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राजनीति: पाकिस्तान पर कसता शिकंजा

एशिया प्रशांत समूह की रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान कानूनी और वित्तीय प्रणालियों के चालीस मानकों में से बत्तीस मानकों को लागू करने में असफल रहा है। इसके अलावा वह संयुक्त राष्ट्र से मान्यता प्राप्त इकाइयों, अभिकरणों और अन्य गैर सरकारी संगठनों द्वारा आतंक के वित्त पोषण और धनशोधन के खिलाफ कार्रवाई के लिए तय किए गए ग्यारह प्रभावी मानदंडों में से दस मानदंडों को पूरा करने में असफल रहा है।

Author Published on: October 24, 2019 1:58 AM
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान। (फाइल फोटो)

विवेक ओझा

अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं और विभिन्न राष्ट्र मजबूत इच्छाशक्ति और समाधान केंद्रित फैसले तथा कार्रवाई पर ध्यान दें तो परिणाम के रूप में ऐसा ही कुछ सामने दिखता है जैसा फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की बैठक में काली सूची में आने से बचने के लिए पाकिस्तान की बेचैनी और हताशा दिख रही है। पिछले हफ्ते एफएटीएफ की हुई बैठक में पाकिस्तान को काली सूची में नहीं डालने और अगले साल फरवरी तक निगरानी सूची में ही रखने का फैसला किया गया। पाकिस्तान को काली सूची में जाने से बचाने में चीन, मलेशिया और तुर्की ने अहम भूमिका निभाई। इन देशों का मानना है कि आतंक के वित्त पोषण को रोकने के लिए पाकिस्तान प्रभावी उपाय करने में लगा है। इन देशों को लगता है कि पाकिस्तान में सब ठीक है। नियमानुसार किसी देश को काली सूची में डालने से रोकने के लिए एफएटीएफ में तीन सदस्य देशों को ऐसा प्रस्ताव करना होता है। वैश्विक स्तर पर हथियारों की तस्करी, हथियारों की खरीद-फरोख्त को तरजीह देने, कालेधन के इस्तेमाल और धनशोधन, आंतकी संगठनों को किए जाने वाले वित्त पोषण को समस्या न मानने वाले समान विचारधारा वाले देश ही गलत संदर्भों में भी एक दूसरे को बचाने की कोशिश करते हैं। इसलिए यह कहते बनता है कि आतंक के धंधे पर चोट पर चीन, मलेशिया और तुर्की के मन में खोट।

आतंकी वित्त पोषण को रोकने में विफल रहने पर एफएटीएफ की कार्रवाई से घबराए पाकिस्तान ने दस अक्तूबर को आतंकी संगठन लश्करे तैयबा के चार सरगनाओं को गिरफ्तार किया था। पाकिस्तान प्रशासन ने दावा किया कि लश्करे तैयबा और हाफिज सईद के संगठन जमात उद दावा (जेयूडी) के पूरे शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। पाकिस्तान की इस कार्रवाई की वजह एफएटीएफ की बैठक में होने वाले फैसले का खौफ है। संयुक्त राष्ट्र में इस्लामोफोबिया की बात कर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने मुसलिम देशों को साधने की कोशिश भी की थी। एफएटीएफ के एशिया प्रशांत समूह ने इस साल अगस्त में पाकिस्तान को आतंकियों को वित्त पोषण के मामले में काली सूची में डाल दिया था।

एफएटीएफ की इस कार्रवाई से पहली बार ऐसा लगा कि दुनिया में आतंकवाद पर लगाम लगाने के लिए कोई संगठन वाकई गंभीर हुआ है। आतंकी गतिविधियों पर नकेल लगाने की इस तरह की कवायद अगर होती रही तो आने वाले वक्त में आतंकवाद बीते दिनों की बात हो सकती है। पाकिस्तान पर नकेल कसने के लिए एफएटीएफ के एशिया प्रशांत समूह ने जो फैसला किया था, उसके पीछे उसने तर्क दिया था कि धनशोधन और आंतक के वित्त पोषण के नियंत्रण के बारे में जो सुरक्षा-उपाय बनाए गए हैं, उन्हें लागू करने में पाकिस्तान असफल रहा है। इसी आधार पर एफएटीएफ ने पहले से ही पाकिस्तान को निगरानी सूची में डाल रखा है। एशिया प्रशांत समूह की रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान कानूनी और वित्तीय प्रणालियों के चालीस मानकों में से बत्तीस मानकों को लागू करने में असफल रहा है। इसके अलावा वह संयुक्त राष्ट्र से मान्यता प्राप्त इकाइयों, अभिकरणों और अन्य गैर सरकारी संगठनों द्वारा आतंक के वित्त पोषण और धनशोधन के खिलाफ कार्रवाई के लिए तय किए गए ग्यारह प्रभावी मानदंडों में से दस मानदंडों को पूरा करने में असफल रहा है।

चौदह अगस्त को आजादी का जश्न मनाने के बाद पाकिस्तान ने एशिया प्रशांत समूह को साढ़े चार सौ पेज की एक रिपोर्ट सौंपी थी, जिसमें आतंकी संगठनों और उन्हें वित्तीय मदद देने वालों के खिलाफ उठाए गए कदमों के बारे में बताया गया था। पाकिस्तान ने दावा किया था कि उसने लश्कर ए तैयबा, जमात उद दवा प्रमुख हाफिज सईद के खिलाफ मुकदमा दायर किया है और जमात उद दवा की सभी परिसंपत्तियों को जब्त कर लिया है। पाकिस्तान ने इस रिपोर्ट में यह भी कहा कि इस साल उसने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा प्रतिबंधित आतंकी समूहों की परिसंपत्तियां ज़ब्त कर ली हैं । गौरतलब है कि एफएटीएफ ने पाकिस्तान के लिए जिस सत्ताईस सूत्रीय कार्य योजना का निर्धारण किया था, उसके संदर्भ में पाकिस्तान द्वारा पेश किए गए दस्तावेज की समीक्षा की जानी है। इसके बाद ही एफएटीएफ पाकिस्तान का भविष्य तय करेगा। भारत एफएटीएफ और उसके एशिया प्रशांत समूह दोनों का ही सदस्य है और पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करने में लगा है। एफएटीएफ की वार्ताओं में भारत के वित्त मंत्रालय, विदेश मंत्रालय और गृह मंत्रालय के अधिकारी शामिल होते हैं। पाकिस्तान के आतंकी वित्त पोषण के मुद्दे के विषय पर समीक्षा कराने की बात अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस ने की है।

पाकिस्तान का अब तक का इतिहास बता रहा है कि वह वित्तीय अपराधों को रोकने और आतंकी संगठनों के वित्त पोषण को रोकने में असफल रहा है। एफएटीएफ की निगरानी में आने से बचने के लिए पाकिस्तान को छत्तीस वोटों में से पंद्रह वोटों की जरूरत थी। पाकिस्तान का कहना है कि लंदन पाकिस्तान को निगरानी सूची से निकालने में मदद देने के लिए तैयार हो गया है। पाकिस्तान ने यह भी बताया है कि उसने आतंकी संगठनों को वित्त पोषण रोकने के लिए तीन अहम कदम उठाए हैं, जिनमें बिना टैक्स नंबर के विदेशी मुद्रा के लेन-देन पर रोक, आइडी कार्ड की कॉपी जमा किए बिना खुले मुद्रा बाजार में पांच सौ डॉलर से अधिक की मुद्रा पर प्रतिबंध और कई आतंकी समूहों पर प्रतिबंध और उनकी संपत्ति जब्त करने जैसे बड़े कदम शामिल हैं। एफएटीएफ ने पाकिस्तान से पूछा है कि लश्कर ए तैयबा, जैश ए मोहम्मद, जमात उद दवा और फलाह ए इंसानियत फाउंडेशन द्वारा जिन स्कूलों, मदरसों, अस्पतालों और एंबुलेंस का रखरखाव किया जा रहा है और जिसके लिए पाकिस्तान को सत्तर लाख डॉलर दिए गए हैं, क्या उसकी कोई जांच पाकिस्तान सरकार ने करवाई है। इस स्थिति में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ), विश्व बैंक, एशियाई विकास बैंक (एडीबी) और यूरोपियन यूनियन (ईयू) के साथ ही क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों मूडीज, फिच और एसएंडपी द्वारा भी पाकिस्तान की रेटिंग घटाने की संभावना बनी हुई है। पाकिस्तान ने आतंकी संगठनों और उनके मुखियाओं के खिलाफ आतंकवाद निरोधक कानून-1997 के तहत कार्रवाई करने के बजाय बहुत ही हल्के कानूनों के तहत कार्रवाई की है। यह पाकिस्तान की मंशा पर सवाल खड़े करने के लिए काफी है।

सऊदी अरब को हाल में एफएटीएफ की पूर्ण सदस्यता प्रदान की गई है। सऊदी अरब पहला अरब देश बन गया है जिसे इस समूह की सदस्यता मिली है। अमेरिका में आयोजित समूह की सालाना बैठक के बाद सऊदी अरब को यह मौका मिला है। इस संगठन में सऊदी अरब की सदस्यता कई मायनों में दक्षिण एशिया में आतंक के वित्त पोषण को नियंत्रित करने में एक कारगर कदम साबित हो सकती है। चूंकि एफएटीएफ में खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के छह सदस्यों के अलावा यूरोपियन यूनियन भी सदस्य है, इसलिए यह इन सभी सदस्यों के वित्त पोषण प्रक्रिया को तार्किक बनाने में मददगार साबित होगा। सऊदी अरब अब किसी देश को अनुदान, ऋण देने से पहले सोचेगा कि कहीं इसका इस्तेमाल प्राप्तकर्ता देश आतंकी गतिविधियों को चलाने में तो नहीं करेगा। चूंकि जीसीसी एक क्षेत्रीय समूह के रूप में एफएटीएफ का सदस्य है तो संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, बहरीन, ओमान और कतर पर भी दबाव पड़ेगा कि वे पाकिस्तान जैसे देश को आर्थिक मदद देने के पहले सुनिश्चित कर लें कि पाकिस्तान ऐसे धन का क्या इस्तेमाल करने वाला है।

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