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राजनीति: सुरक्षा के लिए चुनौती

बात चाहे आम लोगों की निजी जिंदगी से जुड़ी सूचनाओं की हो या देश की जासूसी की, स्मार्टफोनों और ऐप का संदेह में आना एक बड़ी चिंता की बात है।

Author नई दिल्ली | Published on: January 23, 2020 12:24 AM
हाल में भारतीय नौसेना में जासूसी और हनी ट्रैप के तमाम किस्से उजागर हुए हैं।

देश में मोबाइल फोन, खासतौर से स्मार्टफोन और उनके जरिए होने वाला सूचनाओं का आदान-प्रदान जीवन का एक जरूरी हिस्सा बन चुका है। आम जिंदगी में अब कोई व्यक्ति इसकी कल्पना भी नहीं कर सकता कि वह किसी दिन स्मार्टफोन और उसमें मौजूद रहने वाले प्रोग्राम यानी ऐप के बिना रह सकता है। वैसे तो स्मार्टफोन ने जिस तरह हमारी जिंदगी का सुख-चैन छीना है, उस पर दुनिया भर के समाजशास्त्री और चिकित्सक गंभीर चिंता जताते रहे हैं और स्मार्टफोन के इस्तेमाल की लत को एक गंबीर बीमारी करार दे चुके हैं। लेकिन इधर कुछ अरसे से सरकार और उसकी एजेंसियों को ये स्मार्टफोन एक अन्य कारण से चिंता की वजह लग रहे हैं, खासतौर से सेना और खुफिया ब्यूरो (आइबी) को चिंता है कि कहीं ये स्मार्टफोन देश की जासूसी करने में मददगार तो साबित नहीं हो रहे हैं। चिंताओं का दायरा अमेरिका तक फैला है, जहां अमेरिकी सेना ने एक मशहूर चीनी ऐप ‘टिकटॉक’ को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताते हुए उसे प्रतिबंधित कर दिया है। सवाल है कि क्या स्मार्टफोन सिर्फ आम लोगों की निजी सूचनाओं के अलावा राष्ट्रीय महत्त्व की सूचनाओं में सेंध लगाने का जरिया बन गए हैं।

हाल में भारतीय नौसेना में जासूसी और हनी ट्रैप के तमाम किस्से उजागर हुए हैं। जासूसी की आशंका के तहत पुलिस की खुफिया शाखा ने केंद्रीय खुफिया एजेंसियों और नौसेना के खुफिया विभाग के साथ मिल कर ‘आॅपरेशन डॉल्फिन्स नोज’ चलाया था, जिसमें नौसेना के सात कर्मचारियों और एक हवाला आॅपरेटर को देश के अलग-अलग हिस्सों से गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद नौसेना के कर्मचारियों के लिए स्मार्टफोन पर चलने वाले मैसेजिंग ऐप, नेटवर्किंग साइट, ब्लॉगिंग साइट, कंटेंट शेयरिंग, होस्टिंग, ई कॉमर्स साइट पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। अब नौसेना का कोई भी जवान फेसबुक का इस्तेमाल नहीं करेगा। साथ ही, नौसेना के ठिकानों, डॉकयार्ड और युद्धपोतों पर स्मार्टफोन के इस्तेमाल पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है। अब इस मामले की जांच का जिम्मा गृह मंत्रालय ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) को सौंप दिया है। ऐसे प्रतिबंध सिर्फ भारतीय नौसेना ने नहीं लगाए हैं, बल्कि अमेरिकी सेना ने भी टिकटॉक को अमेरिकी सैन्य कर्मियों के लिए प्रतिबंधित करते हुए कहा है कि इस ऐप का इस्तेमाल अमेरिकी की खुफिया जासूसी के लिए हो रहा था, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में पड़ गई थी।

जासूसी की भनक वैसे काफी पहले मिल गई थी। वर्ष 2017 में ही भारत सरकार और उसकी एजेंसियों ने अपने सुरक्षा बलों को एक खास निर्देश दिया था, जिसमें कहा गया था कि वे सुनिश्चित करें कि उनके जवानों के मोबाइल फोन में सोशल मीडिया वाले ज्यादातर ऐप न हों। अगर वे फोन में हों, तो उन्हें हटा दिया जाए। असल में, हमारी सरकार और खुफिया ब्यूरो जैसी एजेंसियों को यह महसूस हो रहा है कि चीन से बन कर आने वाले मोबाइल और चीनी कंपनियों के मोबाइल ऐप हमारे देश की सूचनाओं को सीमा पार पहुंचा रहे हैं और इस तरह स्मार्टफोन हमारे देश की जासूसी करने में सहायक साबित हो रहे हैं। यही वजह है कि वर्ष 2017 में जब खुफिया ब्यूरो के हवाले से यह आशंका जताई गई कि चीन के चालीस से ज्यादा ऐप हमारे स्मार्टफोनों को हैक कर सकते हैं। उसी दौरान सुरक्षा बलों को सलाह दी गई थी कि वे वीचैट, यूसी ब्राउजर, यूसी न्यूज, ट्रूकॉलर और शेयरइट आदि ऐप्स को अपने स्मार्टफोन से हटवा दें। आइबी के मुताबिक ये ऐप असल में चीन की तरफ से विकसित किए गए जासूसी के ऐप हैं और इनकी मदद से जो भी सूचना, फोटो, फिल्म एक दूसरे से साझा की जाती है, उसकी जानकारी चीन के सर्वरों तक पहुंच जाती है। इसी आशंका के तहत अगस्त, 2017 में, केंद्र सरकार ने स्मार्टफोन बनाने वाली चीन समेत कई अन्य देशों की इक्कीस कंपनियों को नोटिस जारी कर पूछा गया था कि वे स्पष्ट करें कि उनके मोबाइल फोन विदेश स्थित सवर्रों के माध्यम से देश से जुड़ी जानकारियों को बाहर तो नहीं भेज रहे हैं। सरकार का संदेह रहा है कि ओपो, वीवो, शाओमी और जियोनी के अलावा ऐपल, सैमसंग और भारतीय कंपनी माइक्रोमैक्स के स्मार्टफोन के जरिए चीनी खुफिया एजेंसियां भारतीय ग्राहकों की निजी जानकारियां चुरा रही हैं।

भारत में चीनी स्मार्टफोनों और उनके ऐप को जासूसी के लिए संदेह के घेरे में लेने के पीछे डोकलाम विवाद की भूमिका भी बताई जाती है। वर्ष 2017 में इससे संबंधित सवाल का एक जवाब संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने लोकसभा में लिखित रूप से दिया था। उन्होंने बताया था कि देश की एक खुफिया एजेंसी (संभवत: आइबी) की तरफ से सरकार को वीचैट (वीफोन ऐप) को प्रतिबंधित करने की अपील मिली थी। इस अपील का मुख्य कारण यह है कि यह ऐप अपने उपभोक्ताओं को वीओआइपी प्लेटफार्म के जरिए कॉलिंग लाइन आइडेंटिफिकेशन (सीएलआइ) को चकमा देने की सुविधा प्रदान करता है। सीएलआइ को छिपाने से कॉल करने वाले की पहचान उजागर नहीं हो पाती है। ऐसे में फर्जी कॉल करने में वीचैट का इस्तेमाल किया जा सकता है। खास बात यह है कि इस ऐप के जरिए होने वाली कोई भी कॉल विदेश में स्थित सर्वर से होकर आती है, इसलिए कॉल करने वाले नंबर की पहचान या उसके स्थान का पता लगाना मुश्किल होता है। इसी बात ने सरकार को चिंतित कर रखा है।

सिर्फ चीनी स्मार्टफोन या ऐप से लोगों की जासूसी हो रही है, ऐसा नहीं है। जानकारी चुरा कर उसे बेचने के आरोप फेसबुक पर भी लग चुके हैं। असल में, फेसबुक या गूगल को यह पता रहता है कि कोई व्यक्ति किसी समय में आॅनलाइन क्या गतिविधियां करता रहा है। इसके आधार पर इन्हें व्यक्ति की आॅफलाइन गतिविधियों का भी पता चलता रहता है। इन गतिविधियों में एक व्यक्ति के एक स्थान तक आने-जाने, समय, खरीदारी आदि के ट्रेंड की जानकारियां होती हैं। फेसबुक तो यह कहता भी है कि वह अपने उपयोक्ताओं के बारे में विभिन्न स्रोतों से जानकारी जुटाता है, लेकिन वह यह नहीं बताता कि उपयोक्ता के बारे में किन स्रोतों से क्या जानकारियां ली गर्इं।

बात चाहे आम लोगों की निजी जिंदगी से जुड़ी सूचनाओं की हो या देश की जासूसी की, स्मार्टफोनों और ऐप का संदेह में आना एक बड़ी चिंता की बात है। भारतीय टेलीग्राफ एक्ट 1885 एक्ट के मुताबिक ऐसी जासूसी का कृत्य दंडनीय है। पर समस्या यह है कि इसे साबित करना दिनोंदिन कठिन होता जा रहा है। देश में करोड़ों मोबाइलफोन धारक हैं और ज्यादातर के पास अब स्मार्टफोन हैं। इन पर उन्होंने कौन-कौन से ऐप डाउनलोड कर रखे हैं, इसकी जानकारी लेना भी आसान नहीं है, क्योंकि कई तो सीधे विदेश स्थित सर्वरों से सूचनाओं का आदान-प्रदान करते हैं। ऐसे दो ही रास्ते हैं- एक, या तो फेसबुक, गूगल से लेकर हर प्रमुख वेबसाइट और ऐप निर्माताओं से कहा जाए कि वे भारत में ही अपना सर्वर स्थापित करें। चीन ने ऐसा ही किया है। दूसरा रास्ता है कि देश में फेसबुक-गूगल आदि उपयोगी चीजों के विकल्प पैदा किए जाएं। चीन ने इस मामले में भी उदाहरण सामने रखे हैं और इन सभी के बेजोड़ विकल्प बना कर विदेशी आॅनलाइन दासता व जासूसी की आशंकाओं को धता बताई है। सबक यही है कि हमारे देश में भी गूगल, व्हाट्सऐप, वीचैट और फेसबुक-इंस्टाग्राम के देसी विकल्प पैदा किए जाएं। सरकार को चाहिए कि वह इन पर पाबंदी के साथ इंटरनेट के देसीकरण के प्रयासों को बढ़ावा दे, ताकि आॅनलाइन जासूसी की आशंकाओं को खत्म किया जा सके।

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