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राजनीति: चुनौती बनते वायरस

पिछले कुछ सालों में जो वायरस संक्रमणजन्य बीमारियां सुनने में आई हैं उससे चिंता होती है कि इन सबके वायरस खत्म करने में कितना समय लगेगा और बर्ड फ्लू, स्वाइन फ्लू, इबोला, जीका, एचआइवी-एड्स आदि से गरीब देशों की जनता कब मुक्त हो पाएगी।

Author June 11, 2019 1:53 AM
निपाह वायरस (Source: PTI)

संजय कुमार सिंह

केरल में इन दिनों निपाह वायरस के संक्रमण के मामले सामने आए हैं। पुणे स्थित राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान (एनआइवी) ने जांच के बाद राज्य में कुछ मरीजों के इससे संक्रमित होने की पुष्टि भी कर दी है। यह वायरस चमगादड़ों के जरिए फैलता है। इसलिए राज्य के वन विभाग को भी सतर्क कर दिया गया है। इससे पता चलता है कि जानवरों के जरिए मनुष्यों में आने वाले ऐसे वायरस का मामला कितना गंभीर है और इससे बचना कितना मुश्किल। पिछले कुछ सालों में भारत, ब्राजील सहित कई विकासशील और खासतौर से अफ्रीकी देश किसी न किसी वायरस के हमले की चपेट में आते रहे हैं। चिंताजनक बात तो यह है कि वायरसों का यह हमला तेजी से होता है और जल्द ही आबादी के बड़े हिस्से को अपनी जद में ले लेता है। निपाह वायरस का पहला मामला भारत में 2001 में सामने आया था जब मलेशिया के जरिए यह वायरस भारत पहुंचा था। उस समय पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में इसके छियासठ मामले सामने आए थे, जिनमें से पैंतालीस लोगों की मौत हो गई थी। इसलिए इस बार इससे बचने में पूरी सावधानी बरती जा रही है।

इससे पहले 2014 में इबोला वायरस के हमले ने भी सरकार की नींद उड़ा दी थी। हालांकि इसके प्रकोप को रोक लिया गया था। इबोला वायरस संक्रमित जानवर जैसे बंदर, सूअर या एक खास प्रजाति की चमगादड़ के खून या शरीर के तरल पदार्थ के संपर्क में आने से फैलता है। माना जाता है कि चमगादड़ स्वयं प्रभावित हुए बिना इस वायरस को रखते और फैलाते हैं। जब यह संक्रमण मनुष्यों में फैल जाए तो फिर यह बीमारी मनुष्यों के बीच फैल सकती है और महामारी का रूप ले सकती है। इससे बचाव का रास्ता यही है कि संक्रमित बंदरों और सुअरों से यह बीमारी मनुष्य में न फैलने दी जाए। जानवरों में संक्रमण की जांच करके और संक्रमण पाए जाने पर उनके शरीर को समुचित तरीके से नष्ट करके ही इसकी रोकथाम की जा सकती है। पर ऐसे संक्रमित जानवरों को खत्म करना आसान नहीं है। वैसे तो इन जानवरों के मनुष्यों के बीच या उनके संपर्क में रहने का कोई कारण नहीं है, पर भिन्न कारणों से इन्हें मारने पर रोक है और वैसे भी कुत्ते-बंदर आदि आम लोगों को परेशानी का कारण बन जाते हैं। इतना ही नहीं, इनके काटे से बचाव की दवा भी सरकारी अस्पतालों में आमतौर पर उपलब्ध नहीं होती है।

एड्स, पोलियो, पीलिया या हेपेटाइटिस, खसरा, डेंगू, इन्फ्लूएंजा, छोटी माता आदि बीमारियां वायरस संक्रमण के कारण ही होती हैं। आंखों में ट्रेकोमा भी वायरस के कारण होता है, जबकि रेबीज कुत्ते या बंदर के काटने से होता है। मैनिनजाइटिस, हर्पीज, गलशोथ और चेचक जैसी बीमारियां विषाणुओं से फैलती हैं। इन्हें रोकने और खत्म करने की कोशिश चल रही है। चेचक को तो लगभग रोका जा चुका है और पोलियो खत्म होने के कगार पर है। फिर भी वायरसों के कारण होने वाली बीमारियां मनुष्य के लिए गंभीर चुनौती तो हैं ही।

अभी तो हम कई सालों से पोलियो का वायरस खत्म करने में लगे हैं। पिछले कुछ सालों में जो वायरस संक्रमणजन्य बीमारियां सुनने में आई हैं उससे चिंता होती है कि इन सबके वायरस खत्म करने में कितना समय लगेगा और बर्ड फ्लू, स्वाइन फ्लू, इबोला, जीका, एचआइवी-एड्स आदि से गरीब देशों की जनता कब मुक्त हो पाएगी। इस तथ्य के मद्देनजर देखा जाना चाहिए कि जीका वायरस का पता 1947 में युगांडा में चला था जो 2015 में लैटिन अमेरिकी देश, खासकर ब्राजील में फैल गया। 1973 के बाद से दुनिया में विषाणु से फैलने वाली तीस नई बीमारियां सामने आई हैं। वायरस से बीमारी की समस्या बहुत आम है और यह मुर्गों से भी फैलता है। तब तो मुर्गों को नष्ट कर दिया जाता है क्योंकि वे खाने के लिए होते हैं और बीमार जानवर या पक्षी का मांस खाना खतरे से खाली नहीं है। लेकिन सरकारें ऐसे उपाय करने में नाकाम रहती हैं कि यह संक्रमित खाद्य लोगों तक न पहुंच पाए। इसी का नतीजा होता है कि संक्रमित मांस ऐसे वायरसों को तेजी से फैला देता है।

नगरों-महानगरों में मनुष्यों को परेशान करने वाले जानवर पहले कुत्ते और बंदर ही थे। अब गाएं और सांड़ भी हैं। समस्या इनकी मौजूदगी नहीं है। असली समस्या इनसे बचाव के उपाय न होना है। गायों के झुंड का सड़कों पर बैठा होना बहुत आम है और इसी तरह सड़क पर कुत्ते या किसी और जानवर के चले आने से दुर्घटनाएं आम हैं। जब हम इनसे बचने के साधारण और लगभग जरूरी उपाय नहीं कर पाते हैं तो कभी-कभी होने वाले वायरस से निपटने के उपाय कमजोर होंगे ही। यह सही है कि जानवरों को भी जीने का हक है और मनुष्य अपनी शक्ति व योग्यता का उपयोग कर उन्हें मार दे, यह उचित नहीं है। पर इनसे बचाव के उपाय तो होने ही चाहिए। जब बचाव के उपाय मार देने से महंगे हों तो ये उपाय सरकार को ही करने चाहिए। पर इसमें सरकारी लापरवाही साधारण नहीं है।

वैसे तो संक्रामक रोग किसी को और कभी भी हो सकते हैं। लेकिन आमतौर पर बरसात में संक्रामक बीमारियां फैलती हैं। हालांकि इसका संबंध वर्षा से कम, साफ सफाई से ज्यादा है। साफ-सफाई पर्याप्त नहीं होने के कारण बरसात में हर तरफ गंदगी व सड़ांध फैली होती है। वायरस संक्रमण के लिए यही सबसे उपयुक्त काल होता है। गरीब देश के लोग मौसम की मार से वैसे ही त्रस्त होते हैं और अच्छा खान-पान न होने के कारण उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कम होती है। इसलिए, बरसात में ये वायरस जनित बीमारियां ज्यादा फैलती हैं और अमूमन ऐसा गरीब देशों में होता है। तकनीकी तौर पर कहा जा सकता है कि सावधानी बरत कर काफी हद तक इनसे बचना संभव है। सफाई तो हम अपनी और अपने घर की कर सकते हैं, लेकिन घर के आसपास और सड़क, नाले, बाजार और अस्पतालों से निकलने वाला कचरा गंभीर समस्या है। सरकारें और स्थानीय निकाय इसके प्रति लापरवाह ही रहते हैं।

एक बड़ी समस्या शिक्षा और अफवाहों से बचने की भी है। शिक्षा न होने के कारण लोग अफवाहों के फेर में आसानी से पड़ जाते हैं और इसका असर होता है कि जिन बीमारियों और वायरस से बचाव के लिए टीकाकरण या दवाइयां उपलब्ध हैं, लोग उनका भी सेवन नहीं करते हैं। सरकारी अभियान का विरोध भी होता है और सरकार इसका ढंग से मुकाबला भी नहीं कर पाती है। इससे नुकसान यही होता है कि सारी समस्याएं टलती जा रही हैं और अनुकूल स्थिति का इंतजार किया जा रहा है।

भारत में जानलेवा बीमारियों के वायरस आते रहते हैं। दूसरे देशों से आए संक्रमित लोगों, खाद्य पदार्थों या फिर अन्य किसी तरह से, भारत में ऐसे वायरसों का हमला होता रहा है। बस, बात यही है कि कुछ अपना काम कर जाते हैं, कुछ बेअसर रहते हैं। लेकिन पूरी सरकारी मशीनरी को तो सतर्क होना ही होता है। पिछले साल इन्हीं दिनों दक्षिण भारत के राज्यों में निपाह वायरस की चर्चा थी। तब इस वायरस और इस कारण होने वाली बीमारी से बचने का टीका नहीं था। हालांकि इससे बचने के उपाय बताए गए थे, लेकिन इसे देश भर में समय रहते आम आदमी तक पहुंचाना भारी मुश्किल है। ऐसे में वायरसों से होने वाला संक्रमण एक बड़ी चुनौती तो है ही।

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