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राजनीति: एनआरसी से निकलते सवाल

एनआरसी की अंतिम सूची आ गई है। कानूनी दावपेंच और राजनीति अब शुरू होगी। एनआरसी को अंतिम रूप दिए जाने की कार्यशैली पर सवाल उठे हैं। इस सूची में महत्त्वपूर्ण दस्तावेजों को नजरअंदाज करने के आरोप भी लगे हैं। जिन 19.06 लाख लोगों को विदेशी घोषित किया गया है, उनमें से लाखों लोगों के पास वैध दस्तावेज थे, लेकिन उन्हें एनआरसी में शामिल नहीं किया गया। सवाल असम सरकार के महत्त्वपूर्ण लोगों ने ही उठाया है।

Author Published on: September 4, 2019 12:56 AM
पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान से खराब संबंध झेल रहा भारत बांग्लादेश को नाराज करने की स्थिति में नहीं है।

संजीव पांडेय

असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्ट्रर (एनआरसी) की अंतिम सूची जारी हो गई है। इसके साथ ही भारत-बांग्लादेश संबंधों पर भी चर्चा शुरू हो गई है। अंतिम सूची से उन्नीस लाख लोग बाहर हो गए हैं। एनआरसी में शामिल होने के लिए 3.29 करोड़ लोगों ने आवेदन किया था। पिछले साल जारी सूची में चालीस लाख लोगों को बाहर किया गया था। इसमें से बाहर किए लोगों ने अपना पक्ष रखा, इसके बाद अब अंतिम सूची आ गई। अंतिम सूची में इक्कीस लाख लोग और जुड़ गए और उन्नीस लाख लोग बाहर रह गए। बाहर हुए लोगों को अपने भारतीय नागरिकता संबंधी दावे के लिए विदेशी पंचाट में अपील करनी होगी। एनआरसी से बाहर किए गए लोगों के पास उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय में अपील करने का भी अधिकार होगा।

एक अहम सवाल यह भी है कि जिन लोगों का नाम अंतिम सूची में नहीं है, उनका क्या किया जाएगा। क्या उन्हें वापस बांग्लादेश भेजा जाएगा? क्या वर्तमान परिस्थितियां भारत को यह अनुमति देती हैं कि जो लोग विदेशी घोषित हो चुके हैं, उन्हें वापस बांग्लादेश भेजा जाए? दक्षिण एशिया में भारत की कुछ मजबूरियां हैं। हाल ही में विदेश मंत्री एस. जयशंकर बांग्लादेश के दौरे पर गए थे। वहां पत्रकारों के सवालों के जवाब में उन्होंने साफ कहा था कि राष्ट्रीय नागरिक रजिस्ट्रर से निकाले गए लोगों का मामला भारत का आंतरिक मामला है। इसका बांग्लादेश से कुछ लेना देना नहीं है। जयशंकर ने यह बात बांग्लादेश के विदेश मंत्री से बैठक के बाद कही थी।

हालांकि इससे पहले बांग्लादेश के गृह मंत्री भारत आए थे और उन्होंने गृह मंत्री अमित शाह के साथ बैठक की थी। लेकिन उस दौरान दोनों तरफ से कोई साझा बयान नहीं आया था। तब यह अंदेशा जताया गया था कि दोनों मुल्कों के बीच महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर कुछ विवाद है, जिसमें भारत में रह रहे अवैध बांग्लादेशियों का मसला भी शामिल है। हालांकि पिछले साल जुलाई में बांग्लादेश के दौरे पर गए भारत के तत्कालीन गृह मंत्री ने बांग्लादेश सरकार को साफ कहा था कि बांग्लादेश निश्चिंत रहे, एनआरसी से निकाले गए लोगों को वापस बांग्लादेश नहीं भेजा जाएगा। बांग्लादेश खुद इस समय रोहिंग्या शरणार्थियों की समस्या से जूझ रहा है, ऐसे में वह भारत से वापस भेजे गए लोगों को किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करेगा। फिर, भारत और बांग्लादेश के बीच अभी तक अवैध नागरिकों को वापस भेजने को लेकर कोई संधि भी नहीं है।

पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान से खराब संबंध झेल रहा भारत बांग्लादेश को नाराज करने की स्थिति में नहीं है। इसके आर्थिक, रणनीतिक और कूटनीतिक कारण हैं। भारत ने हाल में अनुच्छेद 370 हटा कर जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त कर दिया है। इससे पाकिस्तान बौखलाया हुआ है और कश्मीर मसले का अंतराष्ट्रीयकरण करने में लगा है। इस स्थिति में भारत को मुसलिम बहुल देश बांग्लादेश का समर्थन हासिल करना जरूरी है। बांग्लादेश इस समय एक उभरती आर्थिक शक्ति है। उसकी जीडीपी विकास दर आठ प्रतिशत है। बांग्लादेश का प्रति व्यक्ति जीडीपी भी 1888 अमेरिकी डॉलर है, जो भारत से थोड़ा ही कम है। कई और कारणों से भी बांग्लादेश भारत के लिए महत्त्वपूर्ण है। बांग्लादेश में उर्जा, सड़क, दूरसंचार, रेल आदि क्षेत्र में विकास की काफी संभावना है और वहां भारतीय कंपनियों के लिए बड़ा बाजार है। यही नहीं, दक्षिण-पूर्व एशिया से भारत के व्यापारिक संबंध स्थापित करने के लिए बांग्लादेश एक महत्त्वपूर्ण माध्यम है।

दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि भारत को चीन का भी डर है। बांग्लादेश से संबंध खराब होने की स्थिति में वह चीन के नजदीक जा सकता है। चीन ने ‘बेल्ट एंड रोड’ पहल के तहत 2016 में चीन-बांग्लादेश संबंधों को नई दिशा दी है। इसके तहत चीन ने बांग्लादेश में अड़तीस अरब डालर के निवेश की योजना बनाई है। आज बांग्लादेश कपड़ा उद्योग में काफी आगे निकल चुका है। यह दुनिया का दूसरा बड़ा रेडीमेड कपड़े का निर्यातक बन गया है। ऐसे में भारत बांग्लादेश की उभरती हुई अर्थव्यस्था को नजर अंदाज नहीं कर सकता है। इन परिस्थितियों में भारत किसी भी कीमत पर राष्ट्रीय नागरिक रजिस्ट्रर से निकाले गए लोगों को वापस बांग्लादेश भेजने की जिद नहीं करेगा।

भारत में बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या पर हमेशा राजनीति होती रही है। 2003 में भारत के तत्कालीन गृह मंत्री ने भारत में अवैध बांग्लादेशियों की संख्या दस लाख के करीब बताई थी। लेकिन नवंबर 2016 में राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में तत्कालीन गृह राज्य मंत्री ने इनकी संख्या दो करोड़ बताई थी। अब अगर एनआरसी के आंकड़ों को देखें तो असम में उन्नीस लाख अवैध नागरिक हैं, जिनमें ज्यादातर बांग्लादेशी हैं। आंकड़ों में ये भिन्नता साफ करती है कि भारत सरकार के पास कोई सही आंकड़ा भारत में अवैध रूप से रहने वाले बांग्लादेशियों को लेकर नहीं है। हालांकि अब समय बदला है। बांग्लादेश की अच्छी होती आर्थिक स्थिति ने बांग्लादेशियों को बेहतर रोजी-रोटी का विकल्प बांग्लादेश से ही मुहैया करवा दिया है। इससे भारत में होने वाली अवैध घुसपैठ की संख्या कम हुई है।

एनआरसी की अंतिम सूची आ गई है। कानूनी दावपेंच और राजनीति अब शुरू होगी। एनआरसी को अंतिम रूप दिए जाने की कार्यशैली पर सवाल उठे हैं। इस सूची में महत्त्वपूर्ण दस्तावेजों को नजरअंदाज करने के आरोप भी लगे हैं। जिन 19.06 लाख लोगों को विदेशी घोषित किया गया है, उनमें से लाखों लोगों के पास वैध दस्तावेज थे, लेकिन उन्हें एनआरसी में शामिल नहीं किया गया। सवाल असम सरकार के महत्त्वपूर्ण लोगों ने ही उठाया है। अंतिम सूची को चुनौती देने की तैयारी हो गई है, क्योंकि चार से पांच लाख लोगों को भारतीय नागरिक साबित करने वाले जरूरी दस्तावेजों को एनआरसी ने रिकार्ड में नहीं लिया। इसमें ज्यादातर वे लोग हैं जो 1971 से पहले पूर्वी पाकिस्तान में धार्मिक उत्पीड़न के कारण भारत आए थे।

चूंकि उस समय बांग्लादेश बना नहीं था और धार्मिक आधार पर पूर्वी पाकिस्तान मे हिंदुओं के साथ काफी भेदभाव था, इसलिए बड़ी संख्या में लोग भाग कर भारत में आ गए थे। लाखों आवेदकों के पास उस समय जारी किया गया शरणार्थी प्रमाणपत्र मौजूद है। ये प्रमाणपत्र जमा भी करवाए गए, लेकिन उन्हें संज्ञान मे नहीं लिया गया। अब ये लोग विदेशी न्यायाधिकरण में जाने की तैयारी में हैं।

दरअसल, एनआरसी मसुलिम विरोधी नहीं बल्कि बांग्ला विरोधी है। बेशक इसे धार्मिक रंग देकर राजनीति होती रही है, लेकिन अभी निकाले गए उन्नीस लाख लोगों में हिंदुओं की संख्या काफी है। दरअसल, एनआरसी की अंतिम सूची से कोई पक्ष खुश नहीं है। जो विदेशी घुसपैठियों को निकाले जाने की लगातार लड़ाई लड़ रहे थे, वे नाराज हैं। क्योंकि एनआरसी से निकाले जाने वालों की संख्या उनकी उम्मीद से काफी कम है। जबकि निकाले गए पक्ष का कहना है कि आवेदन के बाद जांच की पूरी प्रक्रिया ही खामियों भरी है। उन लाखों लोगों का नाम एनआरसी से निकाल दिया गया जिनके पास भारत की नागरिकता साबित करने के दस्तावेज मौजूद है।

सर्वोच्च न्यायालय में एनआरसी के मूल आवेदक असम पब्लिक वर्कस ने उन्नीस लाख लोगों को एनआरसी से निकाले जाने को मजाक करार दिया है। आॅल असम स्टूडेंट यूनियन का तर्क है कि एनआरसी से निकाले जाने वालों की संख्या ज्यादा होनी चाहिए थी। वहीं, आॅल असम माइनोरिटी स्टूडेंट यूनियन बहुत सारे भारतीय नागरिकों को विदेशी घोषित करने का आरोप लगा रही है। ऐसे में सवाल है कौन घुसपैठिया है और कौन नहीं, यह एनआरसी से कैसे तय हो पाएगा?

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