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राजनीति: सोशल मीडिया और चुनौतियां

सोशल मीडिया और गैजेटों की लत के कारण युवाओं में शारीरिक और मानसिक व्याधियां तेजी से बढ़ रही हैं। इससे उनमें निराशा व कुंठा पनप रही हैं और एक नए प्रकार की सांस्कृतिक विसंगति को जन्म दे रही हैं। यह संस्कृति न केवल सामाजिक संबंधों में उनकी सहभागिता को कम करती है अपितु उन्हें भय एवं आक्रामकता का शिकार बनाती है।

Author June 12, 2019 1:17 AM
सोशल मीडिया ने संचार और संवाद करने के तरीके को पूरी तरह से बदल दिया है।

ज्योति सिडाना

सहस्राब्दि जनसंख्या का अस्सी फीसद हिस्सा संदेश लिख कर या आॅनलाइन संवाद करना ज्यादा पसंद करता है। यह खुलासा आॅफकॉम के एक अध्ययन में हुआ है। इसके अनुसार सोलह से चौबीस वर्ष की आयु के पंद्रह फीसद युवा अपने फोन का इस्तेमाल लोगों से बातचीत के लिए नहीं करना चाहते, बल्कि मौखिक बातचीत के स्थान पर वे संदेश भेजना अधिक पसंद करते हैं। आज की किशोर पीढ़ी एक ही कमरे में अपने आसपास बैठे लोगों से बात करने के बजाय संदेश ही भेजती है। दरअसल, हम एक शोर रहित और आवाज रहित विश्व का हिस्सा बन चुके हैं। सार्वजनिक स्थानों पर होते हुए भी एक निजी विश्व निर्मित हो जाता है, जैसे भीड़ में, ट्रेन में, सड़क पर कहीं भी चलते हुए या बैठ कर हम ईअरफोन के जरिए अपना प्रिय संगीत सुन सकते हैं। जबकि एक-दो दशक पहले तक ट्रेन या बस में यात्रा करते समय लोग एक-दूसरे से बातचीत करके परिचय बढ़ाने में रुचि रखते थे, राजनीतिक व गैर-राजनीतिक विषयों पर चर्चा करते थे, खाना-पीना साझा करते थे, लेकिन अब यात्रा के दौरान ऐसा कोई शोर नहीं सुनाई देता, कोई अनुभव नहीं होता। अधिकांश लोगों के कानों में ईअरफोन या हेडफोन नजर आता है, या फिर मोबाइल, लैपटॉप पर वीडियो देखने में व्यस्त होते हैं। संभवत: इसलिए इस पीढ़ी को ‘खामोश पीढ़ी’ की संज्ञा दी जाती है।

अब इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि सोशल मीडिया ने संचार और संवाद करने के तरीके को पूरी तरह से बदल दिया है। एक समय था जब लोग देर तक लैंडलाइन फोन पर अपने दोस्तों, परिवारजनों से बातचीत करते थे, विशेष अवसरों जैसे सालगिरह, त्योहार, पदोन्नति, नया सामान खरीदने इत्यादि पर फोन पर बधाई का तांता लग जाता था। पर अब हर अवसर पर केवल संदेश भेज कर काम चल जाता है। कितना अजीब है कि एक ही संदेश हम सबको भेज देते हैं? यह कैसे संभव है कि सबके लिए हमारी भावनाएं, हमारा प्यार या दुआएं एक जैसी हों? और यह भी सच है कि आमने-सामने या फोन की आवाज पर जो बधाई मिलती है, उसमें अलग ही आनंद आता है क्योंकि उसमें हंसी-मजाक और बहुत सारी दुआएं भी शामिल होती हैं। सोशल मीडिया ने इन सब चीजों को सामाजिक जीवन से गायब कर दिया है। मनुष्य केवल खुद तक सीमित हो गया है, इसलिए शायद अब सेल्फी का जमाना है, समूह फोटो का नहीं। फिर चाहे होटल में खाना खाते समय या किसी मॉल में घूमते समय, या शादी पार्टी के लिए तैयार होते समय सेल्फी लीजिए और तुरंत फेसबुक अथवा सोशल मीडिया पर अपलोड कर दीजिए, ताकि आपकी फोटो पर अधिक से अधिक कमेंट और लाइक मिल सकें। यदि आप यह सब नहीं करते तो आज के युग में आप सामाजिक प्राणी नहीं हैं, आपकी सामाजिक प्रतिष्ठा तुलनात्मक रूप से कम हो सकती है।

सामाजिक प्राणी और विकसित मस्तिष्क का स्वामी होने के नाते मनुष्य के लिए भाषा को संपर्क एवं संवाद स्थापित करने का सबसे प्रचलित और प्रभावी माध्यम माना जाता है। भाषा विज्ञानी सॉसर के अनुसार भाषा एक सामाजिक उत्पाद और वैयक्तिक व्यवहार दोनों है। अब सोशल मीडिया का उपयोग बढ़ने के बाद लोगों में संवाद या तो कम हो गया है या संदेशों में बदल गया है। जैसे-जैसे संवाद खत्म हो रहा है, वैसे-वैसे संस्कृति खत्म हो रही है, क्योंकि संस्कृति का पतन संवादहीनता से ही होता है। संस्कृति के भीतर संवेदनाएं, भावनाएं, अनौपचारिकता और अपनत्व की भावना होती है। संदेश-संस्कृति से जन साहित्य खत्म हो रहा है, इससे संस्कृति मर रही है। चूंकि संस्कृति जीवंत अनुभव होती है। यह टेक्नोलाजी निर्देशित सभ्यता आने वाले दौर में संस्कृति की हत्या का औजार बनेगी। क्या प्रौद्योगिकी का मनुष्य पर हावी होना विश्व युद्ध की आहट का संकेत दे रहा है? मौखिक संचार करने की शैली से व्यक्ति में भाषा विशेषज्ञता उत्पन्न होती है और उसमें अनुवाद करने की भी समझ विकसित होती है। संदेशों के माध्यम से नीरसता उत्पन्न हो रही है क्योंकि एक ही संदेश सबको भेज दिया जाता है, यहां तक कि अधिकांशत: बिना पढ़े ही संदेश दूसरों के आगे सरका (फॉरवर्ड) दिए जाते हैं, बिना जांच किए कि वे सही हैं या गलत।

ऐसा नहीं है कि सोशल मीडिया ने सकारात्मक पक्षों को उत्पन्न नहीं किया। आज ऐसे बहुत से लोग हैं जो बोलना चाहते थे, पर उन्हें कोई मंच उपलब्ध नहीं था। आज सोशल मीडिया ने उन्हें वह मंच दिया है जहां वे अपनी बात रख सकते हैं, अपनी प्रतिभा दिखा सकते हैं और लोग ऐसा कर भी रहे हैं। परंतु यह भी सच है कि कोई भी टेक्नोलॉजी अपने आप में बुरी नहीं होती। उसका सदुपयोग या दुरुपयोग उसे अच्छा या बुरा साबित करता है। सोशल मीडिया ने मौन की संस्कृति, आक्रामकता की संस्कृति और विरोध की संस्कृति को तीव्र किया है। ये तीनों एक सीमा तक तो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए ठीक हैं, लेकिन इनसे लोकतंत्र के लिए खतरा भी उत्पन्न हुआ है। राजनीतिक उद्देश्यों के लिए जब व्यक्ति सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं, मीडिया कितना सही है कितना गलत, कौन-सी खबर सच है और कौन-सी झूठ, पुरानी सूचनाओं को कितने गलत तरीके से पेश किया जा रहा है, यह सब क्यों किया जा रहा है, जानना ज्यादा आवश्यक है। मीडिया खासतौर पर सोशल मीडिया जिस प्रकार की भूमिका निभा रहा है, वह संदेह के घेरे में है।

युवा पीढ़ी इस वक्त एक ऐसे संक्रमणकाल से गुजर रही है जो अनेक प्रकार की सामाजिक चिंताओं को उत्पन्न करता है। सोशल मीडिया के प्रति युवाओं के एक बहुत बड़े हिस्से का आकर्षण इसके आदी होने के स्तर तक जा पहुंचा है। वह सामाजिक जीवन के एक बहुत बड़े भाग को प्रभावित एवं निर्धारित करने लगा है। देर रात तक चैटिंग करना या आॅनलाइन गेम खेलना, सेल्फी लेने का शौक, वॉट्सएप का अनवरत प्रयोग करना और अध्ययन सामग्री के लिए विभिन्न साइटों की खोज में संलग्न रहना, वे पक्ष हैं जो यह दर्शाते हैं कि सोशल मीडिया ने सामाजिक जीवन को व्याधिकीय स्तर तक प्रभावित किया है। इसीलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने आॅनलाइन गेम खेलने की लत को मानसिक रोग की श्रेणी में शामिल किया है। सोशल मीडिया और गैजेटों की लत के कारण युवाओं में शारीरिक और मानसिक व्याधियां तेजी से बढ़ रही हैं। इससे निराशा व कुंठा पनप रही हैं और एक नए प्रकार की सांस्कृतिक विसंगति को जन्म दे रही हैं। यह संस्कृति न केवल सामाजिक संबंधों में उनकी सहभागिता को कम करती है अपितु उन्हें भय एवं आक्रामकता का शिकार बनाती है। कहीं न कहीं आत्महत्या की प्रवृत्ति के उत्पन्न होने में इस सांस्कृतिक विसंगति की भी भूमिका है।

सोशल मीडिया का एक विशिष्ट वर्ग बन गया है। इसमें से किसान, श्रमिक, आदिवासी, महिलाओं से जुड़े मुद्दे गायब हैं। ऐसे में यह सवाल तो उठता ही है कि सोशल मीडिया हाशिये के लोगों की आवाज क्यों नहीं बन पाया? इस पर सोचा जाना जरूरी है। एक तबका धीरे-धीरे ऐसा भी उभर रहा है जो सोशल मीडिया से ऊब गया है। वह अब किसी भी विषय पर कोई भी प्रतिक्रिया नहीं करता। लोग अब विरोध के स्वर सुनना नहीं चाहते, उन्हें सिर्फ प्रशंसा और समर्थन की आदत हो गई है। इसलिए जब मीडिया मनुष्य को नियंत्रित करने लगे तो समाज में इसके खतरे दिखाई देने लगते हैं। दासता किसी की भी हो, मनुष्य की या टेक्नोलॉजी की, विकास के मार्ग में बाधा ही उत्पन्न करती है।

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