा है। सवाल है कि क्या झारखंड के आदिवासियों की खेती इतनी पिछड़ गई है कि दो जून का अनाज नसीब होना भी मुश्किल है या आबादी का दबाव उन खेतों पर कहीं ज्यादा पड़ा है? इन दिनों झारखंड में विधानसभा चुनाव की गहमागहमी है, पर अफसोस की बात है कि राज्य की राजनीति आम आदमी के रोग-शोक, भुखमरी, आदिवासियों और दलितों के शोषण, उनके अंधविश्वासों से थमती जिंदगी की गति और धर्म की आड़ में हो रहे संस्थागत व्यभिचार को दरकिनार कर रही है।

भोजन के अधिकार कानून के बावजूद भूख से मौतों की खबरें चिंता पैदा करती हैं। सवाल है कि समाज और राज्य की अवधारणा के बीच नागरिक समाज की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था के बदलने से वहां आए आमूल-चूल परिवर्तन का परिदृश्य क्या है। सरकार परिवर्तन के दावे करती, पोस्टरों और अखबारों में इश्तहारों के जरिए अपनी उपलब्धियों का बखान करती है, लेकिन वह बुनियादी सवाल कभी उठने नहीं देती। हर थाली में अनाज पहुंचाने के लिए दो बातें बेहद जरूरी हैं- बेहतर राजनीतिक कार्यशीलता और व्यवस्था के विभिन्न गुणकों और साधनों का उचित उपयोग। क्या झारखंड में नागरिक सुविधाओं के लिए सरकारों ने इन बातों का ध्यान रखा है?

केवल जन वितरण प्रणाली की दुकानों का होना या दोपहर के भोजन या उचित मूल्य की दुकानों की मौजूदगी किसी राज्य में भूख का समाधान नहीं है, बल्कि राज्य को यह देखना चाहिए कि किसान को प्रोत्साहन देकर ज्यादा से ज्यादा उत्पादन की संभावनाएं कैसे पैदा की जाएं। इसके बाद पैदावार और भंडारण की पर्याप्त और अत्याधुनिक व्यवस्था हो। आखिर में अनाज का समुचित वितरण या बिक्री हो। मगर राज्यों और केंद्र के बीच तालमेल के बिना इन विभिन्न चरणों को पूरा किया जाना मुमकिन नहीं है। सबसे महत्त्वपूर्ण मुद्दा राज्य के कामकाज को लेकर है। इंडियन फेमिन कमीशन ने 1880 में सिफारिश की थी कि पांच सदस्यों के परिवार को साल भर के लिए एक टन अनाज चाहिए। ऐसे में राज्य का कर्तव्य है कि उक्त परिवार को इतनी मात्रा से कहीं ज्यादा अनाज पैदा करने के लिए प्रेरित करता। यानी खेती-किसानी से हर किसी का जुड़ा होना जरूरी था। गांवों को उत्पादन का केंद्र बनाना था, न कि खाद्य सुरक्षा के नाम पर उन्हें दान का कटोरा पकड़ा दिया जाए।

इस सोच को अपनाए बिना भूख और कुपोषण से जुड़ा अपना रिपोर्ट कार्ड नहीं सुधर सकता। देखें कि हम कहां खड़े हैं- 1961 में देश में प्रति व्यक्ति प्रति दिन 468.8 ग्राम अनाज की उपलब्धता थी, पर 2015 तक यह आंकड़ा 465.1 ग्राम पर पहुंच गया। यह किसी गंभीर स्थिति का संकेत तो नहीं है? सवाल है कि केंद्र सरकार ने इस सांख्यिकी में सुधार कर 2017 में प्रतिदिन प्रति व्यक्ति 518 ग्राम अनाज की उपलब्धता का दावा किया, पर इसी दावे के बीच लोग भुखमरी के शिकार होते और व्यवस्था को बेस्वाद करते रहे।

नेशनल न्यूट्रिशनल मॉनिटरिंग ब्यूरो के सर्वे में भी इस बात की चर्चा है, ‘जो देश के आदिवासी इलाकों के लिए समीचीन है कि अनाज की उपलब्धता और उनकी खपत को कायम रखे बिना भुखमरी को रोका जाना संभव नहीं है।’ पिछले दिनों प्रकाशित विव खाद्य कार्यक्रम के ‘फूड एंड न्यूट्रिशनल सिक्योरिटी एनालिसीस/ 2019’ के मुताबिक प्रति व्यक्ति प्रति दिन प्रोटीन के प्रमुख स्रोत दाल की मात्रा पैंतीस ग्राम तय है, लेकिन औसतन चौबीस ग्राम प्रतिदिन प्रति व्यक्ति इसकी खपत देश में होती है। उसी तरह साग की खपत प्रति व्यक्ति प्रति दिन तिरालीस ग्राम तय है, पर औसतन इसकी खपत चौदह ग्राम होती है। रिपोर्ट के अनुसार हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, त्रिपुरा, हरियाणा और आंध्रप्रदेश में रेकमेंडेड डाइटरी अलाउंस (आरडीए) संतोषप्रद है, मगर बिहार, झारखंड, ओडिशा, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के हालात नाजुक हैं। इन राज्यों में देश की आदिवासी आबादी का एक बड़ा हिस्सा रहता है, जहां खाद्य सुरक्षा को सब्सिडी के अनाज की उपलब्धता तक सीमित रखा गया है। जबकि उम्मीद की गई थी कि खाद्य सुरक्षा के लिए बना भोजन का अधिकार कानून के तहत जमीनी स्तर पर लोगों को पौष्टिक भोजन की आदत डालने को लेकर एक माहौल बनाया जाएगा, साथ में भारतीय खाद्य निगम का गोदाम खोल कर अन्नदाता का पेट भरने की खतरनाक प्रवृत्ति पर अंकुश लगेगा।

दुख की बात है कि तेंदुलकर समिति से लेकर रंगराजन समिति तक अनाज के वितरण के मानक तय किए, पर क्या किसी ने इस बात पर ध्यान दिया कि इस भोजन के अधिकार के जुनून में हमने खेत की ओर ध्यान देना छोड़ दिया है। सरकार इस बात को सार्वजनिक क्यों नहीं करती कि भोजन के अधिकार को मजबूती से लागू करने में हमने खेती-किसानी को चौपट कर दिया है। खुद को किसान कल्याण का हितैषी होने के नाम पर सरकार किसानों को मुफ्त पानी-बिजली और सब्सिडी के खाद और बीज का तोहफा देती है, पर नतीजा क्या निकलता है? आज अपने देश में एक टन गेहूं पैदा करने की लागत तकरीबन पच्चीस हजार रुपए आती है, जबकि अंतरराष्ट्रीय मंडी से अमेरिकी गेहूं खरीदने की लागत तकरीबन साढ़े सत्रह हजार रुपए आंकी गई थी। यानी अपने देश की खेती उपेक्षित होने और आयातित अनाजों पर निर्भरता ने गांवों को अनाज विहीन बना दिया है। खबर यह भी है कि धान के कटोरा छत्तीसगढ़ में प्रति हेक्टेयर

उपज प्रति वर्ष कमतर होती जा रही है। जब गांव अन्न विहीन होंगे तो तय है कि खाद्य सुरक्षा कानून दरकिनार किया जाएगा।
इंडियन कौंसिल आॅफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) की रिपोर्ट में बताया गया है कि 543 ग्राम अनाज प्रति व्यक्ति प्रति दिन की जरूरत है, पर हम 490 ग्राम से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। लेकिन आईसीएमआर की उक्त रिपोर्ट आदिवासी अंचलों के खानपान की आदतों को शामिल नहीं करती, जहां भोजन के लिए आदिवासियों की पूरी निर्भरता जंगलों पर थी। जंगलों से जब आदिवासियों को अलग किया गया, तो विकास के नेहरूवादी मॉडल में प्रखंड विकास की अवधारणा थी और उसी अवधारणा में ग्रेन गोला का प्रावधान था। मगर आजादी के बाद लंबे समय तक मौजूद देश के हर गांव से ग्रेन गोला को समाप्त किया जाना कोई अक्लमंदी का काम नहीं था। इन ग्रेन गोला में आदिवासियों के अनाज का भंडारण किया जाता था और सूखे की स्थिति में उनका अनाज वापस किया जाता था। फिर जन-वितरण प्रणाली (पीडीएस) को संपूर्ण देश में लागू न किया जाना भी समझदारी नहीं है। जैसे छत्तीसगढ़ और हिमाचल प्रदेश में सहकारिता समिति और ओडिशा में ग्राम पंचायतों के जिम्मे जन-वितरण प्रणाली की दुकानें संचालित होती हैं। इस कारण गरीबों और जरूरतमंदों तक अनाज की आपूर्ति सफलतापूर्वक की जाती है। पर बिहार, झारखंड, राजस्थान में निजी बिक्रेता पीडीएस की दुकानें चलाते हैं, जहां उनकी मनमानी है और इस वजह से भूख से उपजी मौत जारी है।

अमरेंद्र किशोर

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