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वैज्ञानिक दृष्टिकोण और बच्चे

हमारी वैज्ञानिक चेतना का स्तर क्या है? सरकार और समाज के समक्ष यह गंभीर सवाल है। दरअसल, अभी भी हमारी जनता का एक बहुत बड़ा हिस्सा अज्ञान का बोझ ढो रहा है। यदि समाज में अराजकता पर अंकुश नहीं लगता तो हम पुलिस को कोसते हैं। इस दृष्टि से देखा जाए तो समाज में व्याप्त अंधविश्वासों पर अंकुश न लगने के लिए वे लोग जिम्मेदार हैं जिन पर वैज्ञानिक सोच विकसित करने की जिम्मेदारी है।

Author Published on: March 5, 2019 3:49 AM
बच्चे के लिए स्क्रीन का इस्तेमाल हानिकारक होता है (Source: File Photo)

सुभाष चंद्र लखेड़ा

आधुनिक युग को विज्ञान और प्रौद्योगिकी का युग कहा जाता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने के लिए यह जरूरी है कि हम अपने बच्चों को ऐसी सभी जानकारियां देने के उपाय करें जो उनमें वैज्ञानिक सोच पैदा करने और उसे बढ़ाने में सहायक हों। आखिर, आज के बच्चे ही आने वाले समय में राष्ट्र का नेतृत्व संभालेंगे। हमारे यहां जाने-अनजाने समाज का एक बड़ा हिस्सा आज भी अपने बच्चों को उसी अंधेरे में रखना चाहता है जिसमें लोग स्वयं पले-बढ़े हैं। ऐसे संगठनों की भी कमी नहीं है जो चाहते हैं कि बच्चों की सोच को एक ऐसे सांचे में ढालना निहायत जरूरी है जो उनके एजेंडे को बढ़ाने में सहायक हो। विभिन्न धार्मिक संगठन इस दिशा में कोशिशें करते रहते हैं। बहरहाल, भारत जैसे देश में इस तरह के कार्यों पर अंकुश लगाना संभव नहीं है, किंतु वैचारिक स्वतंत्रता में यकीन रखने वाले लोग और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के हिमायती अपनी तरफ से ऐसी कोशिशें कर सकते हैं जिनसे भारत की नई पीढ़ी को उस सोच से बचाया जा सके जो व्यक्ति को मानसिक रूप से गुलाम और असहिष्णु बनाती है। प्रजातंत्र की मजबूती के लिए भी ऐसा करना बेहद जरूरी है। इस सिलसिले में गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर द्वारा कही हुई यह बात गौरतलब है कि किसी बच्चे की शिक्षा अपने ज्ञान तक सीमित मत रखिए, क्योंकि वह किसी और समय में पैदा हुआ है।’ यहां मुख्य बात यह है कि बच्चों को किसी विषय से संबंधित सटीक जानकारी वही व्यक्ति दे सकता है जिसे स्वयं उस विषय का ज्ञान हो। यदि हमें किसी विषय का स्वयं ज्ञान नहीं है तो फिर हमें आधी-अधूरी जानकारी देने का प्रयास नहीं करना चाहिए।

ब्रिटेन में हुए एक अध्ययन से ज्ञात हुआ कि लगभग चालीस फीसद अध्यापक छात्रों को विज्ञान पढ़ाते समय गलतियां करते हैं। बच्चों के लिए विज्ञान संबंधी लेखन करते समय भी हमें सजग रहना चाहिए, अन्यथा अर्थ का अनर्थ हो सकता है। राह वही बताए जिसे स्वयं उस रास्ते के बारे में पूरी जानकारी हो। ऐसा न हो कि जो बच्चा आप से बुखार की दवा मांग रहा हो, आप उसे सरदर्द की दवा थमा रहे हों। अक्सर हमें यह सलाह सुनने को मिलती है कि बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण पैदा करने के लिए उनमें अपने आसपास की चीजों को समझने की प्रति जिज्ञासा पैदा करनी चाहिए। जबकि जिज्ञासा मनुष्य के जन्मजात स्वभाव का अंग है। इतना जरूर है कि इस जिज्ञासा का परिमार्जन कर इसे बढ़ाया जा सकता है, बिलकुल वैसे ही जैसे खेलना बच्चों का जन्मजात गुण होता है और उसे सही खानपान और प्रशिक्षण से सही दिशा दी जा सकती है। खेद की बात तो यह है कि कुछ लोग विज्ञान का सही अर्थ नहीं समझ पाते हैं। वे सोचते हैं कि विज्ञान को समझने-बूझने के लिए मोटे-मोटे पोथे पढ़ना और विभिन्न तरह के उपकरणों से घिरे रहना बेहद जरूरी है। दरअसल, विज्ञान तो वह सरल ज्ञान है जिसे कोई भी समझदार व्यक्ति आसानी से समझ सकता है और उसका सही ढंग से उपयोग कर सकता है।

बच्चों को विज्ञान का लाभ तभी मिल सकता है जब अभिभावक और अध्यापक इस ओर ध्यान देंगे। हमारा प्रयास यह होना चाहिए कि हम बच्चों को सरल ढंग से विज्ञान समझाएं। अगर हमारा ध्यान इस ओर होगा तो उसका दोहरा लाभ होगा। हमारे बच्चे स्वस्थ होंगे और वे अपने जीवन को वैज्ञानिक तरीके से जीने की कला में माहिर होते जाएंगे। बच्चों को ऐसी बातें ठीक तरह से तभी समझ आएंगी जब हमारा स्वयं का जीवन दर्शन वैसा होगा। केवल सैद्धांतिक ज्ञान देने से बात नहीं बनेगी। यदि हमारे बच्चे वैज्ञानिक तरीके से जीना सीख गए तो इस बात में कोई संदेह नहीं कि इसका लाभ केवल हमें नहीं, सारी दुनिया को मिलेगा। दरअसल, आज दुनिया जिन समस्याओं का सामना कर रही है, उसका कारण सिर्फ यह है कि हमने अपने बच्चों को यह नहीं बताया कि जीने की वैज्ञानिक कला क्या है और उससे हम अपने और दूसरों के जीवन को कैसे बेहतर बना सकते हैं?

आज दुनिया के सभी देश जिन समस्याओं का सामना कर रहे हैं उनमें भूख और बीमारी प्रमुख हैं। यदि हम बच्चों को शुरू से ही सही जानकारी देंगे तो इन समस्याओं का समाधान किया जा सकता है। तीन-चार वर्ष की आयु से ही बच्चों को यह बताना चाहिए कि भोजन का मानव के लिए क्या महत्त्व है और हमें उसे बर्बाद क्यों नहीं करना चाहिए। बढ़ती उम्र के साथ-साथ बच्चों को यह जानकारी भी देनी जरूरी है कि पौष्टिक आहार का क्या अर्थ है? खेद की बात तो यह है कि हम बच्चों को इस बारे में जानकारी देना तो दूर, उन्हें फास्ट फूड का आदी बना देते हैं। बाद में जब बच्चों को ऐसे खाद्य पदार्थों की आदत पड़ जाती है तो हम शिकायत करने लगते हैं। कई बीमारियों का ताल्लुक हमारे आहार से भी है। ऐसे में हम बच्चों में बचपन से ही संतुलित आहार लेने की आदत डाल कर इन समस्याओं के समाधान में योगदान दे सकते हैं।

बच्चों के बारे में एक प्रसिद्ध नियम है कि पेड़ वैसा ही आकार लेगा जैसे उसका पौधा तैयार किया जाएगा। हमें बच्चों को बचपन से ही साफ -सफाई के बारे में बताना चाहिए। व्यक्तिगत सफाई जरूरी है, लेकिन उससे कहीं अधिक जरूरी उस वातावरण को साफ रखना है जिसमें हम लोग रहते हैं और विचरण करते हैं। बच्चों को यह समझाना चाहिए कि वे अपने घर, स्कूल और आसपास के स्थानों को साफ -सुथरा रखने में कैसे मदद कर सकते हैं। आज हम सभी प्रदूषण की बात करते हैं। बच्चों को बताया जाना चाहिए कि कौन से काम नहीं करने चाहिए जिनसे प्रदूषण पर नियंत्रण पाया जा सकता है। उन्हें यह समझाया जाना चाहिए कि जहां तक संभव हो वे पेट्रोल और डीजल से चलने वाले वाहनों का तभी प्रयोग करें जब जरूरत हो। नजदीक के काम पैदल चल कर अथवा साइकिल का इस्तेमाल कर किए जा सकते हैं। इसी तरह यदि हम बेमतलब बिजली का इस्तेमाल करते हैं तो उससे केवल हमारा बिजली का बिल नहीं बढ़ता बल्कि पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचता है।

हमारी वैज्ञानिक चेतना का स्तर क्या है? सरकार और समाज के समक्ष यह गंभीर सवाल है। दरअसल, अभी भी हमारी जनता का एक बहुत बड़ा हिस्सा अज्ञान का बोझ ढो रहा है। यदि समाज में अराजकता पर अंकुश नहीं लगता तो हम पुलिस को कोसते हैं। इस दृष्टि से देखा जाए तो समाज में व्याप्त अंधविश्वासों पर अंकुश न लगने के लिए वे लोग जिम्मेदार हैं जिन पर वैज्ञानिक सोच विकसित करने की जिम्मेदारी है। देश में वैज्ञानिक वातावरण बने और लोगों में वैज्ञानिक चेतना पैदा हो, इसके लिए जरूरी है कि लोगों तक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हो रहे कार्यों की जानकारी पहुंचती रहे। इसके लिए देश में विभिन्न भाषाओं में ऐसी पत्र-पत्रिकाएं होनी चाहिए जो विज्ञान और तकनीकी विषयों की जानकारी लोगों को पहुंचाती रहें। साथ ही आज हमारे पास लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के जो भी संसाधन उपलब्ध हैं, उनका इस कार्य में उपयोग होना चाहिए। प्रसिद्ध दार्शनिक लारी लोडान के शब्दों में ‘विज्ञान का उद्देश्य समस्याओं के समाधान के लिए अधिक प्रभावी सिद्धांतों की खोज करना है।’ किंतु हम अपनी समस्याओं के समाधान के लिए इन अधिक प्रभावी सिद्धांतों का उपयोग तभी कर सकते हैं जब अपनी भाषाओं और संचार के सभी आधुनिक माध्यमों के जरिए इन्हें जनता के सभी वर्गों तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे, अन्यथा हमारा सारा विज्ञान यों ही निष्क्रिय पड़ा रहेगा।

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