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राजनीति: श्रीलंका में नई चुनौतियां

श्रीलंका में चीन की कई परियोजनाएं चल रही हैं और उसने श्रीलंका को एक सौ चालीस करोड़ डॉलर का कर्ज भी दे रखा है।

Author Published on: November 20, 2019 2:30 AM
इस समय श्रीलंका में गोटबाया राजपक्षे राष्ट्रपति चुनाव में जीत हासिल कर श्रीलंका के नए नायक बन गए हैं।

लोकतंत्र में शक्ति की राजनीति या बल की राजनीति के सहारे भी सत्ता के शिखर को हासिल किया जा सकता है। यूरोप की सामंतवादी ताकतों की इन नीतियों के प्रभाव में अब विकासशील और पिछड़े राष्ट्र भी शुमार हो गए हैं। दरअसल भारत के दक्षिण में स्थित श्रीलंका की आंतरिक राजनीति में तेजी से जो बदलाव आ रहे हैं, उससे यह साफ हो जाता है कि समाज के एक विशेष और छोटे तबके पर लौह और रक्त की नीति का प्रयोग करने से बहुसंख्यक समाज खुश हो सकता है और यह लोकतांत्रिक सत्ता की सर्वोच्च सीढ़ियां चढ़ने का एक सशक्त माध्यम भी बन सकता है।

इस समय श्रीलंका में गोटबाया राजपक्षे राष्ट्रपति चुनाव में जीत हासिल कर श्रीलंका के नए नायक बन गए हैं। उनका संबंध परंपरावादी दल श्रीलंका पोदुजन पेरामुना से है जो आमतौर पर बहुसंख्यक सिंहलियों के हितों के प्रति उदार और अन्य अल्पसंख्यक समूहों के लिए अपेक्षाकृत कठोर माना जाता है। गोटबाया राजपक्षे देश के पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे के भाई होने के साथ ही देश के रक्षा मंत्री भी रहे हैं। श्रीलंका से तमिल पृथकतावादी संगठन एलटीटीई (लिबरेशन टाइगर आॅफ तमिल ईलम) के खात्मे का श्रेय गोटबाया को ही जाता है। इसीलिए इन चुनावों में वे देश की बाहुल्य सिंहली जनता की एकमात्र पसंद बन कर उभरे।

श्रीलंका का उत्तरी भाग भारत के दक्षिण पूर्वी समुद्र तट से मात्र कुछ ही किलोमीटर दूर है। जाहिर है, श्रीलंका और भारत में सांस्कृतिक समानताएं तो हैं ही, लेकिन साथ ही भारत के लिए इस देश का खास सामरिक महत्त्व भी है। श्रीलंका की भारत को लेकर शुरू से आशंकाएं रही हैं जिसके मूल में इस देश में तमिलों की संख्या और भारत की मजबूत सामरिक शक्ति है। इस समय भारत श्रीलंका सामरिक संबंधों की बात करें, तो श्रीलंका भारत के धुर विरोधी चीन से सबसे ज्यादा हथियार खरीदता है और पाकिस्तान के साथ उसका नाभिकीय सहयोग जारी है।

गोटबाया राजपक्षे पिछले कुछ समय में सिंहलियों के सर्वमान्य नेता के रूप में भी उभरे हैं। गोटबाया अपने भाई के समान ही सिंहली राष्ट्रवाद के प्रतीक बन गए हैं। चीन के प्रति उनकी उदार नीतियां और पाकिस्तान से गरमाहट पूर्ण संबंध चर्चा में हैं। इसलिए भारत की दृष्टि से भी इस राजनीतिक घटनाक्रम का महत्त्व बढ़ जाता है। इन सबके बीच इस तथ्य को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि राजपक्षे के पूर्व भी श्रीलंका का राजनीतिक इतिहास भारत विरोध के आसपास ही रहा है।

भारत की आजादी के कुछ महीनों बाद ही नवंबर,1947 में श्रीलंका ने ब्रिटेन के साथ रक्षा संधि कर ली थी। इस पर श्रीलंका के एक समय प्रधानमंत्री रहे और शिखर नेता कोटलेवाला ने स्पष्ट कहा था कि यदि श्रीलंकाई प्रायद्वीप से ब्रिटिश अड्डा हट जाएगा तो भारत इस प्रायद्वीप को हथिया लेगा। आगे चल कर भी श्रीलंका की कई सरकारों ने भारत विरोधी नीति पर चलकर चीन को अपना प्रमुख सामरिक साझीदार बनाया और साथ ही पाकिस्तान से नाभिकीय और सैन्य संबंध भी मजबूत किए। भारत-चीन के 1962 के युद्ध में भी श्रीलंका की नीति चीन के पक्ष में झुकी नजर आई। 1971 में भारत पाकिस्तान युद्ध के दौरान पाकिस्तान के विमानों के लिए श्रीलंका ने अपना हवाई क्षेत्र खोल कर भारत विरोधी नीति का परिचय दिया। इस सबके साथ कथित तौर पर भारत के मूल निवासी माने जाने वाले तमिलों के दमन की उसकी नीति दोनों देशों के संबंधों के लिए चुनौतीपूर्ण रही है।

श्रीलंका की आबादी बीस करोड़ से ज्यादा है, जिसमें दस फीसद मुसलमान और बारह फीसद हिंदू हैं, जिनमें ज्यादातर तमिल अल्पसंख्यक हैं और सात फीसद लोग ईसाई धर्म को मानने वाले हैं। श्रीलंका के जाफना, बट्टीकलोआ और त्रिंकोमाली क्षेत्र में करीब बीस लाख तमिल रहते हैं जिनका संबंध दक्षिण भारत से है। श्रीलंका और भारत के दक्षिण में यह मान्यता है कि दक्षिण भारत के तमिलों ने सिंहलियों को पराजित किया था। तमिलों के प्रति घृणा की नीति को बढ़ावा देने के लिए श्रीलंका के नेताओं ने सिंहली राष्ट्रवाद स्थापित करने का भरपूर प्रयास किया, ताकि तमिलों को दबाया जा सके और पड़ोसी भारत से सौदेबाजी की जा सके। इससे श्रीलंका में लंबे समय तक गृहयुद्ध जैसे हालात बने रहे। तमिलों पर अत्याचार के साथ ही श्रीलंका में इस समय अल्पसंख्यक मुसलमान भी संकट में है।

इस साल ईस्टर पर श्रीलंका के चर्चों को आतंकी संगठन आइएस ने सिलसिलेवार बम धमाकों से निशाना बनाया था। इस घटना के बाद मुसलमानों को लेकर सिंहली गुस्से में है। मुसलमानों की दुकानों से सिंहलियों से सामान खरीदना कम या बंद कर दिया है। वहां के धार्मिक बौद्ध समूह ऐसी भावनाओं को भड़का रहे हैं। श्रीलंका का पूरा मुस्लिम समुदाय गहरे तनाव में है और उनके साथ अपमानजनक व्यवहार की घटनाओं मे खासी वृद्धि हुई है।

श्रीलंका में आंतरिक अशांति के बीच चीन ने वहां अपना दबदबा कायम करने की भरपूर कोशिशें की है। उसका यह कदम भारत के प्रभाव को कम करने की नीति का एक भाग है। 2009 में जब श्रीलंका से एलटीटीई का खात्मा हुआ तो चीन पहला देश था जो उसके पुनर्निर्माण के लिए खुल कर सामने आया था। चीन ने 2014 में राजपक्षे को चुनाव में जीत दिलाने की कोशिशें की थीं, लेकिन राजपक्षे हार गए थे। राजपक्षे की हार को भारत की जीत के तौर पर देखा गया था। इस पर न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट में यह खुलासा भी हुआ था कि चाइना हार्बर इंजीनियरिंग कंपनी लिमिटेड (सीएचईसी) ने राजपक्षे को चुनाव जितवाने के लिए 70.6 लाख डॉलर की रकम दी थी। भारत ने 2014 में सिरीसेना की उम्मीदवारी का समर्थन करने की बात कही थी और रानिल विक्रमसिंघे को भारत के दोस्त के तौर पर देखा गया था।

श्रीलंका में चीन के गहरे व्यापारिक हित हैं। चीन और श्रीलंका के बीच दक्षिण समुद्री बंदरगाह हंबनटोटा को लेकर 1.1 अरब डॉलर का समझौता हो गया है। श्रीलंका में चीन की कई परियोजनाएं चल रही हैं और उसने श्रीलंका को एक सौ चालीस करोड़ डॉलर का कर्ज भी दे रखा है। मध्यपूर्व से होने वाले तेल आयात के रूट में श्रीलंका एक अहम पड़ाव है, इसीलिए चीन की यहां निवेश करने में रुचि है। राजपक्षे बंधुओं की चीन के अनुकूल नीति के साथ ही पड़ोसी देश में परंपरावाद का हावी होना इस पूरे उप महाद्वीप के लिए बड़ा संकट बन सकता है।

आधुनिक प्रगतिशील युग में कई देशों में धुर दक्षिणपंथी राजनेता अपनी विभाजनकारी नीतियों के बल पर बेहद लोकप्रिय हो रहे हैं और उनके दल सत्ता पर काबिज भी हो रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा संकट अल्पसंख्यक धार्मिक, नस्लीय और जातीय समूहों के सामने उठ खड़ा हुआ है। बदलते दौर में दक्षिणपंथी ताकतों ने न केवल वैधानिक सत्ता के जरिए व्यवस्था को परिवर्तित कर दिया है, बल्कि वे जातीय और धार्मिक समूहों की पैरोकार भी बन गई हैं। पाकिस्तान जैसे मजहबी देश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा इसीलिए चुनौती बन गई है क्योंकि प्रभावी धार्मिक समूहों के सामने सत्ता कड़े कदम उठाने से बचती रही है। इन्हीं कारणों से कट्टरता आगे बढ़ कर आतंकवाद को बढ़ावा देने लगती है। श्रीलंका भी इसी दिशा में अग्रसर होता जा रहा है।

भारत को पड़ोसी देश श्रीलंका की आंतरिक और बाह्य राजनीति पर प्रभाव बनाए रखने के लिए विशेष कूटनीतिक प्रयासों की जरूरत होगी। इस दौर में भारत को भू अर्थशास्त्र और भू-राजनीति में समन्वय स्थापित करते हुए पड़ोसी देश से सौदेबाजी की शक्ति और क्षमता बढ़ानी होगी। बहरहाल, भारत की आंतरिक और सामरिक सुरक्षा के लिए राजपक्षे की नीतियां चुनौतीपूर्ण रहने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।

ब्रह्मदीप अलूने

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