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राजनीति: आसमान में बढ़ती ताकत

भारत अपने इन निगरानी उपग्रहों के जरिए पाकिस्तान के सत्तासी फीसद क्षेत्र यानी कुल 8.8 लाख वर्ग किलोमीटर में से 7.7 लाख वर्ग किलोमीटर इलाके पर पैनी नजर रखने में सक्षम हो गया है। इससे भारत जब चाहे, पाकिस्तान के महत्त्वपूर्ण सामरिक इलाकों की गतिविधियों को देख सकता है और महत्त्वपूर्ण नक्शे और तस्वीरें हासिल कर सकता है।

Updated: December 20, 2019 5:15 AM
सीमाओं की निगरानी के प्रबंध भी किए जाने लगे।

अभिषेक कुमार सिंह

आज दुनिया के तमाम देशों में जिस तरह के तनाव बढ़ रहे हैं, उनसे युद्ध की एक आशंका हमेशा बनी रहती है। ऐसे में अब कोई भी देश अपनी सुरक्षा को हल्के में नहीं ले सकता और इस काम में आसमान से निगरानी के इंतजाम किए बगैर खुद को सुरक्षित नहीं मान सकता। इस नजरिये से देखें तो हाल में श्रीहरिकोटा से प्रक्षेपित ताकतवर राडार इमेजिंग उपग्रह रीसैट-2बीआर-1 को भारत के लिए एक उपलब्धि कहा जाएगा। रीसैट के समान एक अन्य उपग्रह शृंखला कार्टोसैट की अंतरिक्ष में तैनाती के बल पर हमारा देश बादलों के पार से भी सरहदों पर हो रही हलचलों पर नजर रख पा रहा है और आतंकी व देश-विरोधी गतिविधियों पर निगाह रख उनसे निपटने के प्रबंध कर रहा है।

कार्टोसैट और रीसैट जैसे उपग्रहों की तैनाती की जरूरत 26 नवंबर, 2008 को मुंबई में हुए आतंकी हमलों के बाद ज्यादा महसूस की गई थी, ताकि दुश्मन इलाकों से होने वाली आतंकी घुसपैठ और संदिग्ध हलचलों की जानकारी हमारे सुरक्षा तंत्र को पहले से मिल सके। यही नहीं, इसके लिए शुरुआती रीसैट उपग्रह की तकनीक में बदलाव भी किया गया था। उल्लेखनीय है कि इससे पहले भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा अंतरिक्ष में स्थापित किए जाने वाले ज्यादातर उपग्रहों की भूमिका मौसम की जानकारी देना और कृषि, जंगल और आपदा प्रबंधन विभागों को संबंधित सूचनाएं प्रदान करने तक सीमित हुआ करती थी। लेकिन मुंबई हमले और उसके बाद उरी सेक्टर और पुलवामा में हुए आतंकी हमलों के मद्देनजर घुसपैठ पर नजर रखने और आतंक विरोधी उपायों पर अमल करने के लिए इस शृंखला के उपग्रहों में सीमाओं की निगरानी के प्रबंध भी किए जाने लगे।

इन उपग्रहों से सीमाओं की निगरानी इसलिए ज्यादा पुख्ता ढंग से हो पा रही है, क्योंकि माइक्रोवेव फ्रीक्वेंसी पर काम करने वाले रीसैट श्रेणी के उफग्रह रात के अंधेरे और खराब मौसम में भी काम कर सकते हैं। धरती पर कितना भी मौसम खराब हो, कितने भी बादल छाए हों, इसके कैमरे घने बादलों को चीर कर सीमाओं की साफ तस्वीरें ले सकते हैं। इस मामले में सिर्फ रीसैट ही नहीं, बल्कि कार्टोसैट शृंखला के उपग्रह भी बड़े काम के हैं। इसरो कार्टोसैट शृंखला में भी कई उपग्रह छोड़ चुका है और हाल में इस कड़ी में सबसे नया उपग्रह 27 नवंबर, 2019 को कार्टोसैट-3 उपग्रह प्रक्षेपित किया गया था, जो कार्टोसैट शृंखला का नौंवा उपग्रह है।

कार्टोसैट शृंखला की शुरुआत वर्ष 2005 में हो ही गई थी, लेकिन सैन्य महत्व के उपग्रहों के सिलसिले की बात करें तो इसका आरंभ मुंबई हमले से साल भर पहले 2007 में कार्टोसैट-2ए के प्रक्षेपण से हुआ था। यह दोहरे उपयोग वाला उपग्रह था जो मौसम की जानकारियां बटोरने के साथ भारत के अड़ोस-पड़ोस में मिसाइल कार्यक्रम पर नजर रख सकता था। इसके बाद जून 2012 में छोड़े गए कार्टोसैट-2सी से पड़ोसी देशों के संवेदनशील ठिकानों के वीडियो रिकॉर्ड करने और उसका विश्लेषण कर उन्हें वापस धरती पर भेजने की सुविधा देश को मिल गई। इसी शृंखला में अगला उपग्रह कार्टोसैट-2 ई था, जो जून 2017 में छोड़ा गया।

आसमान से सरहदों की निगरानी का मामला असल में इलेक्ट्रॉनिक खुफियागीरी की वह व्यवस्था बनाने का है जिसमें जमीनी हलचलों पर सुदूर अंतरिक्ष से नजर रखी जा सकती है। इस बारे में दावा किया जाता है कि जब देश रीसैट और कार्टोसैट जैसे निगरानी उपग्रहों की शृंखला अंतरिक्ष में तैनात कर देगा, तब पड़ोसी दुश्मन मुल्कों से कोई परिंदा भी नहीं आ सकेगा। छद्म युद्ध की नीति के तहत आतंक फैलाने वाले पड़ोसी मुल्कों की हरकतों पर लगाम लगाने में रीसैट और कार्टोसैट जैसे उपग्रहों की एक बड़ी भूमिका हो सकती है। तकनीकी पहलुओं को देखें, तो रीसैट और कार्टोसैट उपग्रह इलेक्ट्रॉनिक खुफिया तकनीक से युक्त होते हैं, जिससे धरती के किसी भी इलाके का इलैक्ट्रो-मैग्नेटिक स्पेक्ट्रम नापा जा सकता है। इस तकनीकी खूबी के आधार पर ये उपग्रह सैकड़ों किलोमीटर की ऊंचाई पर रहते हुए जमीन पर संचार प्रणाली, राडार और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के सिग्नल पकड़ सकते हैं। इससे दुश्मन देश के राडार ढूंढ़ने में मदद मिलती है, साथ में ये उपग्रह भारत के जंगी विमानों को दुश्मन की वायु रक्षा प्रणाली की निगाह में आने से बचा सकते हैं। इन्हीं खूबियों के चलते रीसैट-2बीआर1 और कार्टोसैट-3 को भारत की आंख भी कहा जा रहा है।

सवाल है कि आसमान में तैनात ये तकनीकी आंखें हमारे देश की सुरक्षा में कैसे मददगार साबित हो रही हैं। इसकी एक मिसाल उरी हमले के प्रतिकार में सितंबर, 2016 में भारत की ओर से पाकिस्तान के खिलाफ की गई सर्जिकल स्ट्राइक में मिलती है। इस कार्रवाई में एक अहम भूमिका कार्टोसैट शृंखला के उपग्रहों ने निभाई थी। इन उपग्रहों से हैदराबाद स्थित नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर को स्टैंडर्ड और बेहद सूक्ष्म ब्योरे के साथ उपग्रहों से जमीन के लिए गए फोटो उपलब्ध कराए गए थे। इनके विश्लेषण के बाद सेना को जमीनी हालात का आकलन करने, हमले की सर्वाधिक उपयुक्त जगह और समय का चुनाव करने में मदद मिली थी। निगरानी उपग्रह कहलाने वाले इन उपग्रहों में एक विशेष किस्म का राडार लगा होता है। यह राडार असल में इजरायली सिस्टम टेकसार-1 का संशोधित और देसी विकल्प है, जिससे एक बार में धरती के पांच से दस किलोमीटर के इलाके में करीब आधे मीटर से भी कम दायरे में मौजूद दो वस्तुओं में अंतर पकड़ा जा सकता है और उनकी पहचान की जा सकती है। इतनी सूक्ष्मता से मिलने वाली जानकारी का अर्थ यह है कि दुश्मन देश की सैन्य हलचलों से लेकर आतंकियों की हर गतिविधि का समय रहते पता लग सकता है।

एक तथ्य यह है कि भारत अपने इन निगरानी उपग्रहों के जरिए पाकिस्तान के सत्तासी फीसद क्षेत्र यानी कुल 8.8 लाख वर्ग किलोमीटर में से 7.7 लाख वर्ग किलोमीटर इलाके पर पैनी नजर रखने में सक्षम हो गया है। इससे भारत जब चाहे, पाकिस्तान के महत्त्वपूर्ण सामरिक इलाकों की गतिविधियों को देख सकता है और महत्वपूर्ण नक्शे और तस्वीरें हासिल कर सकता है। सिर्फ पाकिस्तान ही नहीं, बल्कि पिछले पांच-छह वर्षों में इसरो ने कई ऐसे उपग्रह अंतरिक्ष में स्थापित किए हैं, जिनकी मदद से भारत की क्षमता आस-पड़ोस के चौदह देशों के करीब साढ़े पांच करोड़ वर्ग किलोमीटर दायरे वाले भूभाग पर सूक्ष्म नजर रखने की बन चुकी है।

सेना यह स्वीकार करती है कि देश की सरहदों से लेकर पड़ोसी मुल्कों की जमीन पर हो रही गतिविधियों पर करीबी नजर रखने संबंधी जरूरतों का सत्तर फीसद हिस्सा इसरो के उपग्रह पूरा कर देते हैं। इस वक्त इसरो के कम से कम दस उपग्रह ऐसे हैं जो देश की सैन्य और खुफिया जरूरतों को पूरा कर रहे हैं। हाइपर स्पेक्ट्रल इमेजिंग उपग्रह यानी हाइसिस को 28 नवंबर 2018 को छोड़ा गया था और इससे रात के अंधेरे में भी तस्वीरें खींचकर जमीन के कुछ सेंटीमीटर जितने हिस्से की सूक्ष्म निगरानी की जाती है। यहां तक कि जमीन में बारूदी सुरंगों और आइईडी का भी इससे पता चल जाता है। इसी साल 23 जनवरी को प्रक्षेपित उपग्रह माइक्रोसैट-आर को इस मायने में खास कहा जा सकता है कि इसका निर्माण विशुद्ध रूप से सैन्य उद्देश्यों के लिए डीआरडीओ ने किया है।

यह सही है कि अक्सर दो देशों के बीच सैन्य संतुलन का आकलन करते समय सैनिकों की तादाद, जंगी जहाजों, विमानों, मिसाइलों और टैंकों आदि की गणना ही होती है, उनमें अंतरिक्ष में तैनात निगरानी उपग्रहों की गिनती नहीं होती। लेकिन भारत के अगल-बगल शत्रु इरादों वाले पड़ोसियों की मौजूदगी के मद्देनजर ऐसे निगरानी उपग्रहों की कीमत किसी भी सैन्य साजोसामान से ज्यादा ही ठहरेगी।

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