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राजनीति: रैगिंग का रोग और सवाल

रैगिंग के नाम पर अमानवीय यातनाएं देने के ऐसे सैकड़ों मामले सामने आते रहे हैं। छात्रों को मुर्गा बनाना, निर्वस्त्र कर देना, बेरहमी से पीटना, बिजली के गर्म हीटर पर पेशाब कराने जैसी घटनाएं बताती हैं कि हम कैसा अमानवीय समाज बनाते जा रहे हैं। पढ़े-लिखे नौजवानों के मन में इस कदर हिंसा कूट-कूट कर भरी हो तो यह चिंता की बात है। यह एक कुंठित औरबीमार होते समाज का संकेत है।

Author Published on: September 5, 2019 2:01 AM
रैगिंग के नाम पर अमानवीय यातनाएं देने के ऐसे सैकड़ों मामले सामने आते रहे हैं।

योगेश कुमार गोयल

शिक्षण संस्थानों में रैगिंग रोकने के लिए सख्त अदालती दिशा-निर्देशों के बावजूद पिछले कुछ समय से देश के विभिन्न हिस्सों से कॉलेजों में रैगिंग के मामले सामने आ रहे हैं। सर्वोच्च अदालत के निर्देशों के बाद भी इस तरह की घटनाओं पर अंकुश नहीं लग पाना चिंताजनक है। कुछ दिन पहले ही उत्तर प्रदेश के इटावा में जिले के सैफई मेडिकल कालेज, जिसे मिनी पीजीआइ भी कहा जाता है, में सीनियर छात्रों ने रैगिंग के नाम पर डेढ़ सौ जूनियर छात्रों के सिर मुंडवा दिए। मुख्यमंत्री के आदेश पर इस मामले की अभी जांच चल ही रही थी कि एक-एक कर अलग-अलग स्थानों से कई और ऐसे ही मामले सामने आ गए। इससे पता चलता है कि सीनियर छात्रों को अपनी क्षणिक मस्ती, उद्दंडता और रौब कायम करने के लिए अदालती आदेशों की कितनी परवाह है। उन्हें इस बात की भी चिंता नहीं होती कि रैगिंग में उनकी संलिप्तता साबित होने पर उनके भविष्य का क्या हश्र होगा।

हैरानी की बात यह है कि पहले रैगिंग में अधिकांशत: लड़के ही ज्यादा शामिल पाए जाते थे, किंतु अब इसमें लड़कियों की संलिप्तता भी कम नहीं है। पिछले महीने देहरादून के राजकीय दून मेडिकल कालेज के गर्ल्स हॉस्टल में सीनियर छात्राओं ने जूनियर छात्राओं की रात के समय करीब तीन घंटे तक रैगिंग करते हुए उनके बाल कटवा दिए। आरोप है कि 2017 बैच के छात्रों ने रैगिंग के नाम पर इस शर्मनाक हरकत को अंजाम दिया। ऐसा ही एक मामला हल्द्वानी राजकीय मेडिकल कालेज में भी सामने आया, जिसमें पीड़ित छात्रा की शिकायत को गंभीरता से लेते हुए यूनिवर्सिटी ने चिकित्सा शिक्षा विभाग के निदेशक को मामला जांच के लिए भेज दिया है। इसी तरह कानपुर के चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में जूनियर छात्रों के छात्रावासों में धावा बोलते हुए करीब सौ सीनियर छात्रों ने सभी जूनियर छात्रों के कपड़े उतरवा कर उन्हें मुर्गा बनाया और पिटाई की। इतना ही नहीं, हर छात्र को कक्षा में बिना कपड़े आने को कहा गया।

वर्ष 2009 में हिमाचल के धर्मशाला में एक मेडिकल कालेज के छात्र अमन काचरू की रैगिंग से मौत के बाद सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी शिक्षण संस्थानों में रैगिंग विरोधी कानून सख्ती से लागू करने के आदेश दिए थे। इसके तहत दोषी पाए जाने पर ऐसे छात्र को तीन साल का सश्रम कारावास हो सकता है और उस पर आर्थिक दंड भी लगाया जा सकता है। रैगिंग करने का दोषी पाए जाने पर आरोपी छात्र को कालेज और हॉस्टल से निलंबित या बर्खास्त किया जा सकता है, उसकी छात्रवृत्ति और अन्य सुविधाओं पर रोक, परीक्षा देने या परीक्षा परिणाम घोषित करने पर प्रतिबंध लगाने के अलावा किसी अन्य संस्थान में उसके दाखिले पर भी रोक लगाई जा सकती है। इसके अलावा रैगिंग के मामले में कार्रवाई न करने अथवा मामले की अनदेखी करने पर कालेज के खिलाफ भी कार्रवाई हो सकती है, इसमें कालेज पर आर्थिक दंड लगाने के अलावा कालेज की मान्यता रद्द करने का भी प्रावधान है। अदालत के दिशा-निर्देशों के तहत किसी छात्र के रंग-रूप या उसके पहनावे पर टिप्पणी करना, उसके स्वाभिमान को ठेस पहुंचाना, उसकी क्षेत्रीयता, भाषा या जाति के आधार पर अपमान करना, उसकी नस्ल या पारिवारिक पृष्ठभूमि पर अभद्र टिप्पणी करना या उसकी मर्जी के बिना जबरन किसी प्रकार का अनावश्यक कार्य कराया जाना रैगिंग के दायरे में सम्मिलित किया गया है।

उल्लेखनीय है कि आठ मार्च 2009 को हिमाचल में कांगड़ा के डा. राजेंद्र प्रसाद मेडिकल कालेज में रैगिंग के दौरान चार सीनियर छात्रों ने प्रथम वर्ष के छात्र अमन सत्य काचरू को इतनी बेरहमी से पीटा था कि उसकी मौत हो गई थी। अमन और उसके कुछ मित्रों ने रैगिंग की लिखित शिकायत कालेज के प्रिंसिपल और हॉस्टल अधिकारियों को की थी लेकिन कालेज प्रशासन ने कोई कदम नहीं उठाया था। इससे सीनियर छात्रों का हौंसला इस कदर बढ़ा कि उन्होंने शराब पीकर रैगिंग के नाम पर देर रात अमन को इस कदर पीटा कि उसकी मौत हो गई।

रैगिंग के नाम पर अमानवीय यातनाएं देने के ऐसे सैकड़ों मामले सामने आते रहे हैं। छात्रों को मुर्गा बनाना, निर्वस्त्र कर देना, बेरहमी से पीटना, बिजली के गर्म हीटर पर पेशाब कराने जैसी घटनाएं बताती हैं कि हम कैसा अमानवीय समाज बनाते जा रहे हैं। किसी पढ़े-लिखे नौजवानों के मन में इस कदर हिंसा कूट-कूट के भरी हो तो यह चिंता की बात है। यह एक कुंठित औरबीमार होते समाज का संकेत है। रैंगिग का मतलब नए छात्रों से परिचय, हल्का-फुल्का हंसी-मजाक होता है। लेकिन अमानवीयता की हदें पार कर जाने को क्या रैंगिंग की स्वस्थ परंपरा कहा जाएगा? दक्षिण भारत के एक इंजीनियरिंग कालेज में सीनियर छात्रों ने एक जूनियर छात्र को बीच-पार्टी में रैगिंग के दौरान समुद्र में प्रवेश करने का फरमान दिया। जब उस छात्र ने आनाकानी की तो वरिष्ठों ने उसे जबरन समुद्र में धकेल दिया और इस तरह एक भावी इंजीनियर सदा के लिए समुद्र में चला गया। क्या इसे रैंगिंग कहा जाएगा?

अक्सर देखा जाता है कि रैगिंग मामलों में कालेज प्रशासन की भूमिका भी संतोषजनक नहीं होती, इससे सीनियर छात्रों को कहीं न कहीं बढ़ावा ही मिलता है। आंकड़ों पर नजर डालें तो रैगिंग के खिलाफ सख्त कानून बनने के बाद भी रैगिंग के मामले बड़ी संख्या में सामने आ रहे हैं। पिछले सात साल में रैगिंग की करीब पांच हजार शिकायतें सामने आई हैं और चौवन छात्रों ने रैगिंग से परेशान होकर अपना जीवन खत्म करने की राह चुनी। रैगिंग के खिलाफ बनाए गए एंटी रैगिंग काल सेंटर में दर्ज कराए गए मामलों पर नजर डालें तो पिछले ग्यारह वर्षों में इन काल सेंटरों में कुल छह हजार से ज्यादा मामले दर्ज हुए। इनमें सर्वाधिक एक हजार अठहत्तर मामले 2018 में दर्ज हुए।

कालेजों में रैगिंग रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति अरिजीत पसायत, न्यायमूर्ति डीके जैन और न्यायमूर्ति मुकुंदकम शर्मा के खंडपीठ ने 11 फरवरी 2009 को पहली बार बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए कहा था कि रैगिंग में मानवाधिकार हनन जैसी गंध आती है। सुप्रीम कोर्ट के इस खंडपीठ ने राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को शिक्षण संस्थानों में रैगिंग पर रोक लगाने के लिए राघवन कमेटी की सिफारिशों को सख्ती से लागू करने का निर्देश देते हुए कहा था कि वे रैगिंग रोकने में विफल रहने वाले शिक्षण संस्थाओं की मान्यता रद्द करें। पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने इस तरह के कड़े शब्द भी इस्तेमाल किए थे कि जांच कार्य को जो भी कोई प्रभावित करने अथवा टालने का प्रयास करे, उसके खिलाफ भी सख्त कार्रवाई की जाए।

हकीकत यही है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा रैगिंग के मामले में संज्ञान लेते हुए राज्य सरकारों और विश्वविद्यालयों को कालेजों में रैगिंग रोकने के लिए दोषी छात्रों के विरुद्ध कड़े कदम उठाने के लिए बार-बार दिशा-निर्देश दिए जाते रहे हैं लेकिन उन दिशा-निर्देशों का कोई विशेष प्रभाव नहीं देखा जाता और इसके लिए पूरी जिम्मेदारी शिक्षण संस्थानों की ही बनती है। सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2001 में भी उन्नीकृष्णन समिति की सिफारिश के आधार पर रैगिंग पर प्रतिबंध लगाते हुए इसके लिए कठोर सजा का प्रावधान करते हुए अपने आदेश में स्पष्ट कहा था कि शिक्षा परिसरों में रैगिंग रोकना शिक्षा संस्थानों का नैतिक ही नहीं, कानूनी दायित्व भी है, जिसे न रोक पाना दंडनीय अपराध की श्रेणी में लाया जाएगा और ऐसे संस्थानों की संबद्धता तथा उन्हें प्रदत्त सरकारी वित्तीय सहायता समाप्त की जा सकती है।

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