ताज़ा खबर
 

राजनीति: बिखरता समाज और चुनौतियां

हाल में डेटिंग ऐप ‘टिंडर’ ने अठारह से पच्चीस साल के बीच के भारतीय युवाओं पर सर्वे किया था। इसके अनुसार आने वाले पांच सालों में अधिकांश युवाओं की पहली प्राथमिकता खुद के लिए जीना है। हैरान करने वाली बात है कि शादी ही नहीं।

Author May 15, 2019 1:28 AM
टूटते घर और बिखरते रिश्ते आज एक बड़ी वैश्विक चिंता बन गए हैं।

मोनिका शर्मा

किसी भी देश में सामाजिक व्यवस्था का ताना-बाना ही जीवन का आधार होता है। सामाजिक व्यवस्था का आधार परिवार को माना गया है। लेकिन सह-अस्तित्व की इस अहम कड़ी के टूटने और एकाकी परिवारों के बढ़ते चलन से अब पूरी दुनिया फिक्रमंद है। चिंता लाजिमी भी है, क्योंकि परिवार भले ही समाज की सबसे छोटी इकाई है और इसी की बुनियाद पर पूरी सामाजिक व्यवस्था की इमारत खड़ी होती है। भारतीय संस्कृति में तो पूरे विश्व को ही परिवार मानने का विचार समाहित है। हमारे यहां नई पीढ़ी को संस्कार देने की बात हो या एक दूजे के सुख-दुख में साथ देने वाले आधार का मामला, परिवार की भूमिका को बहुत अहम बताया गया है। यों भी परिवार का हिस्सा बनना, अपनों के साथ एक छत के नीचे रहना भर नहीं है। यह एक संपूर्ण जीवनशैली है जो परिवार के हर सदस्य को सुरक्षा और संबल देती है। परिवार का हिस्सा होना भर ही उस सोच का आधार बनता है जो हमें अपनी ही जड़ों से जोड़ती है। ऐसे में पारिवारिक व्यवस्था में आ रहा बिखराव वाकई विचारणीय है। टूटते घर और बिखरते रिश्ते आज एक बड़ी वैश्विक चिंता बन गए हैं।

परिवार को वैश्विक समुदाय का ही लघु रूप कहा जाता है। एक ऐसी इकाई जो स्नेह और सहभागिता की मानवीय समझ को पोषित करने वाला परिवेश तैयार करती है। ऐसे में परिवारों के बिखरने से पूरा वातावरण ही बदल रहा है। बच्चों, बुजुर्गों और युवाओं के जीवन से बहुत कुछ रीत रहा है। युवा पीढ़ी एकाकीपन और अवसाद से जूझ रही है। इतना ही नहीं, परिवारों में आ रही टूटन से अपराध, असुरक्षा और असामाजिकता का वातावरण बन रहा है। मौजूदा समय में बढ़ती कटुता, असामंजस्य, अकेलापन और असुरक्षा के माहौल में पारिवारिक बिखराव से सारी दुनिया चिंतित है। भारत ही नहीं, वैश्विक समुदाय में भी एक साझा समझ और सह-अस्तित्व के भाव की दरकार है। निस्संदेह ऐसी सार्थक सोच के बीज परिवार में ही पनपते हैं। हाल के बरसों में संयुक्त परिवार की संस्कृति तो खत्म हो ही रही है, एकल परिवारों में भी स्थितियां संतोषजनक नहीं हैं। यहां तक कि युवाओं की प्राथमिकताओं में तो घर बसाने की सोच के बजाय खुद के लिए जीने का नया चलन दिख रहा है।

हाल में डेटिंग ऐप ‘टिंडर’ ने अठारह से पच्चीस साल के बीच के भारतीय युवाओं पर सर्वे किया था। इसके अनुसार आने वाले पांच सालों में अधिकांश युवाओं की पहली प्राथमिकता खुद के लिए जीना है। हैरान करने वाली बात है कि शादी ही नहीं, आर्थिक सुरक्षा जैसा अहम पहलू भी इस आयु के युवाओं की पहली पांच प्राथमिकताओं में शामिल नहीं है। भारत के शीर्ष बीस शहरों के युवाओं पर किए गए इस अध्ययन की रिपोर्ट के अनुसार शिक्षा का स्तर बढ़ने और शहरीकरण में वृद्धि के चलते युवा पीढ़ी स्वतंत्र होना चाहती है। इस अध्ययन के मुताबिक खुद के लिए जीना छप्पन फीसद युवाओं की पहली प्राथमिकता है। बावन फीसद युवा पढ़ाई पूरी करना अपनी पहली प्राथमिकता मानते हैं, जबकि बयालीस फीसद युवाओं के लिए विश्व भ्रमण पहली प्राथमिकता है। शादी कर घर बसाने का निर्णय लड़के और लड़कियों दोनों के लिए प्राथमिकताओं की इस फेहरिस्त में काफी नीचे है। कोई हैरानी की बात नहीं कि हाल के वर्षों में अपने ही सामाजिक-पारिवारिक परिवेश से नई पीढ़ी की दूरियां बढ़ी हैं। यही वजह है कि अब निजी स्वतंत्रता सामाजिक दायित्वों और पारिवारिक रिश्तों से ज्यादा अहम हो चली है। यह सोच पारिवारिक संस्था की पूरी रूपरेखा को प्रभावित कर रही है।

दरअसल, परिवार जैसी संस्था बुजुर्गों के लिए सुरक्षा कवच के समान है, तो बच्चों के लिए संस्कार की पाठशाला। इतना ही नहीं, सह-अस्तित्व की सोच को पोषित करने वाला पीढ़ियों का साथ सहिष्णुता भी सिखाता है। भावनात्मक बंधन व्यावहारिक मुश्किलें भी आसान करते हैं। ऐसे में परिवारों का टूटना अंतत: सामाजिक अलगाव के हालात ही पैदा कर रहा है। एकाकी परिवारों की संख्या जिस तेजी से बढ़ रही है, वह गंभीर चिंता का विषय है। इसी अनुपात में अकेलेपन और अवसाद जैसी समस्याओं के आंकड़े भी बढ़ रहे हैं। हर उम्र, हर तबके के लोग समाज में उपेक्षा और एकाकीपन के शिकार हो रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 2020 तक भारत में अवसाद दूसरा सबसे बड़ा रोग होगा। कहना गलत नहीं होगा कि पारिवारिक व्यवस्था का बिखराव अवसाद के शिकार लोगों की तादाद बढ़ा रहा है।

उपभोक्तावादी संस्कृति ने समाज और रिश्तों में एक असंतुलन ला दिया है। निष्ठा और प्रतिबद्धता का भाव अब करीबी संबंधों में भी कम ही दिखता है। आर्थिक विषमताओं के चलते उपजे भेदभाव अब पारिवारिक रिश्तों में भी दिखने लगे हैं। कभी सिर्फ नाराजगी एवं मनमुटाव तक रहने वाले हालात अब जीवन छीनने तक जा पहुंचते हैं। हताशा और अकेलापन इस कदर हावी होते जा रहे हैं कि असंतोष और अधीरता की भावना अपनों को भी हानि पहुंचाने से नहीं चूकती। रिश्तों से रिसता भरोसा और अपनापन पूरी सामाजिक व्यवस्था के लिए चिंतनीय बना हुआ है।

पारिवारिक व्यवस्था का बिखराव समाज में आपराधिक घटनाओं को भी बढ़ावा दे रहा है। अब न तो अभिभावकों के पास बच्चों को समझने का समय है और न ही बच्चों में बुजुर्गों की सुरक्षा की चिंता करने का भाव। स्नेह और सहयोग की तो सोच ही नदारद है। यह वाकई चिंतनीय है कि आपसी संवाद और समझ की कमी से रिश्तों में आ रही दरार अब और चौड़ी होती जा रही है। पारिवारिक विघटन के चलते परिवारजनों में ही हत्या, आत्महत्या और मारपीट जैसे मामले बढ़ रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र की महिला इकाई के अध्ययन के अनुसार सैंतीस फीसद भारतीय महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार होती हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2016 में बलात्कार के 94.6 फीसद पंजीबद्ध मामलों में बतौर आरोपी पीड़िताओं के दादा, पिता, भाई और बेटे तक शामिल हैं। ऐसे दुर्भाग्यपूर्ण मामले बताते हैं कि भारत की जिस पारिवारिक सुदृढ़ता का मान दुनिया भर में किया जाता है, वह आज किस कदर रक्तरंजित और असुरक्षित हो रही है। बेटों द्वारा संपत्ति के विवाद या प्रतिशोध की खातिर माता-पिता की हत्या करने तक के मामले आए दिन सामने आते रहते हैं। गांवों-कस्बों से लेकर महानगरों तक ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं जिनमें भाई-भाई का आपसी विवाद हत्या तक जा पहुंचता है। संवेदनशून्य माहौल ने पारिवारिक रिश्तों में ऐसी खटास ला दी है कि यह हर तबके में पारिवारिक संरचना के विघटन के लिए जिम्मेदार है।

सोशल मीडिया ने भी सामाजिक और पारिवारिक रिश्तों में सेंध लगाई है। असल दुनिया में संवाद की कमी और आभासी संसार में बीत रहा समय, रिश्तों में असंतोष पैदा कर रहा है। आभासी दुनिया की तथाकथित सामाजिकता ने हमें वास्तविक दुनिया में सामाजिक रूप से हाशिये पर धकेल दिया है। इसमें कोई शक नहीं कि सोशल मीडिया की व्यस्तता की वजह से अपने रिश्तों के प्रति ही नहीं, पारिवारिक और सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों के सम्मान में भी लगातार कमी आ रही है। सहयोग, संरक्षण और स्नेह का भाव खत्म होता जा रहा है। यह हमारी समाज व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है। जरूरी है कि इस बिखराव को गंभीरता से लिया जाए, आपसी जुड़ाव की राहें तलाशी जाएं, समाप्त हो रहे पारिवारिक मूल्यों को पुनर्स्थापित करने के प्रयास किए जाएं, ताकि हर व्यक्ति का मन और जीवन की बुनियाद बनाने वाली परिवार नामक संस्था पूरे मान के साथ कायम रहे। यह सुरक्षा और संरक्षण परिवार में ही संभव है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App