ताज़ा खबर
 

राजनीति: संकट बनता प्लास्टिक

प्लास्टिक का उपयोग कम करने से लेकर बेकार प्लास्टिक को सही तरह से फेंकने और उसका प्रबंध करने की जरूरत है। इसी क्रम में बेकार प्लास्टिक का उपयोग सड़क निर्माण में किया जा रहा है और यह इसकी खपत का अच्छा तरीका है। भारत समेत दुनिया के कई हिस्सों में अनुपयोगी प्लास्टिक कचरे से सड़कें बनाई जा रही हैं।

Author Published on: May 21, 2019 1:13 AM
पूरी दुनिया के लिए यह गंभीर समस्या बन गई है।

संजय कुमार सिंह

प्लास्टिक धरती के लिए संकट का बड़ा कारण बन जाएगा, किसी ने सोचा भी नहीं होगा। धरती पर प्रदूषण के जितने भी रूप और कारण हैं उनमें प्लास्टिक सबसे बड़ा कारण बन कर उभरा है। चाहे समंदर हों, धरती के ध्रुव हों या हिमालय जैसे पर्वत, या फिर जमीन, सब जगह प्लास्टिक बड़ी समस्या बन गया है। इसलिए अब धरती को बचाने के लिए जितने भी अभियान चल रहे हैं उनका पहला मकसद ही धरती को प्लास्टिक से मुक्त कराना है। प्लास्टिक हमारे जीवन में इस कदर घुस गया है कि कपड़े के झोले को भूल चुके हैं। प्लास्टिक से होने वाले नुकसान के मद्देनजर अब फिर से बाजार में कपड़े और जूट के थैलों का चलन शुरू हुआ है। अभी हम प्लास्टिक की जिस थैली का उपयोग करते हैं उसकी खोज 1965 में ही हो गई थी, पर अमेरिका में इसका प्रचलन 1979 में हुआ। आठवें दशक के मध्य में महसूस किया गया कि यह बहुत सस्ता और उपयोगी है और उस समय पचहत्तर फीसद सुपर मार्केट में प्लास्टिक की थैली सामान के साथ मुफ्त दी जाने लगी थी। पर बाजार में इसकी हिस्सेदारी पच्चीस फीसद ही थी। लेकिन अगले एक दशक में ही प्लास्टिक की थैलियों का अस्सी फीसद बाजार पर कब्जा हो गया। मुफ्त मिलने वाली ये थैलियां दुनिया भर में फैल गर्इं। घर में रसोई से लेकर शयनकक्ष में बच्चों के खाने से लेकर कूड़े, नाले, नदी और समुद्र तक में। सस्ता, टिकाऊ और उपयोगी होने के कारण प्लास्टिक हर चीज में है। प्लास्टिक अगर सस्ता है तो पीछा भी नहीं छोड़ता और खराब नहीं होता। मिट्टी में, पानी में गलता नहीं है और अब इसकी यही खासियत पूरी दुनिया के लिए गंभीर समस्या बन गई है।

कई देशों और शहरों में प्लास्टिक की थैली का उपयोग प्रतिबंधित है। पर अभी इस दिशा में काफी काम किया जाना है। ब्रिटेन में शोधकर्ताओं ने कहा है कि दुनिया भर में प्लास्टिक से हर साल एक सौ तिहत्तर लाख करोड़ रुपए का नुकसान होता है। भारत के केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़े बताते हैं कि देश में हर दिन पंद्रह हजार टन प्लास्टिक कचरा निकलता है। दुनिया भर के समुद्र में हर साल आठ हजार टन कचरा पहुंचता है। चौंकाने वाली बात तो यह है कि इसमें से छह हजार टन कचरा अकेले भारत से पहुंचता है। इससे मामले की गंभीरता का अंदाजा लगता है। अगर पिछले साढ़े तीन दशक में हमने यह स्थिति बना ली है तो इसे रोकना कितना जरूरी है, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

प्लास्टिक का असर हमारे पर्यावरण से लेकर जीवन तक पर है। फिर भी प्लास्टिक का उत्पादन बढ़ता ही जा रहा है। इसलिए विश्व पर्यावरण दिवस की थीम प्लास्टिक प्रदूषण को मात देने पर आधारित थी। भारत के लिए यह और महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि हमें इस वर्ष संयुक्त राष्ट्र ने विश्व पर्यावरण दिवस का मेजबान राष्ट्र बनाया है। वैसे तो जीवन में पांच तत्त्व महत्त्वपूर्ण हैं- जल, हवा, आसमान, आग और मिट्टी। लेकिन नई सभ्यता में प्लास्टिक छठी बड़ी जरूरत बन गई है। इसलिए प्रदूषण की सबसे बड़ी वजह भी प्लास्टिक बन गया है। हालांकि प्लास्टिक-प्रदूषण से मुक्ति की दिशा में काम की शुरुआत तो हुई है, लेकिन जिस रफ्तार से यह प्रदूषण बढ़ रहा है, उसकी तुलना में हमारे प्रयास ऊंट के मुहं में जीरे के समान हैं। जरूरी है कि हम इस बारे में जानें और अपनी भूमिका निभाएं।

क्या हम कभी यह सोचते हैं कि जिस तरह लकड़ी, लोहे अथवा कागज की वस्तुओं को अनुपयोगी होने पर फेंक देते हैं, वैसे ही प्लास्टिक की वस्तुओं को भी फेंकना सही है? क्या होता है जब हम इसे मिट्टी या पानी में फेंकते हैं? क्या होता है, जब इसे जलाते हैं? चूंकि यह प्राकृतिक तौर पर नष्ट नहीं होता इसलिए दुनिया भर के समुद्रों में पहुंचता रहता है। यह कचरा किसी अन्य तत्त्व या जैविक चीजों की तरह पर्यावरण में घुलता नहीं, बल्कि सैकड़ों साल तक वहां वैसे ही बना रहता है, जहां इसे फेंका गया था। साथ ही, उस जगह को अपने रसायन से जहरीला भी बनाता जाता है। प्लास्टिक जिस मिट्टी में जाता है, उसकी उर्वरता प्रभावित होती है। पानी में जाता है, तो पानी को न केवल जहरीला बनाता है, बल्कि जलीय जीवों के लिए नुकसानदेह बना देता है।

प्लास्टिक का उपयोग जितना बढ़ा है, उतना अन्य चीजों का नहीं। सन 1960 में दुनिया में पचास लाख टन प्लास्टिक बनाया जा रहा था, आज यह तीन सौ करोड़ टन से ज्यादा हो चुका है। यानी हर व्यक्ति के लिए करीब आधा किलो प्लास्टिक हर साल। पर्यावरण से लेकर हमारे जीवन तक पर इसका बुरा असर हो रहा है, फिर भी प्लास्टिक का उत्पादन बढ़ता ही जा रहा है। सौंदर्य प्रसाधनों में इस्तेमाल होने वाला माइक्रो प्लास्टिक या प्लास्टिक बड्स पानी में घुल कर प्रदूषण बढ़ा रहे हैं। इसकी मौजूदगी जलीय जीवों में भी मिली है। माइक्रो प्लास्टिक मछलियों के साथ-साथ भोजन-शृृंंखला के जरिए पक्षियों और कछुओं में भी मिलने की पुष्टि हुई है। यही वजह है कि भारत और कई अन्य देशों ने जुलाई 2017 में इस पर प्रतिबंध लगा दिया है।

वैज्ञानिकों अब तक ढाई सौ जीवों के पेट में खाना समझ कर या अनजाने में खाया गया प्लास्टिक मिल चुकाहै। इसमें प्लास्टिक बैग, प्लास्टिक के टुकड़े, बोतलों के ढक्कन, खिलौने, सिगरेट लाइटर तक शामिल हैं। समुद्र में जेलीफिश समझ कर प्लास्टिक बैग को खाने वाले जीव हैं, तो हमारे देश में सड़कों पर आवारा छोड़ दी गई गायें इन प्लास्टिक के बैग में छोड़े गए खाद्य पदार्थों के साथ बैग भी खा जाती हैं। साथ ही करीब सात सौ प्रजातियों के जलीय, पक्षी और वन्य जीव अब तक प्लास्टिक के जाल, रस्सियों और अन्य वस्तुओं में उलझे मिले हैं, जो अक्सर उनकी मौत की वजह बनते हैं।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की रिपोर्ट के अनुसार प्लास्टिक से बचने के लिए जरूरी खर्च बहुत ज्यादा है। अकेले अमेरिका अपने समुद्र तट से प्लास्टिक साफ करने में तेरह अरब डॉलर हर साल खर्च कर रहा है। भारत जैसे देशों के लिए यह रकम भारी बोझ है। जलीय जीव प्लास्टिक खा रहे हैं और इनमें से कई जीव तो मनुष्य की भोजन-शृंंखला में शामिल हैं। जब ये जीव प्लास्टिक हजम करने लगते हैं, तो न केवल अन्य जीवों की जान के लिए खतरा बनते हैं, बल्कि उनका प्लास्टिक हमारी थाली में भी पहुंच रहा है। प्लास्टिक का उपयोग कम करने से लेकर बेकार प्लास्टिक को सही तरह से फेंकने और उसका प्रबंध करने की जरूरत है। इसी क्रम में बेकार प्लास्टिक का उपयोग सड़क निर्माण में किया जा रहा है और यह इसकी खपत का अच्छा तरीका है। भारत समेत दुनिया के कई हिस्सों में अनुपयोगी प्लास्टिक कचरे से सड़कें बनाई जा रही हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार, प्लास्टिक को अधिक से अधिक मात्रा में रि-साइकिल करने की जरूरत है। लेकिन इस समय दुनिया का एक तिहाई प्लास्टिक ही रि-साइकिल हो पा रहा है। इसके अलावा एक तकनीक प्लास्टिक को र्इंधन में बदलने की भी है। इस वक्त दुनिया जिन चुनौतियों का सामना कर रही है, उनमें प्लास्टिक से निपटने की समस्या सबसे बड़ी है। प्लास्टिक की इस चुनौती से निपटने का पहला और व्यावहारिक कदम तो इसका इस्तेमाल कम से कम करना है। पर इसके अलावा भी वैज्ञानिक, बढ़ते प्लास्टिक कचरे की चुनौती से निपटने के तरीके तलाश रहे हैं, ताकि इस कचरे के राक्षस का सामना किया जा सके।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App। जनसत्‍ता टेलीग्राम पर भी है, जुड़ने के ल‍िए क्‍ल‍िक करें।

Next Stories
1 तेल संकट और भारत
2 राजनीति: समाधान मांगते बड़े मुद्दे
3 राजनीति: भंवर में शिक्षा
ये पढ़ा क्या?
X