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राजनीति: भूजल संकट की गंभीरता

भूजल संकट की बात को अगर और पुख्ता करना चाहें तो संयुक्त राष्ट्र की अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट पर नजर डाल लेनी चाहिए।

Author Published on: January 21, 2020 12:21 AM
जलवायु परिवर्तन और अतिदोहन से घटते भूजल के कारण प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता पिछले दशकों के मुकाबले तेजी से घट गई है।

सुविज्ञा जैन

घटते भूजल की चिंता बढ़ती जा रही है। हाल में दुनिया के चौरानवे देशों के एक हजार से ज्यादा वैज्ञानिकों, जल विशेषज्ञों और संबंधित जानकारों ने इस ओर ध्यान दिलाते हुए दुनियाभर की सरकारों और गैर सरकारी संगठनों के नाम एक बयान जारी किया है। यह मसला हाल फिलहाल उतना बड़ा जरूर न दिख रहा हो, लेकिन साल दर साल जिस तरह भूजल संकट बड़ा बनता जा रहा है, उसके मद्देनजर फौरन ही चेत जाना चाहिए। पिछली सदी के अस्सी के दशक से आज तक दुनिया में पानी की खपत हर साल कम से कम एक फीसद बढ़ रही है। इस हिसाब से यह अंदाजा भी लग गया है कि कितनी भी किफायत बरत लें, आज की तुलना में 2050 तक दुनिया को कम से कम तीस प्रतिशत अतिरिक्त पानी की जरूरत पड़ेगी ही पड़ेगी। पिछले हफ्ते जारी वैज्ञानिकों का बयान चेता रहा है कि इसे दूर की बात न मानें बल्कि निकट भविष्य में भी खतरे की घंटी बजने को है। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि जल संकट कोई नई चिंता है। पिछले तीन दशक से इसे जताया जा रहा है।

ये अलग बात है कि इस बीच कोई बड़ा हादसा हुआ दिखाई नहीं दिया। सवाल उठना स्वाभाविक है कि बढ़ती मांग के बावजूद पानी का इंतजाम हो कहां से रहा है। जवाब है कि सतही जल कम पड़ने के बाद पूरी दुनिया में जमीन के नीचे आरक्षित भूजल का दोहन बढ़ता गया। दुनिया की जो हालत है, वह तो फिर भी उतनी खराब नहीं है जितनी कि अपने देश की है। इसका सीधा-सा कारण है कि दुनिया में इस समय जितना भूजल दोहन हो रहा है, उसका एक चौथाई सिर्फ भारत में जमीन से उलीचा जा रहा है। जबकि भौगोलिक तथ्य यह है कि दुनिया में जितनी जमीन है, उसकी तुलना में भारत की भूमि का क्षेत्रफल सिर्फ ढाई फीसद है। इस हिसाब से देखें, तो हम विश्व के मुकाबले कोई दस गुना भूजल दोहन कर रहे हैं, यानी घटते भूजल से होने वाला खतरा सबसे ज्यादा हमारे सामने ही है।

इसे ज्यादा दोहराने की जरूरत नहीं कि बढ़ती आबादी, जलवायु परिवर्तन और अतिदोहन से घटते भूजल के कारण प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता पिछले दशकों के मुकाबले तेजी से घट गई है। कहा जा सकता है कि सिर्फ हम नहीं, बल्कि दुनिया के कई इलाके पानी की किल्लत से जूझ रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र की ‘वर्ल्ड वाटर डवलपमेंट’ रिपोर्ट के मुताबिक करीब चार सौ करोड़ लोग यानी दुनिया की दो तिहाई आबादी ऐसे क्षेत्रों में रह रही है, जहां साल के कई महीनों में पानी की भारी किल्लत रहती है और इनमें से दो सौ करोड़ लोग ऐसे हैं जो पूरे साल ही पूर्ण रूप से पानी का संकट झेल रहे हैं। इन क्षेत्रों को ‘वाटर स्ट्रेस्ड’ क्षेत्र कहा जाता है। गंभीर बात यह है कि पानी की बेहद कमी वाले इन क्षेत्रों में वे क्षेत्र भी शामिल हैं जहां बारिश से पर्याप्त जल मिलता है। पर्याप्त वर्षा के बावजूद जल संकट का मुख्य कारण वहां बारिश के पानी का सीमित भंडारण है। बारिश से मिलने वाले पानी को पूरा-पूरा रोक कर रखने में ज्यादातर छोटे और विकासशील देश आज भी असमर्थ हैं। दरअसल, वर्षा जल भंडारण एक खर्चीला काम है। जिन गरीब और विकासशील देशों को अपने विकास में पानी का महत्त्व समझ में आ रहा है, वे इस ओर ध्यान तो देना चाहते हैं, लेकिन इसमें उनकी माली हालत आड़े आ जाती है। हालांकि यह सवाल जरूर उठाया जा सकता है कि जीवन के लिए सबसे जरूरी चीज पानी के इंतजाम के लिए क्या आर्थिक संसाधन का तर्क दिया जा सकता है?

भारत की बात करें तो क्या इस स्थिति पर हैरत नहीं होनी चाहिए कि बारिश के महीनों में जो क्षेत्र बाढ़ से जूझते हैं, वे इलाके बाकी के महीनों में पानी की किल्लत में रहने लगे हैं। अभी तक तो किल्लत वाले इलाकों में कामकाज किसी तरह चल रहा था। इसका कारण था भूजल की पर्याप्त उपलब्धता, यानी भूजल को उलीच कर काम चल रहा है। लेकिन अब चेत जाना चाहिए, क्योंकि भूजल चुकने लगा है। भूजल चुकने का कारण भी साफ है। बारिश से ही सतही जल और भूजल दोनों का पुनर्भरण होता है। लेकिन भूजल के पुनर्भरण की एक गति है। पिछले कुछ समय में जिस रफ्तार से जमीन से पानी निकाला जा रहा है, वह पुनर्भरण की रफ्तार से तेज है। जाहिर है, भूजल घटता जा रहा है। देश में कई क्षेत्र ऐसे हैं, जहां भूजल खत्म होने को है या पहुंच से काफी नीचे चला गया है। इसके लिए अगर पूरी ताकत लगा दें, फिर भी इसके पुनर्भरण में कई साल लग जाएंगे। इसीलिए वैज्ञानिकों और जल विशेषज्ञों ने पिछले महीने जो बयान जारी किया है, उसमें कहा गया है कि भूजल पर ज्यादा सोचने के लिए अब बिल्कुल समय नहीं बचा है।

भूजल संकट की बात को अगर और पुख्ता करना चाहें तो संयुक्त राष्ट्र की अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट पर नजर डाल लेनी चाहिए। इसके मुताबिक इस समय दुनिया में दो अरब लोग पीने के पानी के लिए भूजल पर आश्रित हैं। यही नहीं, खेती के लिए भी चालीस फीसद पानी जमीन से लिया जा रहा है। यहां तक कि कई नदी-तालाबों का स्रोत भी भूजल ही है। वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट के ‘वॉटर रिस्क एटलस’ के मुताबिक एक सौ चौरासी में से करीब सत्रह देश ऐसे हैं जो जल संकट की ‘अति गंभीर’ श्रेणी में आ चुके हैं। ये वे देश हैं जहां कहा जाता है कि डे जीरो अब दूर नहीं। डे जीरो यानी वह दिन जब सभी नल सूख जाएंगे। इन देशों में कतर, इजराइल, लीबिया, जॉर्डन, ईरान, कुवैत, ओमान जैसे देश शामिल हैं। भारत भी इन्हीं में एक है। इस सूची में भारत का होना समस्या की गंभीरता समझने के लिए काफी माना जाना चाहिए।

ऐसा भी नहीं है कि भूजल संकट को लेकर भारत में समय-समय पर चिंताएं न जताई गई हों। पिछले साल ही नीति आयोग ने ‘वाटर कंपोजिट इंडेक्स’ रिपोर्ट में बताया था कि आने वाले एक साल में इक्कीस भारतीय शहरों में भूजल लगभग खत्म होने जा रहा है। भारत में आज बयासी करोड़ लोग ऐसे इलाकों में रह रहे हैं, जहां प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष जल उपलब्धता सिर्फ एक हजार घनमीटर या उससे कम है। जबकि अंतरराष्ट्रीय मानदंड के मुताबिक प्रति व्यक्ति सालाना कम से कम एक हजार सात सौ घनमीटर पानी से ज्यादा उपलब्ध होना चाहिए।

भूजल के आसन्न संकट के सुविधाजनक समाधानों की सूची लंबी होती जा रही है। इन समाधानों में पानी का किफायत से इस्तेमाल का नारा प्रमुख है। जल संरक्षण में नागरिकों की भूमिका भी जोर-शोर से प्रचारित की जा रही है। वक्त-वक्त पर भूजल दोहन को कानूनी डंडे से रोकने के समाधान भी बताए जाते हैं। लेकिन जिस एक प्रमुख कारण की चर्चा कम होती है, वह है भूजल का अंधाधुंध दोहन। इसकी जरूरत इसलिए पड़ रही है कि वर्षा जल को रोक कर रखने का पर्याप्त प्रबंध हमारे पास नहीं है। हमें हर साल चार हजार अरब घनमीटर पानी प्रकृति से मिलता है, जिसमें से सिर्फ दो सौ सत्तावन अरब घनमीटर पानी हम बांधों, जलाशयों में रोक पाते हैं। जबकि विशेषज्ञ बताते हैं कि बारिश के दौरान हमें छह सौ नब्बे अरब घनमीटर वह सतही जल आसानी से उपलब्ध है जिसे गैर बारिश वाले आठ महीनों के लिए रोककर रखा जा सकता है। यदि यह पानी भंडारित हो तो भूजल पर निर्भरता अपने आप ही कम हो सकती है।

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