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राजनीति: शिक्षा नीति और भाषा का सवाल

स्कूली बच्चों का एक बड़ा हिस्सा पढ़ने, अक्षर ज्ञान, लिखने आदि कौशल में पिछड़ रहा है। वे भाषायी पठन, समझ और लेखन कौशल से महरूम रह जा रहे हैं। यही बच्चे जब कॉलेज एवं विश्वविद्यालयों में जाते हैं तो या तो भाषा-अध्ययन छोड़ देते हैं या फिर भाषा एवं साहित्य अध्ययन में रुचि नहीं लेते।

Author June 14, 2019 1:13 AM
सन 1986 में हमारी शिक्षा नीति बनी थी

कौशलेंद्र प्रपन्न

बहुभाषी समाज में हमारी मातृभाषा के अलावा क्षेत्र और राज्य की भाषा भी समाहित होती है। इन्हें अलग कर हम एक धनाढ्य भाषायी परिवार की कल्पना नहीं कर पाएंगे। इन्हें हम विभिन्न शैक्षिक नीतियों और समितियों की संस्तुतियों में भी देख-पढ़ सकते हैं, चाहे त्रिभाषा सूत्र हो या फिर भाषा शिक्षण के प्रति शिक्षाविदों की समीक्षा। इन तमाम दस्तावेजों की रोशनी में देखने की कोशिश करें तो पाएंगे कि 1964-66 की कोठारी समिति में प्रस्तावित त्रिभाषा सूत्र कहीं न कहीं प्रकारांतर से बहुभाषायी परिवेश को मजबूत करने पर बल देता है। भाषा आधारित विमर्श समय-समय पर शैक्षणिक जमीन पर उगते रहे हैं। यदि सावधानी एवं पूर्वाग्रह से हट कर इनकी समीक्षा नहीं की गई और कार्यान्वयन की योजना बना ली तो समस्याएं खड़ी होती हैं। आजादी के बाद और खासकर 1960 के आसपास भाषा को आधार बना कर हुआ देशव्यापी संघर्ष इतिहास में दर्ज है। उसमें एक राज्य या खास भाषा को जब दूसरे राज्यों को भी पढ़ने-लिखने, बोलने के लिए प्रस्तावित किया गया तो उसका विरोध कुछ राज्यों ने किया था।

सन 1986 में हमारी शिक्षा नीति बनी थी। उसके बाद हमारे पास ताजा और समयानुसार शैक्षणिक नीति की आवश्यकता थी। इसमें पूर्व में 2015 से काम होना शुरू हुआ था। हाल ही में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मसौदा विद्वत समाज को सौंपा जा चुका है। इसमें पूर्व में हिंदी भाषा को अन्य राज्यों में भी पढ़ने-पढ़ाने की वकालत की गई थी, जिस पर व्यापक प्रतिक्रियाएं आने लगीं। इन विमर्शों में विरोध के स्वर हिंदी के प्रति तो थे ही। लेकिन यदि कल्पना करें कि हिंदी के स्थान पर संस्कृत, पंजाबी, गुजराती आदि भाषा भी रखी जाती तो विरोध तो उठते ही, बेशक वह राज्य कोई और होता। यदि मंथन करें तो पाएंगे कि भाषाओं को लेकर अपनी-अपनी धारणाएं हर समाज में रही हैं। ऐसे में इस तरह के मामलों में सावधानी और विवेकपूर्ण निर्णय लेना अपेक्षित होता है। तभी इस मसौदे से हिंदी शिक्षण की अनिवार्यता को हटा दिया गया। यदि व्यापक परिदृश्य में समझने की कोशिश करें तो पाएंगे कि भाषाएं हमारे समाज को जोड़ने में एक मजबूत सूत्र के रूप में अपनी भूमिका निभाती हैं। इस सूत्र को पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर इस्तेमाल करने की आवश्यकता है।

प्राथमिक स्तर पर भाषा शिक्षण पर बहुत कम सुझाव और रणनीतियां इस शिक्षा नीति में नजर आती हैं। एक बड़ा हिस्सा- ‘बाल्यावस्था में देखभाल और शिक्षा: सीखने की बुनियाद’ (ईसीसीई) पर खर्च किया गया है। गौरतलब है कि ईसीसीई को शिक्षा के अधिकार अधिनियम से बाहर रखा गया था। इसे भी आरटीई का हिस्सा बनाया जाए, इसको लेकर पिछले छह-सात वर्षों से विभिन्न संस्थाएं वकालत कर रही हैं। आंगनबाड़ी, प्राथमिक स्कूल पूर्व और पूर्व प्राथमिक स्कूलों के साथ कैसे बाल्यावस्था देखभाल एवं रखरखाव को जोड़ा जाए, इस पर यह मसौदा शिद्दत से विमर्श करता है।

भाषायी विमर्श कहीं न कहीं हमें अपनी भाषा-बोली-बानी से जोड़ता है। हमें एक ऐसे बहुभाषी समाज का हिस्सा बनाता है जहां भाषाओं की छटाएं पग-पग पर सुनने, बोलने और पढ़ने को मिलती हैं। भारत की यात्रा पर निकलें तो कुछ-कुछ किलोमीटर पर भाषायी विविधताओं का दर्शन होता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि बहुभाषी समाज में जीने वाले व्यक्ति की अभिव्यक्ति क्षमता उसके जीवन के हर क्षेत्र में देखी-सुनी जा सकती है। इस बहुभाषी समाज को बचाए रखने के लिए जरूरी है कि बच्चों को स्कूली शिक्षा से लेकर कॉलेज और विश्वविद्यालयी शिक्षा में बहुभाषायी दक्षता को सीखने का अवसर मिले। हालांकि कई रिपोर्ट हमें समय-समय पर ताकीद करती रही हैं कि हमारे समाज से रोज कोई न कोई भाषा-बोली खत्म हो रही है। बोलियों का लुप्त होना एक गंभीर संकेत है। यह दीगर बात है कि फिर भी हम अपनी भाषा बोली को बचाने, संरक्षण करने, सीखने-सिखाने के प्रति कोई खास गंभीर नजर नहीं आते। इसका एक प्रमाण तो यही है कि हर साल यू-डाईस, असर, पीसा, जीईएमआर आदि की रिपोर्ट इस ओर इशारा करती हैं कि हमारे बच्चों में भाषायी कौशल दिन-प्रतिदिन कम होता जा रहा है। हमारे बच्चे स्कूली स्तर पर भाषा का बुनियादी कौशल भी हासिल नहीं कर पा रहे हैं। स्कूली बच्चों का एक बड़ा हिस्सा पढ़ने, अक्षर ज्ञान, लिखने आदि कौशल में पिछड़ रहा है। भाषायी पठन, समझ और लेखन कौशल से महरूम रह जा रहे हैं। यही बच्चे जब कॉलेज एवं विश्वविद्यालयों में जाते हैं तो या तो भाषा-अध्ययन छोड़ देते हैं या फिर भाषा एवं साहित्य अध्ययन में रुचि नहीं लेते।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति प्रारूप-2019 बड़ी शिद्दत से भाषा शिक्षण, सीखने-सिखाने और बहुभाषा को संरक्षित करने पर जोर देता है। स्कूली स्तर पर बच्चों को किस प्रकार भाषा पढ़ाएं-सिखाएं, इसे लेकर इस प्रारूप के अध्याय-2 में 2025 तक पांचवीं कक्षा एवं उससे ऊपर के सभी विद्यार्थियों के लिए बुनियादी साक्षरता एवं संख्या ज्ञान अर्जित करने की बात कही गई गई है। इस उद्देश्य को हासिल करने के लिए बच्चों को उनकी मातृभाषा, घर की भाषा, स्थानीय भाषा में शिक्षा दिए जाने पर जोर है। उस अध्याय में नीति स्पष्ट करती है कि किसी भी बच्चे पर अन्य भाषा सीखने के लिए कोई दबाव नहीं बनाया जाएगा, बल्कि बच्चों को उनकी मातृभाषा, घर की भाषा, स्थानीय भाषा में सीखने-सिखाने के अवसर प्रदान किए जाएंगे। इस नीति का मानना है कि बच्चे अपनी मातृभाषा में किसी भी विषय को सहज और रुचि से जल्द सीखते हैं। बच्चों को अपनी भाषा के चुनाव के अवसर भी मिलेंगे, खासकर पांचवीं के बाद और आठवीं कक्षा में अपनी भाषा बदल सकते हैं।
इस नीति में भाषा के चुनाव में लचीलापन रखा गया है। यदि और विस्तार से समझने की कोशिश करें तो पाएंगे कि बच्चों को भाषा सिखाने के लिए जरूरी भाषायी माहौल प्रदान करने वाला प्रावधान भी है कि पहली, दूसरी और तीसरी कक्षाओं में हर दिन गणित और पढ़ने के घंटे एवं चौथी व पांचवीं कक्षा के लिए एक अतिरिक्त घंटा लेखन के लिए तय किया जाए। वर्ष में कई बार भाषा मेला एवं गणित मेला जैसे कार्यक्रम आयोजित हों। साप्ताहिक रूप से भाषा एवं गणित केंद्रित स्कूल सभा हो और भाषा एवं गणित संबंधी गतिविधियों के माध्यम से लेखकों और गतिणज्ञों की वर्षगांठ आदि को उत्सवों के रूप में मनाया जाए।

भाषायी सरोकार को अमलीजामा पहनाने के लिए यह दस्तावेज मानता है कि भाषा-शिक्षकों को विशेष प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा। दस्तावेज के अध्याय-22 में कहा गया है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में भाषा संकाय की स्थापना की जाएगी, जिनकी जिम्मेदारी होगी कि भाषा शिक्षकों को प्रशिक्षण प्रदान करें। ये प्रशिक्षित शिक्षक देश के विभिन्न स्कूलों में अपनी सेवाएं देंगे। नई शिक्षा नीति के इस दस्तावेज के अनुसार तमाम भारतीय भाषाओं के विकास और संरक्षण को बढ़ावा दिया जाएगा। इसके तहत उच्च शिक्षा संस्थानों में शास्त्रीय भारतीय भाषाओं और साहित्य को आगे बढ़ाने के लिए विशेष योजनाएं बनानी चाहिए। पाली, फारसी व प्राकृत भाषाओं के लिए एक राष्ट्रीय संस्था स्थापित की जाएगी। समग्रता में समझने की कोशिश करें तो नीति के स्तर पर भाषा, बहुभाषिकता, भाषा-शिक्षा-शिक्षण आदि पर विशेष बल दिया गया है। हालांकि भाषा शिक्षण इस नीति का एक पक्ष है। इसके अलावा पेशेवर शिक्षक तैयार करना, उनकी कार्यदक्षता और बेहतर शिक्षक बनाने जैसी योजनाओं का जिक्र इसमें है। योजना, नीति आदि के स्तर पर यह दस्तावेज पहली नजर में पूर्ण नजर आता है। लेकिन स्कूलों से लेकर कॉलेज, विश्वविद्यालयों तक में जिस भारी तादाद में शिक्षकों की कमी है, उस सूरत में अलग से भाषा शिक्षकों की नियुक्ति का लक्ष्य हासिल करना आसान नहीं दिखता। एक ओर जब हम पूर्व के रिक्त पदों को नहीं भर पा रहे हैं, ऐसे में नए पदों को कब और कैसे भरेंगे, यह बड़ा सवाल है।

 

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