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राजनीति: बिखरते परिवार और बुजुर्ग

आज ज्यादातर बुजुर्ग घुट-घुट कर जीवन जीने को बाध्य हैं। यह आज के उपभोक्तावादी दौर का सबसे गंभीर परिणाम है। इसलिए परिवार में भय और हिंसा के पक्ष भी उभरे हैं। मनुष्य के मध्य संबंधों में अविश्वास उत्पन्न हुआ है, वह अलगाव का शिकार है, क्योंकि अमानवीय परिवेश इतना सघन रूप धारण कर चुका है कि वह किसी से भी अपनी इच्छाओं को साझा नहीं कर सकता।

Author Published on: October 17, 2019 1:39 AM
परिवार समाज की नींव होता है, क्योंकि यह सामाजिक संगठन की आधारभूत इकाई है।

ज्योति सिडाना

सामान्य रूप में वरिष्ठ नागरिक की अवधारणा को तीन आयामों से समझा जा सकता है। पहला जैवकीय, अर्थात उसकी आयु के आधार पर, दूसरा मनोवैज्ञानिक अर्थात व्यक्तित्व में शामिल स्थिरता के आधार पर और तीसरा सामाजिक-सांस्कृतिक आयाम यानी उनके अनुभवों के आधार पर। ये तीनों पक्ष किसी भी बुजुर्ग के व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा होते हैं। इसलिए ये समूह समाज के लिए एक उत्पादक इकाई बने रहते हैं। ये अपने अनुभवों को समाजीकरण की प्रक्रिया के माध्यम से नई पीढ़ी को इस आशा के साथ हस्तांतरित करते हैं कि अगर नई पीढ़ी उनके अनुभवों को अपने जीवन में प्रयुक्त करती चली जाएगी, तो उनके जीवन के जोखिम या खतरे कम होते जाएंगे। इसी वजह से इन्हें परिवार का मुखिया माना जाता है और परिवार में इनकी प्रतिष्ठा उच्च होती है।

लेकिन अब प्रौद्योगिकी, संस्कृति और गतिशीलता में परिवर्तन के कारण परिवार नाम की संस्था की संरचना तेजी से बदल रही है। इस कारण बुजुर्ग अलगाव, अकेलेपन और पृथक्करण का शिकार हो रहे हैं। परिवार के कई सदस्य स्थानिक गतिशीलता के कारण घर से अलग दूसरी जगह जाकर रहने लगते हैं। परिणामस्वरूप संयुक्त परिवार में जो भूमिका यह पीढ़ी निभा रही थी, वही भूमिका अब पालना घर जैसी बाजार की संस्थाएं निभा रही हैं। परिवार में अब बच्चों के समाजीकरण का काम अब बाजार या तकनीक करने लगी है।

संभवत: यही कारण है कि बच्चों में परिवार के प्रति भावनात्मक लगाव और सदस्यों के प्रति दायित्व की भावना नहीं पनपती। इसलिए ये पीढ़ी सामाजिक-आर्थिक असुरक्षा, भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक असुरक्षा का शिकार हो रही है। यह कहा जा सकता है कि व्यक्ति की मनोवैज्ञानिक और निजी आवश्यकताओं को संतुष्ट करने में परिवार की भूमिका अब कम महत्त्वपूर्ण हो गई है। इसके लिए दोष किसे दिया जाए, यह एक चिंतन का विषय हो सकता है?
परिवार समाज की नींव होता है, क्योंकि यह सामाजिक संगठन की आधारभूत इकाई है।

पूर्व के समाजों में परिवार विस्तृत नातेदारी का एक हिस्सा हुआ करता था, जबकि आधुनिक समाजों में परिवार नातेदारों और संबद्ध समुदायों से कट गए हैं। इसके परिणामस्वरूप भावनात्मक तनाव परिवार का एक आवश्यक, लेकिन नकारात्मक अवयव बन कर उभरा है। यह भी सच है कि सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रियाओं ने परंपरागत परिवारों के सामने अनेक संकट उत्पन्न किए हैं, जैसे तलाक की दर में वृद्धि, सहजीवन (लिव-इन-रिलेशनशिप), एकल अभिभावक परिवार, एक व्यक्ति परिवार इत्यादि। संभवत: ये परिवर्तन व्यक्तिवाद के बढ़ते प्रभाव को व्यक्त करते हैं जो परंपरागत परिवारों को चुनौती देते नजर आते हैं। इन परिवर्तनों ने समाज में असुरक्षा, अस्थिरता, तनाव को बढ़ावा दिया है और अब ये परिवारों में भी प्रवेश कर चुके हैं।

आज ज्यादातर बुजुर्ग घुट-घुट कर जीवन जीने को बाध्य हैं। यह आज के उपभोक्तावादी दौर का सबसे गंभीर परिणाम है। इसलिए परिवार में भय और हिंसा के पक्ष भी उभरे हैं। मनुष्य के मध्य संबंधों में अविश्वास उत्पन्न हुआ है, वह अलगाव का शिकार है, क्योंकि अमानवीय परिवेश इतना सघन रूप धारण कर चुका है कि वह किसी से भी अपनी इच्छाओं को साझा नहीं कर सकता।

देखा जाए तो एक तरफ तो समाज में स्वतंत्रता बढ़ी है, परंतु पहले की तुलना में व्यक्ति आज अधिक जकड़न में है क्योंकि उसके पास स्वाभाविक और स्वतंत्र जीवन जीने का समय ही नहीं बचा है। अविश्वास, धोखा, स्वार्थपरकता, भावनाओं का व्यवसायीकरण, प्रसिद्धि के द्वारा स्वयं को स्थापित करने की कोशिशें जैसे घातक पक्ष अब जीवन में शामिल हो चुके हैं। इसलिए वह इतना एकाकी है कि किसी पर भी भरोसा नहीं करता, उसकी आंतरिक शक्ति समाप्त हो चुकी है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार देश में बुजुर्गों के खिलाफ अपराध में 4.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। साल 2016 में देशभर में वरिष्ठ नागरिकों के खिलाफ इक्कीस हजार से ज्यादा मामले दर्ज किए गए थे। वरिष्ठ नागरिकों के खिलाफ अपराधों के मामले में महाराष्ट्र सबसे आगे है, जहां ऐसे कुल चार हजार छह सौ चौरानवे मामले सामने आए। उसके बाद मध्यप्रदेश (3,877), तमिलनाडु (2,895) और आंध्र प्रदेश (2,243) का स्थान आता है। भारत में 2011 की जनगणना के अनुसार साठ वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की संख्या एक सौ चार करोड़ थी, जिनमें इक्यावन करोड़ पुरुष और तिरपन करोड़ महिलाएं थीं। इनकी देखभाल के लिए सरकार और स्वंयसेवी संगठनों की तरफ से तमाम योजनाएं चलाई जाती हैं, जिसकी उन्हें जानकारी भी नहीं होती।

हाल के एक अध्ययन में सामने आया कि देश में पैंसठ वर्ष की आयु से ज्यादा के उनतीस प्रतिशत लोग अकेले रहते हैं, क्योंकि इनके बच्चे या तो विदेश में रहते हैं या नौकरी की वजह से दूसरे शहरों में रह रहे हैं। इनमें से बहुत से बुजुर्ग ऐसे भी हैं जिनके आगे-पीछे कोई नहीं है। ऐसे में ये बुजुर्ग घर में अकेले रहने के दौरान या अकेले बाहर निकलते वक्त अपराधियों के लिए आसान निशाना होते हैं। बुजुर्गों के साथ तेजी से बढ़ रही अपराध की घटनाएं इसी ओर संकेत करती नजर आती हैं।

परंपरागत परिवारों में वरिष्ठ सदस्यों के द्वारा सदस्य को भावनात्मक समर्थन मिलता था। जब घर का कोई छोटा सदस्य या बच्चा अपने पेशे या नौकरी में निराशा और तनाव का सामना करता था तो बुजुर्ग उसके लिए सुरक्षा का कवच बन कर खड़े हो जाते थे। परिवार के वरिष्ठ सदस्य नई या युवा पीढ़ी के लिए एक परामर्शदाता की भूमिका निभाते थे। लेकिन तेजी से बदलते परिवेश ने उनकी इस भूमिका को हाशिए पर ला दिया है। समाज वैज्ञानिक मिशेल बैरेट तर्क देती हैं कि परिवार की अवधारणा में ऐसे तत्व भी होते हैं जो उसे समाज विरोधी बनाते हैं, क्योंकि यह महिलाओं के शोषण की वैधता को स्थापित करता है और परिवार के परिवेश के बाहर महिला के जीवन की किसी भी संभावना को समाप्त करता है। अत: परिवार के इस चरित्र को बदलने की आवश्यकता है।

देखा जाए तो अर्थव्यवस्था का परिवार से घनिष्ठ संबंध होता है। जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था व्यक्तिवादी होती जा रही है, वैसे-वैसे परिवार में भी व्यक्तिवादिता का मूल्य बढ़ता जा रहा है। कृषि युग में संयुक्त परिवार थे, औद्योगिक युग में एकाकी परिवार, सेवा क्षेत्र के युग में एकल अभिभावक परिवार और डिंक परिवार (डबल इनकम नो किड्स) और उत्तर-औद्योगिक अर्थव्यवस्था में एकल व्यक्ति परिवार अस्तित्व में आए हैं। परिणामस्वरूप समाज में सामूहिकता की समाप्ति या परिवार की समाप्ति की घोषणा की जा सकती है।

जब परिवार संस्था ही समाप्ति के कगार पर खड़ी हो तो समाज या सामाजिक संघठन के विघटन को कैसे रोका जा सकता है? परिवार प्रणाली में होने वाले इस विघटन को रोकने के लिए आवश्यक है कि लोकतांत्रिक मूल्यों को परिवार में शामिल किया जाए, लैंगिक समानता को स्थापित किया जाए, लड़के-लड़की को समान शिक्षा और मूल्य दिए जाएं, परिवार में संबंधों में ऊंच-नीच जैसे भेदभाव को समाप्त किया जाए, प्रत्येक सदस्य एक-दूसरे का सम्मान करे, तकनीक या सोशल मीडिया पर निर्भरता को कम करके परिवार के सदस्यों को महत्त्व देने, भौतिक वस्तुओं की तुलना में मानवीय संबंधों को अधिक महत्त्व देने जैसे प्रयास जरूरी हैं।

अगर परिवार मजबूत होता है तो समाज मजबूत होता है और समाज मजबूत होता है तो राज्य भी मजबूत होता है। राज्य मजबूत होता है तो अर्थव्यवस्था, राजनीति, संस्कृति सभी व्यवस्थाएं मजबूत होती चली जाती हैं। किसी भी राष्ट्र का मजबूत और कामयाब होना उसकी परिवार प्रणाली की मजबूती पर निर्भर करता है और परिवार की मजबूती वरिष्ठ नागरिकों की भूमिका पर आश्रित होती है। इसलिए इस विषय पर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है।

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