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राजनीति: संकट में दूध उत्पादक

अभी भी भारत में ठंड के कुछ महीनो में दूध का उत्पादन बहुत ज्यादा होता है। बिचौलियों की वजह से उत्पादक तक कम कीमत पहुंचने के चक्र को सब समझते हैं। कुछ महीने पहले दूध उत्पादकों का अपना दूध सड़कों पर बहा कर प्रदर्शन करना इन्हीं समस्याओं को लेकर उपजा आक्रोश था। जाहिर है, दूध के गिरते दामों से उत्पादक परेशान हैं।

Author March 20, 2019 3:37 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

सुविज्ञा जैन

अब इस बात को कोई नहीं नकार सकता कि भारतीय खेती अनिश्चितताओं से घिरा व्यवसाय है। जिस देश में आधी से ज्यादा जमीन पर खेती बारिश पर टिकी हो वहां यह कठिन होगी ही। इसीलिए इस समय भारत में छोटे-मझोले किसान, भूमिहीन किसान और मजदूर अगर कृषि की अनिश्चितताओं के बीच अपनी गुजर-बसर के लिए कहीं से सबसे ज्यादा राहत पाते हैं तो वह दूध का उत्पादन है। इस समय कोई डेढ़ करोड़ परिवार दुधारू मवेशियों को पालने और दूध के छोटे व्यापार में लगे हैं। इस बात को दोहराने की जरूरत नहीं है कि इस समय दूध के देसी उत्पादक संकट में हैं। कृषि की तरह समस्या वही है, लागत निकाल पाने में दिक्कत। इस समस्या के कुछ पहलुओं पर गौर करने के पहले इतिहास पलट कर देख लेने में हर्ज नहीं है।

भारत में दूध उत्पादन का इतिहास बहुत दिलचस्प और सुखदायक है। देश में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में इस कारोबार की यात्रा को चमत्कारी और प्रेरक माना जाता है। आजादी के बाद 1950-51 में हम एक करोड़ सत्तर लाख टन दूध का उत्पादन कर रहे थे। यह आंकड़ा सत्तर साल में लगातार बढ़ता ही रहा। आज हम सत्रह करोड़ साठ लाख टन दूध का उत्पादन कर रहे हैं। 1950-51 में अपनी जरूरत को पूरा करने के लिए करीब पचपन हजार टन दूध पाउडर का आयात किया जाता था। लेकिन सत्तर साल के सफर के बाद आज भारत कई दुग्ध उत्पादों का निर्यातक बन चुका है। इस कामयाबी का श्रेय 1970 में शुरू हुई श्वेत क्रांति को दिया जाता है। उसी समय दूध की जरूरत पूरी करने के लिए नेशनल डेरी डेवलपमेंट बोर्ड (एनडीडीबी) के संस्थापक-अध्यक्ष वी.कुरियन ने ‘आॅपरेशन फ्लड’ शुरू किया था। उन्होंने दुग्ध उद्योग में कई चौंकाने वाली सफलताएं हासिल की थीं। कुरियन ने अपने एक अमेरिकी सहपाठी, जो एक डेरी इंजिनियर भी थे, की मदद से दुनिया में सबसे पहले भैंस के दूध से पाउडर और ‘कंडेस्ड मिल्क’ बनाने का अविष्कार किया था। ‘आॅपरेशन फ्लड’ इतना कामयाब रहा कि दो दशक बाद 1998 में भारत दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश बन गया और तब से आज तक भारत दुग्ध उत्पादक देशों में पहले स्थान पर ही है।

इस समय विश्व में कुल बयासी करोड़ सत्तर लाख टन दूध का उत्पादन हो रहा है। इसमें से भारत सत्रह करोड़ साठ लाख टन उत्पादन करता है, यानी वैश्विक उत्पादन में भारत का हिस्सा करीब बीस फीसद है। इस समय वैश्विक दुग्ध उत्पादन दो फीसद की दर से बढ़ रहा है, जबकि भारतीय दुग्ध उत्पादन पिछले कई साल से औसतन पांच से छह फीसद की दर से बढ़ रहा है। ऐसा तब है जब दूध दाम उतने नहीं बढ़ रहे हैं जितनी लागत बढ़ रही है। बहरहाल, पूरे विश्व में करीब पंद्रह करोड़ परिवार दूध उत्पादन के काम में लगे हैं। सरकारी आंकड़ों के हिसाब से भारत में दूध के उत्पादन में लगे उत्पादकों की संख्या इस समय करीब एक करोड़ साठ लाख है। भारत के सात लाख गांवों में से तीन लाख बीस हजार गांव ऐसे हैं जो मुख्यरूप से दूध उत्पादन में योगदान दे रहे हैं। इस समय भारत में एक लाख पिच्यासी हजार ग्राम स्तरीय डेरी सहकारी संस्थाएं हैं। ये सभी पंद्रह मुख्य राज्य स्तरीय सहकारी संस्थाओं के सहयोग से काम करती हैं। इस तरह पिछले सात दशक में दूध उत्पादन के मामले में भारत की हैसियत अच्छी खासी बन चुकी है।

अब सवाल आता है दूध की उपलब्धता का। एक सौ तीस करोड़ की आबादी के लिए दूध की जरूरत का सही-सही हिसाब लगाना काफी मुश्किल काम है। फिर भी, एक मोटे अनुमान के मुताबिक प्रति व्यक्ति 250 से 300 मिलीलीटर दूध की जरूरत तो है ही। आजादी के बाद प्रतिदिन प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता 130 मिलीलीटर हुआ करती थी। इस समय भारत में प्रति दिन प्रति व्यक्ति 374 मिली दूध उपलब्ध है। यह अलग बात है कि दुग्ध उत्पादन का छियालीस फीसद ही दूध के रूप में इस्तेमाल होता है। तरल दूध के आलावा बाकी का चौवन फीसद हिस्सा घी, पनीर, दही, खोया, दूध पाउडर, छेना, क्रीम, आइसक्रीम जैसे उत्पाद बनाने में खर्च हो जाता है। खुश होने के लिए दूसरा आंकड़ा यह कि वैश्विक प्रतिव्यक्ति दुग्ध उपलब्धता की तुलना में भारत की स्थिति बेहतर है, क्योंकि वैश्विक स्तर पर प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन दूध की खपत 294 मिली ही है। लेकिन दूध उत्पादन में इतनी बढ़िया कामयाबी का खमियाजा आमतौर पर गांव में रहने वाले वे लोग भुगत रहे हैं जिनका दूध वाजिब दाम पर नहीं बिक पा रहा है। दूध उत्पादकों के सामने भी सही दाम नहीं मिल पाने की समस्या है। ये चुनौती तब और बढ़ जाती है जब इतने बड़े देश में क्षेत्रीय विभिन्नताओं के कारण दूध की मांग और व्यापार में बड़े स्तर की असमानताएं हों। भारतीय दुग्ध क्षेत्र के सामने दूसरी बड़ी चुनौती बढ़ते दूध उत्पादन के लिए बाजार तालाशने की है। अभी भी भारत में ठंड के कुछ महीनो में दूध का उत्पादन बहुत ज्यादा होता है। बिचौलियों की वजह से उत्पादक तक कम कीमत पहुंचने के चक्र को सब समझते हैं। कुछ महीने पहले दूध उत्पादकों का अपना दूध सड़कों पर बहा कर प्रदर्शन करना इन्हीं समस्याओं को लेकर उपजा आक्रोश था। जाहिर है, दूध के गिरते दामों से उत्पादक परेशान हैं।

वैश्विक दुग्ध उत्पादों का बाजार भी इस समय मंदी से जूझ रहा है। स्किम्ड मिल्क पाउडर का स्टॉक बढ़ते जाने के कारण दूध का प्रसंस्करण करने वाले वर्ग ने दूध की खरीद के दाम घटा दिए। भारतीय दूध पाउडर और दूसरे उत्पादों का निर्यात भी पिछले साल घट गया था। सरकार ने दुग्ध उत्पादों पर निर्यात सबसिडी देने का एलान किया था। दूसरी बात यह कि सबसिडी के जरिए अपना उत्पाद विदेशी बाजारों में बिकवाते रहना कोई स्थायी उपाय नहीं हो सकता, क्योंकि यह फौरी तरीका सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ाता है। इससे देसी उत्पादक को उतना लाभ नहीं पहुंचता जितना विदेशी उपभोक्ता को मिलता है।

इस समय भारत दुनिया में सबसे तेज गति से दूध उत्पादन बढ़ा रहा है। ऐसे में बढ़ते उत्पादन को खपाने के लिए अगर बाजार नहीं ढूंढ़े गए तो दूध भी चीनी, गेंहू और दूसरे अधिशेष कृषि उत्पादों की तरह वरदान की बजाय अभिशाप बन सकता है। इस समय दुनिया में दुग्ध अधिशेष देशों में अमेरिका, जर्मनी, न्यूजीलैंड, फ्रांस आॅस्ट्रेलिया और आयरलैंड का नाम आता है। लेकिन यह हैरत की बात है कि हाल ही में भारत सरकार ने अमेरिका के सामने अपने कृषि और दुग्ध क्षेत्र का व्यापार खोलने का प्रस्ताव भेजा है। भारतीय दुग्ध उत्पादकों के लिए यह खबर गंभीर मानी जानी चाहिए। अमेरिका जैसे अधिशेष दुग्ध उत्पादन वाले देश तो तलाश में ही हैं कि वे अपना यह माल कहां खपाएं। भारत को अपने बढ़ते उत्पादन को देखते हुए सबसे पहले अपने उत्पादकों के लिए घरेलू बाजार को सुरक्षित करने की जरूरत है।

इस समय वैश्विक दुग्ध निर्यात में बयासी फीसद हिस्सा विकसित देशों का है, इसलिए वहां अपनी जगह बनाने के लिए भारत को मेहनत करनी पड़ेगी। खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) की रिपोर्ट के मुताबिक दूध की कमी वाले देशों में चीन, इटली, रूस, अल्जीरिया और इंडोनेशिया के नाम गिनाए गए हैं। जाहिर है ये देश भारत के लिए अच्छे बाजार साबित हो सकते हैं। यहां व्यापार की संभावनाएं तलाशने के लिए विशेषज्ञों और पेशेवरों को फौरन काम पर लगाया जा सकता है।

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