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राजनीति: शोध में गुणवत्ता की समस्या

उच्च शिक्षण संस्थानों में शोधरत छात्रों के लिए सबसे पहले आजीविका सुनिश्चित करनी चाहिए, क्योंकि पीएचडी का आजीविका से न जुड़ना शोध स्तर में गिरावट का मुख्य कारण माना जाता है। साथ ही, बीच में शोध-कार्य छोड़ देने वाले छात्रों की जवाबदेही सुनिश्चित कर उससे असंतुष्ट होने पर छात्रवृत्ति वापस लेने का प्रावधान भी किया जाना चाहिए।

Author March 14, 2019 3:20 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

धर्मेंद्र प्रताप सिंह

भारत में विश्वविद्यालयों की स्थापना का मूल उद्देश्य उच्च शैक्षिक संस्थानों में ऐसे अध्ययन, अध्यापन और अनुसंधान को बढ़ावा देना है जो हमारे समाज और देश की प्रगति में सहायक हो सके। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के तमाम प्रयासों के बावजूद उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में कोई सुधार नहीं हो रहा है, जबकि राधाकृष्ण आयोग, कोठारी समिति, राष्ट्रीय शिक्षा नीति, राष्ट्रीय ज्ञान आयोग, यशपाल समिति, उच्च शिक्षा और अनुसंधान विधेयक, उच्च शिक्षा सशक्तिकरण विनिमय एजेंसी आदि के माध्यम से वह अपनी मंशा जाहिर कर चुका है। भारत में इस समय सैंतालीस केंद्रीय विश्वविद्यालय और सात सौ अड़तीस राज्यस्तरीय विश्वविद्यालय हैं। इन सबके बावजूद सोलह फीसद छात्र ही उच्च शिक्षा के लिए विश्वविद्यालयों की दहलीज तक पहुंच पाते हैं। भारत जैसे किसी भी विकासशील देश के लिए यह गंभीर चिंता का विषय है।

उच्च शिक्षा समाज के लिए तभी बेहतर हो सकती है जब इससे निकल कर आने वाले अनुसंधान समाज और देश के लिए लाभप्रद हो सकें। आज सरकार विश्वविद्यालयी शोध को शिक्षकों की पदोन्नति से जोड़ने का प्रयास कर रही है जो शोध के महत्त्व को बतलाने के साथ ही किसी न किसी रूप में शिक्षकों पर नकेल कसने का प्रयास भी है। जब भी इस यक्ष प्रश्न पर विचार होता है तो यह सवाल उठना लाजिमी हो जाता है कि क्या शिक्षण संस्थाओं के नीति निर्धारकों में दूरदर्शिता का पूरी तरह अभाव है या ऐसे लोग किसी वर्ग विशेष को लाभ पहुंचाने का काम कर रहे हैं।

शोध की दशा में सुधार की दो मूल बातें सभी की समझ में आसानी से आती हैं। पहला- विश्वविद्यालय में नियुक्त होने वाले शिक्षकों की योग्यता कम से कम इतनी तो अवश्य हो कि वे अपनी संस्थाओं में पीएचडी कराने हेतु पात्र हों। इस संदर्भ में यह ज्ञातव्य है कि राजस्थान विश्वविद्यालय में वर्ष 2014 में एक सौ अड़सठ शिक्षकों का चयन हुआ था जिनमें से एक सौ बारह शिक्षक शोध कराने के योग्य ही नहीं थे। इस पर भारत का नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर चुका है। अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय (एएमयू), सरगुजा विश्वविद्यालय, गोवा विश्वविद्यालय, लखनऊ विश्वविद्यालय आदि में गैर पीएचडी धारक शिक्षकों की नियुक्ति से संबंधित मामले सामने आए। देश में पीएचडी धारक शिक्षक उम्मीदवारों की कोई कमी नहीं है। ऐसे ही न जाने कितने विश्वविद्यालय हैं जो व्यक्ति या वर्ग विशेष को लाभ पहुंचाने के लिए बिना पीएचडी शिक्षकों का चयन कर शोध के स्तर को निरंतर गिरा रहे हैं। इस समस्या के समधान के लिए 2021 तक का इंतजार समझ से परे है।

दूसरी बात उन छात्रों से संबंधित है जो पीएचडी में प्रवेश लेने के उपरांत सरकार द्वारा दी गई छात्रवृत्ति का लाभ उठाते हुए शोध के दौरान प्राप्त की गई छात्रवृत्ति और समय का उपयोग नौकरी खोजने में करते हैं और जब भी उन्हें किसी क्षेत्र में नौकरी मिल जाती है तो पीएचडी छोड़ कर चले जाते हैं। उनकी नौकरी का क्षेत्र उनके शोध-कार्य से पूर्णतया पृथक होता है और शिक्षक द्वारा छात्रों के लिए शोध के दौरान किया गया श्रम व्यर्थ चला जाता है। यूजीसी ने शोध कराने वाले शिक्षकों को ऐसा कोई उपाय नहीं बताया कि बीच में शोध-कार्य छोड़ कर जाने वाले छात्रों से कैसे निबटा जाए? इस संदर्भ में जब भी छात्रों से बात करने का प्रयास किया जाता है तो वे कहते हैं कि पहले सरकार पीएचडी धारकों के लिए नौकरी सुनिश्चित करे तभी समस्या का स्थायी समाधान निकल सकता है, जो कि निकट भविष्य में दिखाई नहीं देता और यह शोध निर्देशकों के बस की बात भी नहीं है। यह निरंतर देखने में आया है कि उच्च शिक्षा प्राप्त छात्र किसी भी क्षेत्र में जाकर अपनी योग्यता से निचले स्तर पर नौकरी करते हुए अवसाद के शिकार होने लगते हैं और उनमें कार्य कुशलता का पूरी तरह अभाव रहता है। आज के परिवेश में छात्रों को बेरोजगारी से बचाने के लिए शोध को रोजगार से जोड़ना बहुत आवश्यक है।

उच्च शिक्षण संस्थानों में शोधरत छात्रों के लिए सबसे पहले आजीविका सुनिश्चित करनी चाहिए, क्योंकि पीएचडी का आजीविका से न जुड़ना शोध स्तर में गिरावट का मुख्य कारण माना जाता है। साथ ही, बीच में शोध-कार्य छोड़ देने वाले छात्रों की जवाबदेही सुनिश्चित कर उससे असंतुष्ट होने पर छात्रवृत्ति वापस लेने का प्रावधान भी किया जाना चाहिए। नीति निर्धारकों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि विद्यार्थी जिस क्षेत्र में अध्ययन और विशेषज्ञता प्राप्त क रने के लिए सरकार से (जेआरएफ, सीएसआइआर या इसके समकक्ष) कोई अनुदान उठाता है, और यदि वह अपना क्षेत्र बदलता है तो उक्त क्षेत्र में अध्ययन-अनुसंधान हेतु प्राप्त की गई संपूर्ण सहायक धनराशि अनुदानित संस्था को वापस लौटानी पड़ेगी।

भारत में उच्च शिक्षा में प्रवेश पाने वाले छात्र उम्र के उस पड़ाव तक पहुंच चुके होते हैं कि उन्हें अध्ययन के साथ ही अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों का भी निर्वहन करना पड़ता है। देश के अधिकांश छात्र उच्च शिक्षा के दौरान मिलने वाली छात्रवृत्ति से अध्ययन के साथ-साथ पारिवारिक आवश्यकताओं की भी पूर्ति करते हैं। शोधार्थी छात्रवृत्ति को पूर्णरूप से अपने शोध कार्य पर खर्च नहीं कर पाते। इससे शोध की गुणवत्ता पर असर पड़ता है। इसके अलावा, यदि छात्र का परिवार अपनी रोजमर्रा की आवश्यकताओं से जूझता रहेगा तो उसका मन शोध कार्य में नहीं लगेगा और वह अपने उद्देश्य में पूर्णत: सफल भी नहीं होगा। इसलिए शोध छात्रों को इतनी धनराशि अथवा सहायता मिलनी चाहिए कि वे शोध-अध्ययन के साथ-साथ पारिवारिक जीवन का भी निर्वाह सही तरीके से कर सकें।

उच्च शिक्षा में होने वाले शोध को समाज और देश के सम्मुख लाने का प्रयास होना चाहिए, ताकि जन समुदाय इससे सीधे लाभान्वित हो सके। भारत में शिक्षक या विश्वविद्यालय अपने ज्ञान और नवीन शोध /अनुसंधान का प्रचार-प्रसार नहीं करते, इसलिए यह समाजोपयोगी नहीं बन पाता। ऐसा देखा गया है कि एक ही विषय पर एक ही समय में अलग-अलग विश्वविद्यालयों में शोध-कार्य चल रहें हैं जो ज्ञान और सूचनाएं साझा न करने का दुष्परिणाम है। शोध-कार्य की पुनरावृत्ति और इनका समाजोपयोगी नहीं बन पाना विश्वविद्यालयों के लिए बहुत बड़ी समस्या है। हालांकि यूजीसी ने इस समस्या से निपटने की पहल की है, लेकिन अभी तक कोई ठोस परिणाम देखने को नहीं मिले हैं।

आज नव उदारीकरण के दौर में उच्च शिक्षा क्षेत्र में चुनौतियां कम नहीं हैं। बाजार के दबाव में छात्र, शिक्षक और हमारे शैक्षिक ढांचे को इससे जूझना पड़ रहा है। जब तक उपर्युक्त पहलुओं पर गहराई से विचार कर कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया जाएगा तब तक देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में शोध की दशा में न तो सुधार होगा और न ही समाज के लिए वह पूर्णत: उपयोगी सिद्ध होगा। अभी तक देखने में आया है कि देश के नीति निर्धारक इसके लिए कभी छात्रों को जिम्मेदार ठहराते रहे हैं तो कभी शिक्षकों को। जबकि इन परिस्थितियों में आवश्यक हो जाता है कि छात्र, शिक्षक और हमारे नीति निर्धारक सभी साथ बैठ कर विचार करें कि इसमें सुधार के लिए क्या कुछ किया जा सकता है? इसके लिए कौन से उपाय कारगर होंगे? देश के शिक्षक और छात्र दोनों को इस बात का भरोसा दिलाना आवश्यक है कि उनकी योग्यता का पूरा सम्मान होगा। देश में योग्य उम्मीदवारों को ही नौकरी और पदोन्नति मिलेगी। इसके लिए सरकार को जल्द से जल्द जमीनी स्तर पर कारगर उपाय करने चाहिए, ताकि ईमानदारी से काम करने वाले छात्रों और शिक्षकों का मनोबल बढ़े और वे समाजोपयोगी नए-नए विषयों पर अध्ययन-अध्यापन और शोध के लिए प्रेरित हों।

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